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विशेषांक

फीजी का हिन्दी साहित्य

फीजी विशेषांक का परिचय


हिन्दी भाषा का प्रयोग और लेखन पूरे विश्व में बहुत लंबे समय से होता रहा है। हर देश का अपना एक लेखन इतिहास है और हर देश में हिन्दी की अपनी एक स्थिति है। ’प्रवासी हिन्दी साहित्य’ के अंतर्गत हम सभी प्रवासी लेखकों के बारे में कुछ मुख्य विशेषताओं के माध्यम से कुछ चर्चा तो कर सकते हैं पर हमें यह भी याद रखना होगा कि हर देश की स्थितियाँ, भारतीय लोगों की भिन्न संख्या और भिन्न पृष्ठभूमियाँ होने के कारण वहाँ का साहित्य दूसरे देशों से कुछ भिन्नता रखता है। समालोचकों और सुधि पाठकों का यह दायित्व है कि वे हर देश के साहित्य को, वहाँ के हिन्दी भाषा के इतिहास और वर्तमान स्थिति को टटोलें। 

गिरमिटिया साहित्य की चर्चा बहुत समय से होती रही है। मॉरिशस के अभिमन्यु अनंत जी के लेखन पर अनेक शोध कार्य भी हो रहे हैं। मॉरिशस के साथ ही हिन्दी का साहित्य फीजी, सूरीनाम, गयाना, ट्रिनिडाड आदि में भी लिखा जाता रहा है। मानव जीवन के इतिहास की दीवार पर गिरमिटिया का जीवन अत्याचारों की ठुँकी कील है जिस से धोखे से लाए गए और कोड़ों की मार के बल पर प्रशासित हमारे पुरखों का खून रिसता रहा है। बिहार, अवध के प्रांतों से लाए गए इन पुरखों ने वहीं अपनी भाषा और संस्कारों के बल पर अपनी एक दुनिया बनाई और इन देशों को अपने श्रम से हरा-भरा किया। उन्होंने रामायण बाँची, आल्हा गाए, कबीर, मीरा, सूर को याद किया और अपनी भावी पीढ़ियों को ये संस्कार दिए। उनके संघर्षों और प्रयत्नों से उस एग्रीमेंट को समाप्त हुए और स्थितियाँ बदले अब बहुत समय हो चुका है।

यद्यपि ऊपर से देखने पर सारा गिरमिटिया जीवन और इन देशों में लेखन एक जैसा लगता है पर ध्यान से यहाँ के लेखकों को पढ़ें तो इनकी भिन्नता भी दिखाई देती है। मॉरिशस में बिहार मूल के लोग अधिक गए तो फीजी में बस्ती, अवध, गौंडा, फ़ैजाबाद, सुल्तानपुर और आज़मगढ़ से अधिक लोग ले जाए गए। इनकी भाषा अवधी रही जिसका प्रभाव यह रहा कि आज भी उनकी हिन्दी में अवधी का प्रभाव अधिक है। इस हिन्दी को वे ’फीजी हिन्दी’ या ’फीजी बात’ कहते हैं। फीजी के हिन्दी साहित्य के इस विशेषांक में हमने कोई तुलनात्मक अध्ययन नहीं किया है पर हमारी चेष्टा रही है कि हम इस देश की स्थिति, परिस्थिति और लोगों की मनोस्थिति का विवेचन करते हुए यहाँ के वरिष्ठ और समकालीन लेखकों को प्रस्तुत कर सकें। सन्‌ १८७९ से लेकर १९१६ तक लगभग ६०,००० भारतीय फीजी लाए गए थे। स्त्रियों-पुरुषों को अपने ’मास्टर’ की आज्ञा से अपने जीवन के काम करने होते थे, यहाँ तक की शादी भी ’मास्टर’ की अनुमति से होती थी। खेतों में कोल्हू के बैल की तरह कोड़े खाकर काम करने वाले ये लोग देर शाम रामायण और भजनों के सहारे अपने बिखरे साहस को जुटाते। १९१७ के बाद इस व्यवस्था को रोकने के प्रयास प्रारंभ हुए। पं. तोतराम सनाढ्य, पं. बनारसी दास चतुर्वेदी और श्री सी.एफ़. एन्ड्यूज़ के प्रयासों से जनवरी १, १९२० को यह व्यवस्था पूरी तरह से समाप्त करके इन्हें “खुला” का नाम दिया गया और अपने पैसों पर भारत लौटने की स्वतंत्रता दी गई पर पैसे होते तो ये लौटते! धन के अभाव में इन्होंने वहीं रहना स्वीकार किया। अक्तूबर १०, १९७० को फीजी आज़ाद हुआ। फीजी इंडियन की संख्या तब लगभग ३७% बताई गई। दो बार हुए ’सैनिक कू’ के समय बहुत से भारतीयों को पलायन भी करना पड़ा पर आज भी वहाँ की जनसंख्या में लगभग ४० प्रतिशत लोग भारतीय मूल के हैं। सरकार, व्यापार और व्यवहार के स्तर पर भारत के बाद हिंदी को मान्यता देने वाला दूसरा देश है फीजी।

हमारी चेष्टा रही है कि हम इस अंक में आपको फीजी के विशिष्ट इतिहास, हिन्दी लेखन और वर्तमान में हिन्दी की स्थिति के बारे में अधिक से अधिक सामग्री दें। अगर आप इस अंक को पढ़ने के बाद इस अंक में कुछ भी और जोड़ना चाहें तो आपका स्वागत है। हमारे विशेषांक अंतर्जाल पर होने के कारण हमें प्रकाशन के बाद भी इसमें सामग्री जोड़ने की स्वतंत्रता देते हैं। आशा है आप को इस विशेषांक के माध्यम से फीजी और हिन्दी साहित्य के लेखकों से जुड़ कर अच्छा लगेगा।
 

डॉ. शैलजा सक्सेना (विशेषांक संपादक)

जीवटता और सहज आस्था की मशाल: फीजी साहित्य
 

फीजी के हिन्दी साहित्य पर विशेषांक का विचार सहसा मन में उदित हुआ और सोचने पर बल पकड़ता गया, खोजने पर समंदर बन गया और डूबने पर अनेक मोती लेकर अब आप के सामने उपस्थित है। विश्व के मानचित्र पर कुछ बिन्दुओं के रूप में दिखने वाले इस देश में हिन्दी साहित्य का एक गहरा और विस्तृत इतिहास मिलता है और प्रथम सूर्योदय की तरह आशा भरा भविष्य दिखाई देता है। 

समुद्र के अथाह जल जैसी पीड़ा लेकर, परिवार से दूर, अर्ध सत्य से बरगला कर लाए गए लोग, खेतों में साहबों के कोड़े खाते, औरतों पर होते शारीरिक अत्याचारों को देखते लोग, धनुर्धारी, वनवासी राम की शरण में बल पाते पनपने लगे और उन्हीं के साथ पनपा हिन्दी साहित्य या कहें अवधी मिली-जुली हिन्दी का साहित्य! कवियों ने विरह से ही नहीं, अत्याचार से पीड़ित होकर भी लिखा और अपने स्वत्व को निरंतर अपनी लेखनी से जिलाए रखा। इस साहित्य में पीड़ा है तो संघर्ष भी है; आँसू हैं तो जीने की ज़िद और ललक भी है, सैन्य विद्रोह पर अपनी मेहनत से बनाई गई धरती से विस्थापित कर दिए जाने का अपमान-भरा दुख है तो लौट कर अपने देश फीजी की गोद में खेलने का सपना भी है। सभी विपरीतताओं में चलता-जलता जीवन स्वयं एक दस्तावेज़ बन गया और खारे पानी को स्याही बना अपने को लिखने लगा। यह जीवन चाहे सताया गया था पर जिस मिट्टी से बरसों से जुड़ा था, उसका भला चाहता था, उस पर यह ’शांति दूत’ (समाचार पत्र) बन कर जी रहा था, ’डउका पुराण’ (लेखक प्रो. सुब्रमनी) था पर ’फीजी माँ’ (लेखक प्रो.सुब्रमनी) की गोद में ’प्रशान्त की लहरें’ (प. विवेकानंद शर्मा) गिनता हुआ जीवित था। वह ’ताजमहल’ (कविता-कमला प्रसाद मिश्र) को याद करता था पर वह जानता था कि ’सात समुद्र पार’ (लेखक- जोगिन्दर सिंह कंवल) की यह ’धरती मेरी माता’ (लेखक-जोगिन्दर सिंह कंवल) है। 

फीजी के अनेक लेखकों की रचनाओं को इस विशेषांक के दौरान पढ़ने का अवसर मिला। गिरमिटियों के जीवन की कष्टकारी कथा से जहाँ मन दहला वहीं उनकी जीवटता और साहस ने मन को गर्व से भर दिया। हम भारतीय जहाँ गए, जिस भी हाल में रहे, हमारे भारतीय संस्कार, गहरी आस्था, टूट कर भी न टूटने का अदम्य जीवट और विश्वास मशाल की तरह हमें रास्ता दिखाते रहे। उस समय, हमारे पुरखे फीजी के बारे में कोई ज्ञान न होने से गोरे ओवरसियर बाबुओं के झाँसे में आ गए पर अनेक कष्टों में ”रामायण महारानी” के चरणों को ’एक भरोसो-एक बल..’ की तरह पकड़े हुए वे उस कठिन समय से संघर्ष कर बाहर निकले थे। गिरमिट व्यवस्था समाप्त करवाने में तोताराम सनाढ्य जी के अथक प्रयत्न फीजी के लोग सदैव याद रखेंगे और उनकी किताब ’फीजी में मेरे इक्कीस वर्ष’ को उन सब लोगों ने धन्यवाद दिया होगा जो झाँसे में आकर फीजी जाने से बच गए होंगे। जीवन में साहित्य की ऐसी प्रत्यक्ष शक्ति मानव-इतिहास में अनेक जगह देखने को मिलती है और साहित्य की आवश्यकता को रेखांकित करती है। आज जब दुनिया एक विश्वग्राम में परिणत होकर, अनेक जानकारियों को मिनटों में पा लेती है तब यह प्रश्न मन में आता है कि कहीं कष्टों से निकलने की सहनशक्ति के तेल और जीवटता की रौशनी से भरी वह मशाल मद्धिम तो नहीं हो रही? इस आग को बनाए रखने के लिए हमें साहित्य की संवाद और संवर्धन की महत्वपूर्ण भूमिका के प्रति अपनी आस्था को बचाए रखना आवश्यक है।

साहित्यकुञ्ज परिवार को विशेषांक को आपके सामने प्रस्तुत करते हुए बहुत प्रसन्नता है। कुछ अधिक समय भी लगा पर इसमें बहुत कुछ समाहित करने की चेष्टा की गई है। कह सकती हूँ कि फीजी के हिन्दी साहित्य को जानने के इच्छुकों और शोधार्थियों को यहाँ पढ़ने, सोचने और विचारने के लिए पर्याप्त सामग्री मिलेगी। इसमें आपको वीडियो पर डॉ. सुरेश ऋतुपर्ण जी से फीजी साहित्य पर लिया गया साक्षात्कार और उनके द्वारा वहाँ के साहित्य की प्रस्तुति मिलेगी। ऋतुपर्ण जी ८० के दशक के फीजी को याद करते हुए उन यादों में खो गए और बहुत आत्मीयता से उन्होंने अपने विशाल पुस्तकालय से फीजी के लेखन को छाँट कर निकाला और हमारे साथ साझा किया। प्रिंट में आपको डॉ. हरीश नवल जी का डॉ. विवेकानंद शर्मा पर लिखा हुआ संस्मरण पढ़ने को मिलेगा। डॉ. विमलेश कांति वर्मा जी का बहुत श्रम और शोध से फीजी के सृजनात्मक साहित्य पर लिखा गया लेख है जो विस्तार से वहाँ के अनेक लेखकों के लेखन का विवेचन करता है। श्री अनिल जोशी जी ने फीजी में अपनी तीन वर्ष की नियुक्ति के समय हिन्दी भाषा और साहित्य को प्रोत्साहन देने वाले अनेक काम किए और वहाँ के साहित्य से परिचय कराने वाले कई लेख लिखे। फीजी के कई लोगों से सम्पर्क करवा कर उन्होंने विशेषांक प्रस्तुति में भी मदद की। इस अंक की सह-संपादिका शुभाषिणी लता जी से भी उन्होंने ही परिचय कराया जिनके साथ ने विशेषांक के मार्ग को सरल कर दिया। इस अंक में अनिल जी के दो महत्वपूर्ण लेख हैं। ’गिरमिट प्रथा की समाप्ति- भारत का दूसरा स्वतंत्रता संग्राम’ फीजी और भारत के इतिहास की विशेष घटनाओं को बताने वाला ऐतिहासिक लेख है तो जोगिन्दर सिंह कंवल जी से लिया गया साक्षात्कार साहित्यिक दृष्टि से रोचक और विश्लेषणपरक है। आपको जवाहर कर्नावट जी का फीजी के ८५ वर्षों तक चलने हिन्दी समाचार पत्र ’शांतिदूत’ के विषय में ज्ञानवर्धक लेख मिलेगा तो डॉ. धीरा वर्मा का फीजी के लोक साहित्य पर लेख पढ़ने को मिलेगा। डॉ. अरुण मिश्र जी का ’डउका पुराण’ का विस्तृत अनुशीलन है तो साथ ही वर्तमान में सक्रिय लेखकों की कविताएँ और गद्य भी पढ़ने को मिलेगा। कई प्रसिद्ध पुस्तकों के आवरण चित्र डॉ. ऋतुपर्ण जी ने भेज कर हमारी जानकारी बढ़ाई तो पुस्तकों के कुछ अंश शुभाषिणी जी द्वारा भी दिए गए हैं जिन पर उन्होंने परिचयात्मक टिप्पणियाँ भी रखी हैं। इस पत्रिका की सह-संपादिका शुभाषिणी लता फीजी साहित्य का बहुत गहराई से अध्ययन करने वाली शोधार्थी हैं। उन्होंने फीजी के साहित्य पर एक पुस्तक भी लिखी है। उन्होंने अनेक युवा और समकालीन लेखकों को इस अंक से जोड़ा और बहुत सी रचनाएँ स्वयं भी टाइप करके भेजीं। मैं इस अंक के सभी लेखकों को उनके योगदान के लिए धन्यवाद देना चाहती हूँ। आप का लेखन हमें इस पत्रिका के लिए प्राप्त होता रहेगा, ऐसी आशा है।

मैं सुएतादत्त चौधुरी जी का बहुत धन्यवाद देती हूँ जिन्होंने बहुत कम समय में इस विशेषांक का आवरण चित्र तैयार किया। फीजी की शस्य श्यामला धरती हरी-भरी रहे और वहाँ के मेहनती, रचनात्मक लेखक निरंतर फीजी हिन्दी और हिन्दी को समृद्ध करते रहें। अंत में, सुमन कुमार घई जी को अनेक धन्यवाद और आभार कि उन्होंने इस विशेषांक के संपादन के लिए मुझ पर विश्वास किया।

सादर
शैलजा
  
 

(विशेषांक सह-संपादक)

सह-संपादकीय

 

इस वर्ष 10 अक्टूबर, 2020 को फीजी ने अपना 50वां स्वतंत्रता दिवस मनाया। फीजी की स्वतंत्रता की 50वीं वर्षगांठ पर ‘साहित्यकुंज’ पत्रिका की ओर से ‘फीजी विशेषांक’ का संपादन अति सराहनीय है। 

दक्षिण प्रशांत महासागर के नीले प्रांगण में कमल की भाँति खिले फीजी द्वीप में प्रवासी भारतीयों का इतिहास लगभग 141 वर्ष पुराना है। फीजी एक बहुजातीय और बहुसांस्कृतिक देश है जहाँ पर प्रमुख जातियाँ आदिवासी फीजियन और प्रवासी भारतीय हैं। यह द्वीप देश ऑस्ट्रेलिया के पूर्व में और न्यूज़ीलैण्ड के उत्तर में स्थित है। गर्व की बात यह है कि भारत के अलावा फीजी ही ऐसा देश है जहाँ हिंदी संसद की मान्यता प्राप्त भाषाओं में से एक है। फीजी और भारत के सांस्कृतिक संबंधों की नींव सन् 1879 में गिरमिटिया भारतीय श्रमिकों ने रखी जो गन्ने के खेतों और चीनी की मिलों में काम करने के लिए ब्रिटिश सरकार द्वारा यहाँ लाए गए थे।

