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आम्रपाली 

अब तक जीवंत सा है सब 
कुछ मेरे स्मृति पटल में 
मैं खड़ी असहाय चाह रही थी 
समा जाऊँ इस धरातल में 

 

एकत्र हुआ था संपूर्ण वैशाली 
नगर चर्चा का मैं थी विषय 
कोलाहल से भरा था जनसमूह 
होना था आज मेरा निर्णय 

 

ना थी जानकारी किसी को भी हूँ 
किस की वंशज किस कि मैं दुहिता 
सब के मुख पर था यही कथन के 
'माँ' थी मेरी कदाचित् कोई पतिता 

 

ईश्वर ने दिया यह अपार सौंदर्य 
पर सब कहते हैं मैं हूँ इसकी दोषी 
हर नेत्र कर रहा था मुझे विवस्त्र 
हर पुरुष बन गया था मेरा अभिलाषी 


चल रहा था अंदर बाहर पुरज़ोर मंथन 
क्या बन पाऊँगी किसी की परिणीता? 
परंतु मेरा जन्म,  यह यौवन, यह रूप 
अनायास ही बना रहा था मुझे लाँछिता 


इस सभा ने अंततः किया मेरा निर्णय 
सुनकर आई मुख पर एक मलिन स्मिता 
अंधकार में डूब गया था भविष्य मेरा 
हर स्वप्न से हो गई थी अब मैं वर्जिता 


हुआ घोषित आम्रपाली है नगरवधू 
लहरा गया समूह में हर्ष पुरुषोचित 
ना थी कोई प्रेयसी किसी प्रीतम की 
होना था हर पुरुष के लिए सज्जित 


हर दिवस रहता केवल स्याह मेरा 
हर रात्रि होती थी कालिमा रंजित 
हर बहते समय के साथ हर क्षण हर पल 
हो रही थी मेरी देह और आत्मा दूषित 


आज यह कैसा आभास है कैसी कंपन 
कैसी आस जगी है इस व्याकुल मन में 
कदाचित् प्रभाव है उस तेजोमय आभा का 
जो थी उस भिक्षुक के शांत नयन में 


कुचल दिया था अपने ही करों से अपनी 
हर इच्छा को, आज जागी है नई चाहत 
याचना केवल इतनी ही है, मोक्ष प्राप्ति के 
पथ पर अग्रसर हूँ,  सहायक बने तथागत 


बुद्धं शरणं गच्छामि। धर्मं शरणं गच्छामि। 

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