अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

अपनी-अपनी सोच

दफतर में बैठे-बैठे मैंने सोचा कि सुमन से मिले हुए बहुत दिन हो गए, उससे मिलकर आती हूँ। फिर मुझे ख्याल आया कि पहले उससे फोन पर पूछ लूँ कि वह दफतर आई है भी या नहीं।

उसके फोन की घंटी बजने लगी उधर से आवाज़ आई- "हैलो"
मैंने कहा- "सुमन तुम दफतर आई हो? मैं तुमसे मिलने आ रही हूँ.........।"

उसने कहा- "नहीं! मैं तो छुट्टी पर हूँ, मेरी लड़की को टायफाइड हो गया है, बुखार उतरने का नाम ही नहीं ले रहा है, तीन दिन से अस्पताल में भर्ती है...।"

"अच्छा! तो उसे अस्पताल से कब छुट्टी मिलेगी..........?"

"पता नहीं जब बुखार उतरेगा शायद तभी हम लोग घर जा पायेंगे..........।"

अचानक फोन की लाइन कट गई।

बहुत देर तक उसी के बारे में सोचने लगी। मैं उसकी बच्ची को देखने अस्पताल जाना चाहती थी। मौसम भी आज बहुत गर्म था। मेरा अस्पताल जाना नहीं हुआ। दो-तीन दिन बीत गये, मेरी तबियत भी खराब थी। इसलिए सुमन से बात नहीं हो पाई।

मुझे याद आया कि आज रात को हम सबको एक शादी की पार्टी में जाना है। मैंने सुमन को वहाँ जाने के लिए फोन लगाया। उसने मुझसे कहा- "डॉक्टर साहब आज छुट्टी देने को कह रहे थे, तुम ज़रूर जाना......।"

हमारे बीच थोड़ी ही बातचीत हुई। मैं सोच रही थी कि मेरी सहेली कैसी बात कर रही है, क्या अस्पताल से घर लौटकर वह पार्टी में जाने के लिए तैयार हो जायेगी। क्या उसकी मानसिक स्थिति इतनी जल्दी बदल जायेगी। उस ऊहापोह में मैंने पार्टी में जाना निरस्त कर दिया।

कुछ दिन के पश्चात् एक दिन दफतर में सुमन से मेरी मुलाकात हुई तो वह मुझसे पूछने लगी- "तुम उस दिन पार्टी में नहीं दिखी, क्यों नहीं आई, पार्टी में बहुत मज़ा आया........।"

उसकी बातों ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया। और मैं बहुत देर तक सुमन के बारे में ही सोचती रही। फिर मन ही मन स्वयं को समझाने की कोशिश की कि मैं आज के आधुनिक युग की सोच से कितनी दूर हूँ। क्या मैं सुमन की तरह अपनी सोच में बदलाव ला पाऊँगी।

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

अँधेरा
|

डॉक्टर की पर्ची दुकानदार को थमा कर भी चच्ची…

अंजुम जी
|

अवसाद कब किसे, क्यों, किस वज़ह से अपना शिकार…

अंडा
|

मिश्रा जी अभी तक'ब्राह्मणत्व' का…

अंधविश्वास
|

प्रत्येक दिन किसी न किसी व्यक्ति की मौत…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

लघुकथा

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं