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आधुनिक जीवन यथार्थ को बयां करती मंगत बादल की कविताएँ

(डॉ. मंगत बादल कृत कविता-संग्रह ‘अच्छे दिनों की याद में’ के संदर्भ में)
 

समकालीन कवि डॉ. मंगत बादल हिन्दी व राजस्थानी का एक चिरपरिचित नाम है। कवि बादल रायसिंहनगर, ज़िला श्रीगंगानगर में चार-पाँच दशकों से निरन्तर साहित्य सृजन कर रहे हैं। केन्द्रीय साहित्य अकादमी व राजस्थान साहित्य अकादमी से पुरस्कृत साहित्यकार बादल की हिन्दी में ‘मत बाँधों आकाश’, ‘शब्दों की संसद’, ‘इस मौसम में’, ‘हम मनके इक हार के’ (काव्य संग्रह), ‘सीता‘, ‘कैकेयी’ (खण्ड काव्य), ‘यह दिल युग है’, ‘आंदोलन सामग्री के थोक विक्रेता’, ‘छवि सुधारो क्रार्यक्रम’ (व्यंग्य संकलन) ‘वतन से दूर’ (यात्रा वृत्तांत),  ‘कागा सब तन’ (कहानी संग्रह) और राजस्थानी में ‘रेत री पुकार’, ‘दसमेस’ (महाकाव्य), ‘मींरां, ‘सावण सुरंगों ओसरयो’, ‘बात री बात’ (निबंध संग्रह), ‘कितनो पानी’ (कहानी संग्रह), ‘भेड़ अर ऊन और गणित’ (व्यंग्य संग्रह), ‘तांरा छाई रात’ (ललित निबंध ) पुस्तकें साहित्य जगत् में वैचारिक सरोकारों के साथ आयी हैं। उनकी लेखनी इसी धारा से निरन्तर श्रमरत् है।

‘अच्छे दिनों की याद में’ कवि मंगत बादल का नवीनतम तथा सामाजिक सरोकारों से जुड़ा हुआ काव्य-संग्रह है। इसमें आधुनिक मानव-जीवन को बदलते परिवेश के साथ कवि ने प्रस्तुत किया है। मंगत बादल जीवन की सूक्ष्मता को अपनी कविता में कथ्य बनाकर सहजता से व्यक्त कर देते हैं। कविता बिना किसी लिबास के सीधे-सीधे जीवन से जुड़ जाती है और प्रत्येक मानव को अहसास कराती है कि यह तो मेरा ही जीवन है। इक्कीसवीं सदी में आधुनिकता की भरमार है। इस आँधी की चपेट में आम आदमी भी दिनो-दिन आ रहा है। आधुनिक संसाधन मानव-जीवन की आवश्यकता तो बन ही रहे हैं, इसके साथ-साथ उसके दिलो-दिमाग़ में स्थायी भी हो रहे हैं। ऐसा लगता है कि मानव का स्वदेशी रक्त विदेशी गंध से आवप्त हो रहा है। ठेठ देहात की रसोई भी इससे अछूती नहीं रही है। अतंरराष्ट्रीय बाज़ार चाहे-अनचाहे अपने क़दम बढ़ा रहा है। कवि इस वस्तुस्थिति को पहचान लेता है और आदमी से टेलीविजन बनने की स्थिति का यथार्थ चित्रण करता है–

“नवीन से नवीनतम प्रस्तुतीकरण
रंगों के इन्द्रजाल में फाँसता
लुभाता, चमत्कृत, आकर्शित करता
एक नई परिभाषा से प्रशिक्षित
चला आता
अन्तर राष्ट्रीय बाज़ार से
हमारे घर द्वार तक”1

समाज में चारों तरफ स्वार्थों की लूट मची है। ज्ञान के आलोक में अज्ञान की भरमार है। आज का मानव जानकर भी अनजान होने का नाटक कर रहा है, केवल अपने-अपने चूल्हों में आग जलाने का प्रयास जारी है। ऐसे हालातों से कवि दुःखी होकर मानव को होशियार! ख़बरदार! करता है–

“दुनिया भर  के व्यापारी
नेतागण, अधिकारी
सम्मिलित सब सामूहिक लूट में
वक्त के बड़े-बड़े अलम्बरदार
संस्कृति के ठेकेदार
होशियार! खबरदार!”2 

आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी आम आदमी आम ही है। बढ़ती वी.आई. पी. संस्कृति में कवि आम आदमी के साथ खड़ा होकर उसके दर्द को सहलाता है। कवि रेलगाड़ी के प्रथम श्रेणी, द्वितीय श्रेणी, तृतीय श्रेणी, शयनयान आदि सब डिब्बों को दरकिनार कर सामान्य डिब्बे में सवार होकर  आम आदमी के जीवन से जुड़ जाता है–

“संदर्भों से काटती, जोड़ती
जुड़ती, ठहराती, मुड़ती
चली जा रही रेल
एक शहर से दूसरे शहर
पर करती पुल, नदी, नहर
एक-एक डिब्बा
एक समानान्तर दुनिया
बदलते मुसाफिर
रात, दिन, सुबह, दोपहर, संध्या
एक छोर से दूसरे छोर
जैसे जीवन!”3

कवि ढोंगी आधुनिकता को धत्ता देकर फ़्लैश बैक करते हुए ‘तुम्हारे समय में’ बिना रुके-थके-विश्राम किए वापस हरी स्मृतियों में पहुँचना चाहता है–

“तुम्हें सौंपने के बाद ही
बात करूँगा मैं
कुछ अपने समय के बारे में
जो मेरी स्मृतियों में
अब भी हरा है!”4

एक तरफ़ विकास के बढ़ते क़दम, तमाम सुविधाएँ, भौतिक संसाधन, आधुनिक युग की जीवन शैली जो पुरातन संस्कृति को ढोंग बताकर पीछे धकेल रही हैं। वहीं दूसरी तरफ़ समाज की कन्याभ्रूण हत्या, बलात्कार, शोषण, दहेज़ प्रथा जैसी अनेक भयावह विकृतियाँ मुँह फाड़े मानवता को निगल जाने के लिए तैयार हैं। ये विकास की कैसी विडम्बना है ? कवि इसी विडम्बना से त्रस्त होकर ‘एक पत्र दिल्ली को’ भेजकर जवाब माँगता है–

“बलात्कार की संज्ञा
जिसे देते हैं आप
वे तो हमारे यहाँ
हर दूसरे-चौथे रोज़ हो जाते हैं
इधर तो यह मशहूर है-
‘जर जोरू जोर के
नहीं किसी और के।’
कोई कहावत
ऐसे ही थोड़े चलती है
दहेज विरोधी कानून बनाया होगा
आपने
पर यहाँ तो अब भी
बहुएँ वैसे ही जलती हैं।”5

यह पत्र एक सामान्य पत्र न होकर, समूची इक्कीसवीं सदी की विकसित व्यवस्था और मानव-समाज की उन्नति व विकास-यात्रा पर करारा तमाचा चस्पा करता है। समाज के समक्ष प्रश्न चिह्न खड़ा करता है कि क्या हम आगे बढ़ रहे है? यह हमारा विकास है या अवसान। हम ख़ुद ही भयावह परिस्थिति को जन्म दे रहे हैं। काव्य-संग्रह में लड़की के जन्म से ही चिंता पनपने का भाव समाज की दोगली स्थिति का यथार्थ है–

“औरत होती हुई लड़की
बाँटने लगती फिर स्वयं
एक भय गुपचुप
अपनी बेटियों, पोतियों, नातिनों में
मर जाती, फिर एक दिन
लेकिन मरता नहीं भय
बँटा, हुआ वह
फिर जवान होने लगता 
किसी के साथ निरन्तर!”6

कवि यथार्थ बयां करते हुए, साफ़ शब्दों में लिखता है कि लड़की को लड़की समाज में उसके माता-पिता ही बनाते हैं। लड़की होने का वातावरण गर्भ से ही निर्माण होने लगता है जो घर-बाहर हर जगह व्याप्त रहता है–

“नहीं जन्मती माँ के गर्भ से
केवल लड़की
एक चिन्ता भी जन्म लेती है
जो हर वक्त रहती साथ
लड़की के
सोते-जागते
माँ-बाप द्वारा भेजी हुई 
घर बाहर हर जगह।”7

कवि कल्पना करता जान पड़ता है कि काश! ये माँ-बाप लड़की को संस्कारों के साथ हथियार बनने की शिक्षा भी दे पाते तो समाज के भेड़ियों से संघर्ष करके, वह अपनी रक्षा  स्वयं कर लेती। वास्तव में यह समाज की शोचनीय स्थिति को इंगित करता है और बताता है कि सही मायने में हम कहाँ खड़े हैं। मंगत बादल की क़लम एक-एक कर ऐसी सामाजिक दशाओं को अपना कथ्य बनाती है। उनकी संवेदना इन्हीं समस्याओं के इर्द-गिर्द घूमती हुई, कटाक्ष करती हुई आगे बढ़ती है और समाज के दूसरे हिस्से की ओर आकर हास्यास्पद स्थिति पर खड़ी हो जाती है–

