अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

आज़ादी अभी अधूरी है

गणतंत्र का दिवस मना ले, पूर्ण स्वतंत्रता अभी बाक़ी है।
‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ का सपना सच होना अभी बाक़ी है॥
 
भूख से व्याकुल बच्चे फुटपाथों पे आँधी-बारिश सहते हैं।
उनसे पूछो गणतंत्र का मतलब क्या वो ख़ाक समझते हैं॥
 
दिन रात मज़दूरी में लगा वो किसान ख़ाली पेट सोता हैं।
क्या गणतंत्र का ख़्याल उसके मस्तिष्क में कभी भी आता हैं॥
 
सत्ता के मद में चूर दूसरों के घरों को जो बेपरवाह जलाते हैं।
क्या गणतंत्र का अभिप्राय अपने हिसाब से वो नहीं लगाते हैं॥
 
जाति के नाम पर, मंदिर- मस्जिद के नाम पर गला काटते हैं।
उनकी अज्ञानता में अभी भी दूसरों की स्वतंत्रता बाक़ी हैं॥
 
भूखों को गोली, ग़रीबों को फ़रेबी, नंगों को कफ़न पहनाते हैं।
शहीदों की भूमि पे शहीदों के कफ़न का ही मोल लगाते हैं॥
 
नारी का सम्मान बीच बाज़ार नीलाम करने की प्रथा चलाते हैं।
उनकी आज़ादी, उनका अस्तित्व तक तो कुचल कर मिटाते हैं॥
 
सब अर्पित कर, रक्त बहा भारत की पावन धरा को जो सींचते हैं।
उन्हीं से उनके बलिदानों की क़ीमत क्या लगाएँ, पूछी जाती है॥
 
इंसान बिकता कोड़ियों के भाव, ईमान की बिक्री सरे आम होती है।
तन-मन से तो दास हैं यहाँ सब कोई, आज़ादी फिर कैसे पूरी है॥
 
रे! जागो अब गहरी नींद से, आवाज़ अपने हक़ के लिए उठानी है।
भारत माता की हर संतान की सुख-समृद्धि परिपूर्ण करवानी है।
 
गौरवशाली वसुधा को कर्तव्यों से अलंकृत कर फिर सजाना है।
सत्य अहिंसा ईमानदारी के गुल से गुलशन को महकाना है॥
 
तभी सवतंत्रता के अर्थ की वास्तविकता  में अनुभूति होती है।
जब हर वर्ग, हर तबक़े, हर जाति के लोग यथार्थता से जीते हैं॥


 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

कहानी

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं