अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा वृत्तांत डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

असहजता से मिलती है असफलता

क्रोध, निराशा और कष्ट के दौर में हम असहज हो जाते हैं जबकि हमें उसी समय इस गुण की जरूरत होती है। सहज भाव से काम करते हुए हम आसानी से अपना लक्ष्य पा सकते हैं पर मन में आयी व्यग्रता के कारण हम त्रुटिपूर्ण विचार, शीघ्रता और शिथिलता के कारण उचित निर्णय वह भी समय पर नहीं ले पाते और आख़िर हमारे हाथ लगती है असफलता।

हमारी देह शाश्वत नहीं है पर जीवन का स्वरूप शाश्वत है। कोई न कोई तो रहेगा जिसे मिटना है उसे तो मिटना ही है। समय परिवर्तनशील है । आज हमारे साथ नहीं है कल हमारे साथ होगा-और हम अपने दुःख और असफलता से मुक्ति पा लेंगे यह विचार ही हमें सहजता प्रदान कर सकता है।

हम दूसरे की संपन्नता, ऊँचा पद और भौतिक साधनों की उपलब्धता देखकर विचलित हो जाते हैं कि हमारे पास नहीं है वह हमारे विचारों की गरीबी का प्रमाण है और यही बात अन्दर विकट असहज भाव का संचालन करती है, और ऐसे में हमारी दिमागी सूझबूझ काम नही करती और हाथ में लिए काम में ऐसी गलतियाँ करते जाते हैं कि जो कि हमारा उत्थान तो छोड़िये पतन का कारण बनती हैं -हम आगे जाने की बजाय पीछे आ गिरते हैं और हँसी का पात्र बनते हैं ।

जीवन में सहजता का भाव न होने के वजह से अधिकतर लोग हमेशा ही असफल होते हैं। सहज भाव लाने ले लिए हमें एक तो नियमित रुप से योगासन, प्राणायाम और ध्यान करने के साथ ईश्वर का स्मरण अवश्य करना चाहिए। इससे हमारे तन, मन और विचारों के विकार बाहर निकलते हैं और तभी हम सहजता के भाव का अनुभव कर सकते हैं। याद रखने की बात है कि हमारे विकार ही अन्दर बैठकर असहजता का भाव उत्पन्न करते हैं। ईर्ष्या, द्वेष और परनिंदा जैसे गुण हम अनजाने में ही अपना लेते हैं और अंतत: जीवन में हर पल असहज होते हैं और उससे बचने के लिए आवश्यक है कि हम आध्यात्म के प्रति अपने मन और विचारों का रुझान रखें।

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

अणु
|

मेरे भीतर का अणु अब मुझे मिला है। भीतर…

अध्यात्म और विज्ञान के अंतरंग सम्बन्ध
|

वैज्ञानिक दृष्टिकोण कल्पनाशीलता एवं अंतर्ज्ञान…

आचरण का गोमुख
|

यदि आचरण का गोमुख सूखने लगे तो चरित्र की…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

सामाजिक आलेख

कविता

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं