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23 - अनोखी बच्चा पार्टी

30 मई 2003

मोंटेसरी वार्षिकोत्सव

दोपहर को अचानक रोहित की मम्मी का फोन बहू शीतल के पास आया कि कनेडियन मोंटेसरी अकादमी की ओर से दोपहर को वार्षिक समारोह है। हमारे साथ आंटी-अंकल अवश्य चलें। लौटते समय हम सब तुम्हारे घर अवनि का प्रथम मासिकी जन्मदिवस मनाएँगे।

कलकत्ते की नर्सरी–मोंटेसरी का तो अच्छा ख़ासा अनुभव था। पर यहाँ भी मोंटेसरी में जाकर नए-नए अनुभव होंगे यह सोचकर पुलकित हो उठी। रोहित मेरे बेटे के मित्र का लड़का है और इसी मोंटेसरी का छात्र है। है तो मुश्किल से चार वर्ष का ही, पर बड़ा चुस्त है।

यह मोंटेसरी असल में डे-केयर की तरह है। वह उसमें सुबह 9 बजे से 5 बजे तक रहता है क्योंकि उसकी माँ किसी कंपनी में इंजीनियर है। वह अपने ऑफ़िस से लौटते समय रोहित को लेती हुई घर आ जाती है।

इसे लंका निवासी एक महिला चलाती है। जिसने कनाडा की नागरिकता लेकर बच्चों के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया है। उस की उम्र तो कम नहीं है पर बहुत ही सजगता से उस डे-केयर की व्यवस्था सँभाले हुए है।

हम ठीक समय पर मोंटेसरी के ऑडोटोरियम में पहुँच गए। छोटे बच्चे अपने-अपने प्रोग्राम के अनुसार तैयार थे। धीरे-धीरे हँसते हुए सभागार में आए। मंच पर संगीत ध्वनि के साथ थिरकते, संवाद बोलते देखा तो आँखों पर विश्वास नहीं हुआ कि एक या दो वर्ष के बच्चे भी अपनी अनोखी अदाओं से दर्शकों को चकित कर सकते हैं। उनको अभ्यास करने में शिक्षिकाओं ने एड़ी से चोटी तक ज़ोर लगा दिया होगा।

एक बात बहुत विचित्र लगी। कार्यक्रमों में भाग लेने वाले बच्चे जब मंच से उतरकर दूसरे कमरे में जा रहे थे तब वे एक विशेष आवाज मुँह से निकालते एक ही मुद्रा में जा रहे थे। इस मुद्रा में इतने तन्मय थे कि इधर-उधर झाँकने का मौक़ा ही नहीं उन्हें मिल रहा था। उनकी चाल में अजीब सम्मोहन था। हम एकटक उन्हें ही देखते रहे जब तक आँखों से ओझल न हो गए।

हमें सभागार में एक पेपर मिला जिससे जाना कि गर्मियों में छोटे-छोटे बच्चों के लिए ही नहीं बल्कि ठुमकते, गिरते-गिरते चलते शिशुओं के लिए भी कैंप (Infant &Toddler camp) लगेंगे। आश्चर्य से मेरी तो आँखें ही चौड़ी हो गईं। ऐसे बच्चों को सँभालना मज़ाक नहीं! भारत में तो हम इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते। एक साल के बच्चे को तो कलेजे से ही लगाए रखते हैं। मैंने तो बच्चों को कैंप में भेजा था जब वे कक्षा 8-10 में आ गए और यहाँ पैदा होते ही कैंप। इसका मतलब तो यहाँ कैंपों और डे-केयर की भरमार है। माँ–बाप भी केयर सेंटर्स पर विश्वास करके बच्चों को इतनी जल्दी अपने से अलग करने को राज़ी हो जाते हैं। बड़े साहस की बात हैं।

ख्यालों की सवारी करते-करते दिमाग़ में “Daddy day-care” पिक्चर उभर कर आ रही है। यह पिक्चर कुछ दिन पहले ही देखी थी। बड़ी हँसी-मज़ाक की है। इसमें डैडी लोगों ने यह साबित कर दिया कि वे भी महिलाओं और मम्मी से कम नहीं। बड़ी सफलता से वे सारे दिन 3 माह से 9वर्ष के बच्चों की देखरेख कर सकते हैं फिर चाहे उन्हें डायपर बदलना पड़े, घोड़ा बनना पड़े या गाना ज़ोर-ज़ोर से गाना पड़े। अंत में उन्होंने एक ऐसे डे-केयर को मात दे दी जिसकी संचालिका एक घमंडी, नकचढ़ी महिला थी जो वर्षों से उसे चलाती थी। उसके सारे बच्चे और शिक्षक डैडी डे-केयर में आ गए।

अंतिम दृश्य देखकर तो हँसी के मारे पेट में बल पड़ गए। उसमें डे-केयर की वही घमंडी महिला चौराहे पर खड़ी भीड़ को नियंत्रित करती दिखाई दी। एकाएक शहद की मक्खियाँ न जाने कहाँ से आकर जगह-जगह उसे काटने लगीं। वह दर्द से छटपटाने लगी और उनसे अपना बचाव करती हिलने लगी। फलस्वरूप सीधे हाथ में पकड़ी दिशा निर्देशीय झंडी भी आगे पीछे होने लगी। कारों के चालक भी झंडी के अनुसार अपनी कार हिलाने लगे— कभी दायें तो कभी बाएँ। चारों तरफ की कारों ने आकर उसे घेर लिया। सारा ट्रैफ़िक गड़बड़ा गया पर उस बेचारी पर मक्खियों उड़ना बंद न हुआ। वह हिलती रही, उसकी झंडी हिलती रही और साथ में हिलती रहीं लाल, नीली, काली, सफ़ेद कारें आगे-पीछे–आगे—पीछे।

लगता है अंदर से फूटती हँसी के कारण मेरा भी हिलना शुरू हो गया है। यह पिक्चर तो 24 मई को देखी थी पर लग रहा है अभी देखकर आई हूँ।

मैं तो विचारों की घाटियों में न जाने कहाँ गुम हो गई थी कि कार को ब्रेक लगा और अपने को घर के सामने खड़ा पाया। यहाँ घरों के बाहर नाम की तख्ती नहीं होती है। केवल नंबर लिखे रहते हैं। बेटे के घर का नंबर मैंने अच्छे से याद कर लिया है वरना पता लगा भूल-भुलैया में कहीं अटक गए। वैसे तो हम बिना बेटे के अकेले कहीं नहीं जाते पर सुबह मियां-बीबी ज़रूर हाथ में हाथ डाले घूमने निकल पड़ते हैं।

हम सबने बड़े उत्साह से घर में प्रवेश किया और बच्चा पार्टी में व्यस्त हो गए।

अनोखी बच्चा पार्टी

 समय के तो पंख लगे है। देखते ही देखते मेरी पोती एक मास की हो गई। आज ही के दिन वह नटखट गुड़िया की तरह अपनी मम्मी को अस्पताल में सता रही थी।

सुबह उठते ही उसका पापा बोला – “माँ,आज कुछ मित्र अपने छोटे बच्चों के साथ आएँगे।फिर मिलकर अवनि का जन्मदिन मनाएँगे।”

“अरे जन्मदिन मनाने के तो बहुत दिन हैं। अभी तो एक माह की ही हुई है।

“हाँ तो एक माह वाला जन्मदिन ही तो मनाएँगे।”

मैं तो हैरान सी उसकी ओर ताकने लगी। मेरे लिए तो यह अनोखी बात थी।

मेरे मनोभावों को ताड़ते हुए बोला- “अवनि की एक एलबम तैयार करनी है। इसलिए उसकी तरह-तरह की, मतलब हँसते हुए,रोते हुए, मुँह बनाते हुए की फोटुयें खींचनी हैं। जिससे याद रहेगा एक माह की वह क्या-क्या गुल खिलाती थी। फिर अगले माह भी ऐसा ही करेंगे। इस तरह एक साल तक हर माह उसका जन्मदिन मनाएँगे। उसकी सारी गतिविधियाँ कैमरे में क़ैद कर लेंगे। एक साल के बाद जब अपनी फोटुयें देखेगी तो उसे बड़ा मज़ा आएगा।”

विचार तो बहुत अच्छा है। एक साल तक बच्चे का विकास बहुत तेज़ी से होता है। हमें भी उसके विभिन्न रूप देख आनंद आएगा। तरह तरह के मुँह बनाने में तो वह उस्ताद है। अच्छा एक काम कर।”

 “क्या माँ?”

“एक माह तक तो उसके मालिश नहीं हुई। सोच रही हूँ आज से उसके तेल मालिश शुरू कर दूँ। एक फोटो मालिश करते समय की ले लेना। बड़ी होकर अवनि को पता तो लगेगा कि मैंने उसके तेल लगाया था।”

“हाँ—हाँ एक नहीं दस ले लूँगा।”

आज तो नहलाने के बाद उसे उसकी बुआ के कपड़े पहनाऊँगी। यह सोचकर उठी और छटुलनी का पिटारा खोल बैठी। उसकी बुआ ने छ्टुलनी का सामान पैक करके मेरे साथ भेजा था। हमारे यहाँ यह रस्म हैं कि नवजात शिशु की बुआ उसकी ज़रूरत का सामान सँजोकर भेजती हैं। उसी को छटुलनी कहते हैं। उसमें से चादर तकिये निकालकर उसका पालना पहली बार सुसज्जित किया। बहुत सुंदर लग रहा था उसका कमरा। मुझे लगा -रेशम के तारों से कढ़ी चादर में हँसते फूल उसका अभिनंदन करने में बाज़ी लगा रहे हैं कि देखें किसको वह प्रथम छूती है।

बेटा तो ऑफ़िस चला गया। शाम को ही पार्टी होनी थी। मैंने महसूस किया कि अवनि के आने से मोह का धागा बड़ा मजबूत हो गया है। जितना इसे समेटने की कोशिश करती हूँ उतना ही फैलकर एक कसक पैदा करने से बाज़ नहीं आता –तू यहाँ से चली जाएगी तो पोती को बिना देखे कैसे रहेगी?

मगर मैं मजबूर हूँ। बस एक गहरी साँस लेकर रह जाती हूँ।

दोपहर को मोंटेसरी वार्षिकोत्सव में चली गई थी पर शाम होते-होते लौट आई।

उस समय तक आत्मीय मित्र अपने बच्चों के साथ आ गए थे। बच्चे बच्चों को देख बड़े ख़ुश। उनके कारण अच्छी ख़ासी चहल-पहल थी ।

मेज़ पर चाकलेट की परतों से ढका सजा केक देखकर बाँछें खिल गईं। मेरी पोती तो अपनी मम्मी की गोद में समाई केक को एकटक देख रही थी। लगता था उसके मुँह में पानी आ रहा है। बेटे ने अपनी बेटी के मन की शायद बात समझ ली। इसीकरण उसने केक का छोटा सा टुकड़ा काट कर उसके होंठों से लगाया और बाद में ख़ुद खा गया।

रोना, मचलना, हँसना-मुसकराना सभी रंग फैले हुए थे। बड़े बच्चे अवनि को गोद में लेने को उत्सुक थे। कभी उसे छूकर देखते। कभी मुट्ठी खोल नाजुक सी उँगलियों को अपने हाथ में लेते। वह इन्हें गुड़िया सी लग रही थी। एक तरह से यह बच्चा पार्टी थी। सबको ही चिंता थी- बच्चे भूखे न रह जाएँ। कैमरे भी बच्चों की भोली-भाली सूरत ही को अपने कलेजे से लगाना चाहते थे।

पार्टी जल्दी ही ख़तम हो गई। क्योंकि बच्चों के सोने-सुलाने का समय हो गया था।

चाँद और शीतल काफी थक गए हैं। एक बार मेरा मन हुआ कि कहूँ- रात में अवनि जागे तो मुझे दे जाना। अपनी बाँहों का पालना बनाकर उसे झुलाती रहूँगी।इससे तुम्हें 2-3 घंटे सोने का समय भी मिल जाएगा।

इतना कहने की लेकिन हिम्मत न जुटा पाई। शायद बच्चों को रखने का मेरा तरीक़ा 30 वर्ष पुराना हो। पालन पोषण का तरीक़ा चाहे बदल गया हो परंतु वात्सल्यमयी गोद, प्यार पूरित हृदय की परिभाषा में तो कोई परिवर्तन नहीं हुआ।

क्रमशः-

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