“बहुत सी चीजें लगातार गायब होती जा रही हैं
स्मृतियों से चुपचाप
झर जाते शब्द
खो जाएगा यूँ तो एक दिन
यह समूचा काल खण्ड
अपनी सभ्यता संस्कृति और विशेषताओं सहित”8

कवि का कविता-कैनवास काफ़ी विस्तृत है। कवि की प्रगतिशील दृष्टि सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन की प्रक्रिया में आस्था रखती है। सामाजिक समस्याओं के साथ-साथ मानव संघर्ष को बयां करती कविताएँ हर भ्रम का पर्दाफ़ाश करते हुए, सच तक पहुँचने की एक सफल कोशिश और समझ है–

“जब इतिहास लिखा जाता है
उसमें दर्ज होने वालों के लिए
खाने-पीने का प्रबंध करते 
झाड़ू देते, चाय बनाते या
और किसी मामूली काम में
लगे होते मामूली लोग
स्वर्णिम भविष्य के द्वार में
प्रवेश करने वालों के लिए
द्वार खोलते हुए
इतिहास से बाहर ही
खड़े रह जाते हैं मामूली लोग।”9

कवि इन्हीं मामूली लोगों में जीवन तलाशता है। उनकी पहचान के अस्तित्व के लिए संघर्ष करता है। साथ में उन्हें भी चेता देता है कि अब विश्राम करने का समय नहीं है क्योंकि समय के दबाव से जन्मी सामाजिक बेचैनियों से लड़ने के लिए उन्हें स्वयं ही आगे आना होगा। राजनेता अपने स्वार्थ अलाप रहे हैं। चुनावी नारों के बीच में जनता का हमदर्द कोई नहीं है। जनता भी अब इनके थोथे-कोरे वादों को पहचान गयी है, इसीलिए पूछती है–

“अगली बार आप
कौन सा नारा दे रहे हैं
अब की बार
चुनाव जीतने की
आपके पास क्या तकनीक है?
अच्छा तो राम! राम!
बाकी सब ठीक है!
राजधानी को हमारा
एक बार फिर सलाम!
पत्र लिखने वाला-
भारत का 
एक छोटा-सा गाँव।”10

निश्चय ही, डॉ. मंगत  बादल की कविताएँ समाज यथार्थ को बयां करने वाली हैं। इनमें कवि ने अपनी निजी तथा सार्वजनिक मान्यताओं, मूल्य तथा सामाजिक सरोकारों को वाणी देने का प्रयास किया है। बादल की क़लम कहीं उग्र होती है तो कहीं शांत भाव से परिवेश का चित्रांकन करती है। समय के साथ चलने वाली कवि की क़लम बड़ी शिद्दत से समसामयिक जीवन परिवेश के विविध पहलुओं को छूती है। भाषा की सहजता व स्पष्टता भावों को प्रेषण करने में पूर्ण सफल है। समग्रतः कहा जा सकता है कि ‘अच्छे दिनों की याद में’ काव्य-संग्रह समकालीन साहित्य में अपनी विशिष्ट पहचान रखने वाला है। संग्रह की कविताएँ वर्तमान में बढ़ते भौतिकवाद से मानव के जीवन मूल्यों में स्थित असंतोष, कुण्ठा, निराशा, संशय, आक्रोश, स्वार्थ एवं बेकारी के भाव को सही दिशा देने वाली है।

संदर्भ सूची

  1. अच्छे दिनों की याद में, मंगत बादल, ऋचा (इण्डिया) पब्लिशर्स, बीकानेर, पृ.सं. 13 

  2. वही, पृ.स. 12

  3. वही, पृ.स. 32

  4. वही, पृ.स. 67

  5. वही, पृ.स. 83

  6. वही, पृ.स. 29

  7. वही, पृ.स. 30

  8. वही, पृ.स. 19

  9. वही, पृ.स. 33 

  10. वही, पृ.स. 84

डॉ. दयाराम
प्रधानाचार्य
राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, आंतरी 
ब्लॉक-कुम्भलगढ़, जिला-राजसमंद (राजस्थान) पिन-332125
स्थाई पता-वार्ड न. 7 ,चक 3 टी. के. डब्ल्यू.  पो. ऑ. केवलावाली,
तहसील- पीलीबंगा
जिला-हनुमानगढ़ .(राजस्थान)  पिन-335802
मो. न.- 09649247309, 7976707736
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