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ऐसा क्यों?

ऐसा क्यों‍ होता है कि
कहीं तो
एक लम्बे अन्तराल के पश्चात्‌
मिलने पर भी,
सम्बन्धों के सभी सूत्र
अनायास ही जुड़ जाते हैं।
 
हृदय-तन्त्री के सभी तार
एक साथ ध्वनित हो जाते हैं।
स्नेह-संचार में समय ही नहीं लगता।
विश्वास ही नहीं होता कि 
इतने दिनों बाद मिले हैं।
 
और कहीं,
बरसों पर बरस, 
साथ-साथ रहते हुये भी, 
सम्बन्ध इतने तार-तार हो जाते हैं, कि
कहीं कोई सूत्र हमें जोड़ नहीं पाता,
वरन्‌ जोड़ पाती है केवल एक दूरी
जो निरन्तर बढ़ते हुये
केवल यही प्रश्न पूछती रहती है कि
क्या हम कभी निकट भी थे?

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