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अनुभूतियाँ–002 : 'अनुजा’

1. 
अभी तो ख़्वाबों पर पहरे नहीं हैं,
तुमने आना- जाना, क्यों कम कर दिया है?
 
2.
हाल अपना हमनें, ज़रा हँस कर क्या टाला
ज़माने को तमाशे का, सामां मिल गया है!
 
3.
बहरहाल न कोई शिकवा, और न ही गिला है
बस, हाल कहते जिससे, वो शख़्स न मिला है!
 
4.
मेरे हाल पे अश्क बहाने वालो!
मगरमच्छ भी तुमसे हैं तौबा करते।
 
5.
एक ही बोली में बरसों बतियाए
न तुम हमें समझे, न हम ही समझ पाए!
 
6.
मीलों चले तन्हा, न थके न ऊबे
दो क़दम तुम्हारे साथ, दुश्वार हो गए!
 
7.
मेरे हमदम, तेरा साथ, था कितना मुबारक
सफ़र तय हुआ कब, ख़बर ही नहीं!
 
8.
जब भी चाहो, चुपचाप चले जाना
तुम्हारे क़दमों की आहट से, मैं जान लूँगी !
 
9.
खिड़कियों में न झाँक कर, दिलों में झाँका होता
ज़माने का जो हाल है, वो हाल फिर न होता!
 
10.
इन किनारों का मुक़द्दर भी हमारा-सा है
साथ चल तो पड़े, पर मिलेंगे नहीं....!
 
11.
ये जो तुम बिन कहे ही, मेरी बात समझ जाते हो
लगता है, मुझसे ज्यादा, मुझ से वाक़िफ़ हो!
 
12.( दोहा )
'मैं, मेरा, मुझको' यही, रटन लगी दिन रात
आठ पहर कुल थे मिले, बीत गए हैं सात!!

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