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आत्मविश्वास और पश्चाताप

आत्मविश्वास और पश्चाताप में युद्ध होने लगा। आत्मविश्वास का वज्र प्रहार हर बार पश्चाताप के जीर्ण-विदीर्ण शरीर पर पड़ता और पश्चाताप धराशायी हो जाता।

आत्मविश्वास ने प्रस्थान करते-करते कहा, "मेरा प्रवेश जिस मन-मस्तिष्क में हो जाए, वो विकासशील होकर विकसित हो जाता है और तुम्हारा प्रवेश विकसित को भी गर्त में ढकेल देता है।"

क्षत-विक्षत पश्चाताप ने उसके कथन पर मुहर लगाई और उसे नेत्रों ने अश्रुधारा बहा दी।

दोनों अपने निवास स्थान में रहने लगे। एक दूसरे के घोर शत्रु किन्तु कभी-कभार एक दूसरे का स्मरण कर लेते थे, क्योंकि दोनों एक ही परिस्थिति की पैदाइश थे।

चिंतन-मनन करने पर ’आत्मविश्वास’ इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि जिस मन-मस्तिष्क में मेरा निवास है उसके एक अंश में मेरे भाई पश्चाताप का भी निवास है और पश्चाताप ने यह निष्कर्ष निकाला कि जिस मन-मस्तिष्क पर मेरा एकछत्र राज है, उसके एक अंश में मेरा भाई ’आत्मविश्वास ’ ठिठुरा सा रह रहा है।

दोनों के मतभेद और मनभेद कम हुए। आपसी सौहार्द पुनः उमड़ पड़ा यह सोचकर कि हम दोनों एक दूसरे द्वारा त्याग चुके स्थान में ही निवास करते हैं। मेरे प्रस्थान करने के बाद ही मेरे भाई पश्चाताप का प्रवेश होता है और पश्चाताप ने यह सोचा कि मेरे भाई आत्मविश्वास के जाने के बाद ही उस घर में मेरा गृहप्रवेश होता है।

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