अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

आत्मस्वीकृति एक सामान्य व्यक्ति के असामान्य बनने की रोचक गाथा डॉ. सुरेश कांत

पुस्तक : आत्मस्वीकृति (आत्मकथा)
लेखक : नरेन्द्र कोहली
प्रकाशक : हिंद पॉकेट बुक्स,
        ई-14, सेक्टर-11,
        नोएडा-201301 (भारत)
संस्करण : जुलाई, 2014
पृष्ठ संख्या : 296
मूल्य : पेपरबैक रु. 250
सजिल्द : रु. 395

यशस्वी लोगों अर्थात सिलेब्रिटीज़ के संबंध में जनसामान्य के मन में यह धारणा रहती है कि ज़रूर वे कोई लोकोत्तर व्यक्ति होते होंगे। प्रसिद्ध स्टैंड-अप कॉमेडियन राजू श्रीवास्तव ने अपनी एक प्रस्तुति में इसका अत्यंत रोचक वर्णन किया है कि किस तरह उनका प्रतिनिधि पात्र ‘गजोधर’ मुंबई से गाँव आए अपने पड़ोसी से पूछता है कि क्या वह करीना कपूर से मिला था और क्या वह ‘सब-कुछ’ उसी तरह करती है, जिस तरह हम करते हैं? राम और कृष्ण-कथाओं की सामयिक पुनर्रचना कर साहित्य-जगत में एक नई क्रांति का सूत्रपात करने वाले, आज के सबसे मूर्धन्य और लोकप्रिय कथाकार डॉ. नरेंद्र कोहली के संबंध में तो उनके प्रशंसक पाठकों की यह आम धारणा है कि वे अवश्य ही कोई संत हैं, और कोई आश्चर्य नहीं होगा, यदि उनमें से कोई यह भी सोचता हो कि ज़रूर वे किसी आश्रम में रहते होंगे और ‘तप’ करते होंगे।

हिंद पॉकेट बुक्स से नरेंद्र जी की सद्य प्रकाशित आत्मकथा ‘आत्मस्वीकृति’ इस बात की स्वीकृति है कि भौतिक अर्थों में ऐसा नहीं है और लेखक भी एक इनसान ही होता है और प्राय: उन्हीं स्थितियों से गुज़रकर आया होता है, जिनसे आम आदमी रोज़ गुज़रता है। इसमें देश के बँटवारे की त्रासदी से प्रभावित उनकी बाल्यावस्था, उर्दू में हुई प्रारंभिक पढ़ाई, हिंदी की ओर अदम्य रुझान, अभिनय और लेखन में रुचि तथा अपनी वक्तृत्व-कला से छोड़े प्रभावों, युवावस्था के आकर्षणों, उच्चतर अध्ययन के लिए दिल्ली-आगमन, होस्टल की ज़िंदगी, नौकरी की जद्दोजेहद, असफल प्रेम-प्रसंग, फिर मधुरिमा जी से संबंधों की प्रगाढ़ता और विवाह-बंधन में बँधने तक की घटनाएँ शामिल हैं। सामान्य होते हुए भी ये घटनाएँ उनके सामान्यों में भी असामान्य होने, या कहिए, सामान्य से सतत ऊपर उठते जाने के संकेत देती चलती हैं। एक सर्वथा नई शैली का इस्तेमाल करते हुए लेखक ने इसे उपन्यास की-सी रोचकता प्रदान की है। आप इसे पढ़ना शुरू करेंगे, तो फिर पूरा पढ़कर ही दम लेंगे और इस प्रश्न के साथ इसे छोड़ेंगे कि आगे क्या हुआ होगा और इसका अगला भाग कब पढ़ने को मिलेगा?

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

अब फिज़ाओं में महक रही है हिंदी भाषा
|

हिंदी दिवस पर विशेष विश्व का मँच मिला हिंदी…

आने वाला समय हिंदी का है
|

समीक्ष्य पुस्तक : संपर्कभाषा और लिपि लेखक…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

पुस्तक समीक्षा

पुस्तक चर्चा

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं