अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

अभी नहीं 3 बुद्धा जयन्ती पार्क की एक याद :1969

जीवन की कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं जो अपनी छाप छोड़ कर चली तो जाती हैं मगर जब जब उनकी याद आती है तो एकाएक कंपकपी सी उठने लगती है। मेरे साथ भी कई बार कुछ ऐसा ही हुआ। हर बार लगता था कि जीवन का बस अन्त हो गया है मगर हर बार कहीं से यह आवाज़ आती थी - अभी नहीं... अभी नहीं... अभी नहीं...

 बुद्धा जयन्ती पार्क की एक याद : 1969

1965 में परिवार सहित भारत से कैनाडा आए थे। घर की याद बहुत सताती थी। अपनी पत्नी कान्ता और बेटियों मीनू व मधु को भारत भेज दिया। मेरा प्रोग्राम कुछ दिन बाद आने का था। बफ़लो से एयर इण्डिया की चार्टर्ड उड़ान लेकर और भारतीयों के साथ हम कुछ मित्र भारत पहुँचे।

वापिसी उड़ान के जाने से दो दिन पहिले हम परिवार सहित दिल्ली पहुँच गए। विदा करने कुछ मित्रगण और सम्बन्धी भी दिल्ली आगए थे। जिस रात जहाज़ ने जाना था इस से पहिले दिन हम सब ने बुद्धा जयन्ती पार्क में पिकनिक करने का प्रोग्राम बनाया। नया 2 मूवी कैमरा लिया था। सोचा खूब फ़ोटो लेंगें। पिताजी और माताजी ने इस दिन शाम को अम्बाले से आना था।

पार्क में खूब मस्ती चल रही थी। मैं ज़मीन पर लेट कर बच्चों को अपनी टाँगों पर झुला रहा था और पीछे फेंक देता था। पीछे जाते हुए बच्चे मेरी टाँग छोड़ देते थे और लौट कर फिर टाँगों पर चढ़ जाते थे। यह सिलसिला काफ़ी देर तक चलता रहा। अचानक एक बच्चे ने मेरी टाँग नहीं छोड़ी और मैं गरदन के बल पीछे लुढ़क गया। एकाएक मेरे मुँह से बड़े ज़ोर की चीख़ निकली। मेरी आदत को जानते हुए सब सोचने लगे कि मैं मज़ाक कर रहा हूँ, मगर थोड़ी देर बाद सब को एहसास हुआ कि मामला कुछ गम्भीर है। पार्क में हम इतने अन्दर थे कि कोई सवारी भी उपलब्ध नहीं थी। और कोई साधन न होने के कारण मुझे क्न्धे पर उठा कर लेजाने लगे।

मेरी गरदन एक तरफ को लटक गई थी, हाथ और पैर ऐसे झूल रहे थे जैसे लकवा मार गया हो। जैसे तैसे करके सफदरजंग हस्पताल में पहुँचाया। वहाँ पता चला कि गरदन में काफ़ी चोट आई है।

बिस्तरे पर लिटा कर पैरों और हाथों में सुईयां चुभोई गईं मगर मझे कुछ महसूस नहीं हुआ। इस बीच जहाज़ जा चुका था। डाक्टरों ने फैसला करके मेरी गरदन में पाँच किलो वज़न का ट्रैकशन लगा दिया। जब पिताजी और माताजी को दिल्ली पहुँचने पर मेरी हालत का पता चला तो सीधे मिलने आगए। मैं तो बेजान पड़ा हुआ था। मुझे देखकर इनकी क्या प्रतिक्रिया हुई यह तो नहीं मालूम, बस इतना याद है कि मेरे सिर पर हाथ रख कर कहने लगे कि अरे मामूली सी चोट है जल्दी ठीक हो जायगी।

गरदन हिलाने की बिलकुल मनाही थी, दोनों तरफ भारी वज़न रक्खा हुआ था। लेटे 2 केवल हस्पताल की छत और 45 नम्बर का पंखा ही देख सकता था। हाथों पैरों में रोज़ सुईयाँ चुभोई जाती थीं मगर कोई प्रतिक्रिया नहीं।

माता पिता से तो प्यार मिलता ही था मगर मेरी पत्नी कान्ता के दृढ़ विश्वास और अटूट स्नेह ने मुझे जीने की हिम्मत और प्रेरणा दी। अन्दर से चाहे कितनी दुखी हो मगर जब भी मेरे पास स्वयं या बच्चों के साथ आती थी तो लगता था कि सारे कष्ट दूर हो जाँएगे। कभी 2 सोचता हूँ कि मैं जो इस हाल में हूँ इसका श्रेय इस देवी को जाता है।

छ: हफ़्ते बाद हाथ पैर हिला सका। अब ट्रैकशन से छुटकारा तो मिल गया मगर गरदन को ठिकाने रखने के लिए सिर से छाती तक पलस्तर में बाँध दिया गया। चार हफ़्ते में यह यातना भी समाप्त हुई, पलस्तर कटा तो पता चला कि गरदन अभी भी अपने आप को संभाल नहीं सकती। इसके लिए एक कालर लगाया गया जिसे पहिन के कैनाडा आया और यहाँ इलाज कराया। ठीक होने में यहाँ भी काफ़ी समय लग गया था।
आज इस बात को 37 साल हो गए हैं मगर इस चोट की कसक अब भी कभी 2 बहुत परेशान करती है।

बुद्ध जयन्ती पार्क में, मिले स्वयं भगवान,
अभी नहीं आया समय, कह कर किया प्रयाण।

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

28 अक्टूबर, 2015 की वो रात
|

बात २४ जनवरी २०१३ की है। उस दिन मेरा ७५वां…

 काश! हम कुछ सीख पायें
|

अभी कुछ दिनो पूर्व कोटा से निज़ामुद्दिन जनशताब्दी…

अभी नहीं 2 - चाय का दूध बहुत महँगा पड़ा : 1961
|

जीवन की कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं जो अपनी…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

सांस्कृतिक कथा

कविता

किशोर साहित्य कहानी

लोक कथा

ललित निबन्ध

आप-बीती

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं