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आदमी और नसीब

आदमी ने एक दिन ग़ुस्से में आकर नसीब से झगड़ा कर लिया। बात तू-तू, मैं-मैं से होते हुए गाली-गलौज और लाठी-डंडे तक आ पहुँची। आदमी ने नसीब को मारकर लहुलुहान कर दिया। नसीब ने अपना ग़ुस्सा ज़ाहिर नहीं किया। मगर उसने आदमी से अपनी नज़रें फेर ली।

आदमी को जब अपनी ग़लती का एहसास हुआ तो नसीब से कहने लगा, “नसीब, मेरे दोस्त, मेरे भाई, मेरे भगवान मैंने तुमको मारकर लहुलुहान कर दिया, फिर भी तुमने मेरे सामने उफ़ तक नहीं किया। लेकिन तुमने सिर्फ़ नज़र फेरकर मेरी हालत ख़राब कर दी। तुम चाहो तो हमको भी लहुलुहान कर दो, मगर नज़र तो न फेरो।”

आदमी, नसीब के पाँव में गिरकर फूट-फूट कर रोने लगा। आदमी को रोता हुआ देखकर नसीब की भी आँखें भर आयीं।

नसीब ने कहा, “तुमने जो भी मेरे साथ किया, तुम्हारी नादानी थी मगर मेरी तो मजबूरी है। बिना ख़ुशी और ग़म का एक चक्र पूरा किए मेरी नज़रें तुम पर मेहरबान नहीं हो सकतीं।”

आदमी सिर्फ़ इतना ही पूछ पाया, “कब तक?”

नसीब ने कहा, “ ये तो हमको नहीं मालुम।”

नसीब अपने रास्ते चल दिया और आदमी हाथ मलने लगा।

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