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अँधेरा

डॉक्टर की पर्ची दुकानदार को थमा कर भी चच्ची शांत नहीं हुई।

"कित्ते पैसे हुए इन मुई लाल-पीली गोलियों के?"

दाम सुनकर चच्ची ने बुर्के का पर्दा उलट दिया, "इत्ती ज़रा-ज़रा सी गोलियों के दो सौ रुपइए, लूट मच रही है लूट, अरी तू पैदा ही क्यों हुई मरी..!"

पलट कर चच्ची ने शन्नों का झोंटा खींच दिया, वह "उई अम्मा" कह, कराह कर रोने लगी।

चच्ची की आँखों से आग बरस रही थी। बेटी की तरफ़ मुड़ कर वह फिर चीख़ने लगीं,

"ज़ीनत की बच्ची से वसूलूँगी सारे पैसे.....वही मरने आयी थी नल पे...झगड़ा मुझसे था...बाल्टी खेंच मारी शन्नो के....नीचे के दाँत तो बिल्कुल गये।" ज़रा-सी बच्ची बिलबिला गयी...।

"अरी चोप्प कर भली मानस, सड़क पर क्यों गला फाड़े है," सकीना चच्ची को खींचकर सड़क पार ले आयी।

उसका बढ़ा हुआ हाथ झटक कर चच्ची बोली, "मैं क्यों चुप्प करूँ! क्या पता था, मेरा बदला चुड़ैल औलाद से निकालेगी, अब तो ऑपरेशन होगा। कै दी है, हज़ार रुपये की चपत पड़ेगी....खाँसे लाऊँ....डाका डालूँ या कुँए में कूद जाऊँ....?"

चच्ची फिर शुरू हो गयी, "ऐसे ही हमारे चूल्हे औंधे पड़े हैं, उनके चूल्हे तो मटियाले हो रहे हैं...उनके ख़सम जवान जो बैठे हैं, ला-लाकर खिला देंगें। भाग तो हमारे ही फूटने थे, कौन लायेगा कमा कर।" अपने शराबी खाविंद को याद कर वो गालियाँ देती रही।

शन्नो डर कर सकीना से लिपट गयी। उसकी ललछोई आँखों में भय छिपा बैठा था। धोबियों का मुहल्ला पार कर के वो अपनी सरहद में पहुँच गयी थी। ओसारे में खाट पर दवाइयों को पटक कर चच्ची ज़ीनत से लड़ने चल पड़ीं।

शन्नो को लगा इस बार वह अपने दाँत भी तुड़वा कर लौटेगी......। अकेली जायेगी, ज़ीनत का पूरा कुनबा टूट पड़ेगा।

अम्मी के ओझल होते ही शन्नो दर्द के मारे रो पड़ी।

उसके चोट से टूटे दाँत कम, भूख से बिलबिलाती आँतें ज़्यादा दुख रही थीं, उसने सोचा, बाजी की तरह वह भी अंधे कुएँ में कूदकर जान दे देगी।

पर अम्मी कह रही थीं कि कुआँ बहुत गहरा होता है।

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