गिरमिट काल के दौरान फीजी ब्रिटिश सरकार के अधीन थी और औपनिवेशिक प्रभाव के कारण हिंदी की उपभाषाओं और बोलियों में अँग्रेज़ी, ई-तऊकई और देशज शब्दों का मिश्रण हुआ जिसे ‘फीजी हिंदी’ नाम से जाना जाता है। फीजी हिंदी यहाँ की बोलचाल की भाषा बनी और जात-पात, धर्म, वर्ग के भेद-भाव मिटाती हुई एकता और प्रेम के सूत्र में गिरमिटियों को बाँधती गई। फीजी में हिंदी भाषा के दो रूप प्रचलित हैं; पहला बोल-चाल की भाषा ‘फीजी हिंदी’, जिसका प्रयोग प्रवासी भारतीयों के साथ-साथ गैर-भारतीय भी दैनिक व्यवहार के लिए करते आ रहे हैं, और दूसरा मानक हिंदी जिसे शिक्षा मंत्रालय द्वारा निर्धारित हिंदी पाठ्यक्रम के अंतर्गत स्कूलों में पढ़ाई जाती है। फीजी का हिंदी साहित्य मानक हिंदी के साथ-साथ फीजी हिंदी में उपलब्ध है जिसे इस विशेषांक में शामिल किया गया है।

फीजी के प्रवासी भारतीय हिंदी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति को अपने-अपने तरीके से रचनाओं में शामिल कर रहे हैं। वे अपनी कृतियों के माध्यम से फीजी द्वीप समूह की विभिन्न परिस्थितियों और प्रवासी जीवन की विभिन्न संवेदनाओं से पाठकों को अवगत कराने में सफल हुए हैं। फीजी में हिंदी के प्रमुख साहित्यकारों में कमला प्रसाद मिश्र, तोताराम सनाढ्य, विवेकानन्द शर्मा, जोगिन्द्र सिंह कँवल, अमरजीत कौर और प्रोफेसर सुब्रमनी का नाम उल्लेखनीय हैं। फीजी का सृजनात्मक हिंदी साहित्य प्रधानतः भारतीयों के फीजी आगमन, उनके संघर्ष और विकास का दस्तावेज़ है। प्रवास में एक ओर व्यक्ति के मन में नई जगह जाने का उत्साह, चुनौती, नई आशाएँ और कामनाएँ हैं, तो वहीं दूसरी ओर विछोह की पीड़ा है, विस्थापन का कष्ट और भविष्य की आशंकाएँ हैं। स्वदेश और विदेश की भावनाओं में डूबता-उतरता मानव प्रवास का जीवन जीता है। इन्हीं संवेदनाओं को फीजी के रचनाकारों ने अपनी रचनाओं में दर्शाया है।

साहित्यकुंज के ‘फीजी विशेषांक’ पर काम करते हुए मुझे अपार हर्ष की अनुभूति हुई। इस अंक के लिए हम उन सभी लेखकों के आभारी हैं जिन्होंने अपना बहुमूल्य समय निकाल कर हमें अपनी रचनाएँ भेजीं। इस विशेषांक के लिए फीजी के लेखकों के अलावा भारत के लेखकों ने अपना रचनात्मक योगदान दिया है। इसके साथ ही साहित्यकुंज पत्रिका के संपादक आदरणीय श्री सुमन कुमार घई जी और इस विशेषांक की संपादिका डॉ. शैलजा सक्सेना के मार्गदर्शन के लिए मैं आप दोनों की कृतज्ञा हूँ। डॉ. शैलजा सक्सेना ने मुझे इस अंक के लिए सह-संपादिका के रूप में चुना, उसके लिए उनका हृदय से आभार।  आप सभी के सहयोग से फीजी के रचनाओं को साहित्यकुंज के जरिये से वृहत् ऑनलाइन विश्व मंच प्राप्त हुआ है।

धन्यवाद 
सुभाषिणी लता कुमार
फीजी

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