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अहितकारी सच

दो तोते भाई थे। उनका नाम था सल्लू और बल्लू। दोनों में बड़ा प्रेम था। जहाँ जाते साथ–साथ जाते। एक दिन दोनों ही जाल में फँस गए और शिकारी ने उन्हें एक ब्राह्मण के हाथ बेच दिया। ब्राह्मण उन्हें बेटों की तरह प्यार करता था। अपने हाथ से उन्हें दाना खिलाता, तोतों को अपनी बोली सिखाता। सुबह उठते ही बोलता –सल्लूराम–बल्लूराम–राम–राम। तोते ख़ुशी से उछल पड़ते और कहते –टाम—टाम, टाम –टाम।

एक बार ब्राह्मण को किसी काम से नगर से बाहर जाना पड़ा। वह तोतों से बोला –"मैं दो दिन में ही लौटकर आ जाऊँगा। मेरे पीछे से अपनी माँ का ध्यान रखना और देखना उससे कौन–कौन मिलने आता है।"

उसके जाने के बाद घर में आने वालों का ताँता लग गया। शाम से देर रात तक आदमी आते–जाते रहते। ब्राह्मणी अच्छे–अच्छे कपड़े ज़ेवर पहनकर उनसे खूब बतियाती। उनके साथ खाना–पीना चलता रहता।

सोते समय सल्लू बोला – "हमें ब्राह्मणी को समझाना चाहिए कि इस तरह ब्राह्मन की अनुपस्थिति में आदमियों को घर पर न बुलाये।"

ऐसी गलती न कर बैठना। वह गुस्से में आकर हमारा जीना हराम कर देगी," बल्लू ने उसे समझने की कोशिश की।

सल्लू से न रहा गया। दूसरे दिन ब्राह्मणी खाना खाकर लेटी ही थी कि वह इठलाता हुआ ब्राह्मणी से बोला – "माँ आप तो शाम से ही न जाने किस-किस के साथ व्यस्त हो जाती हो। पिता जी भी यहाँ नहीं हैं – हमारा तो मन नहीं लगता। आपसे बात करने को तरस जाते हैं। आज किसी को न बुलाना।"

"तू ठीक ही कह रहा है। आ, यहाँ मेरे पास आकर बैठ जा। तोता उसके कंधे पर जा बैठा। ब्राह्मणी ने उसे आहिस्ता से एक हाथ से पकड़ा और दूसरे ही क्षण अपनी पकड़ मज़बूत कर दी। अपनी उँगलियों से उसकी नाज़ुक सी गर्दन को मरोड़ दिया। दूसरे ही क्षण उसकी गर्दन लटक गई और उसकी आँखें बाहर निकल आईं। ब्राह्मणी ने गुस्से से अँधी होकर उसको रसोई में जलती अंगीठी में झोंक दिया। कुछ ही मिनटों में सल्लू जलकर राख हो गया। बल्लू अपने भाई की ऐसे दर्दनाक मौत को देखकर तड़प उठा। भीगी आँखों से चुपचाप ब्राह्मण के आने का इंतज़ार करने लगा।

ब्राह्मण ने लौटकर घर में शमशान सी ख़ामोशी देखी तो वह घबरा उठा। सल्लू –बल्लू राम–राम, कहता अंदर घुसा। बल्लू उदास सा बैठा था।

"अरे बल्लू, तुझे क्या हो गया है? सल्लू कहाँ है? मेरे पीछे से यहाँ कौन–कौन आया?"

"जिस सच को कहने से नुक़सान हो उसे न कहना ही अच्छा है और मैं सल्लू की तरह मरना भी नहीं चाहता हूँ। अब तो मेरा यहाँ से चले जाना ही ठीक है।"

ब्राह्मण देवता ने उड़ते पंछी को रोका नहीं। उन्हें अपने प्रश्नों के उत्तर मिल चुके थे।

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