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आशुतोष राणा -ज़मीं से फ़लक

(आशुतोष राणा के जन्मदिन पर विशेष )
 

जैसे सूर्योदय होने के पूर्व लालिमा आ जाती है, ऐसे ही महापुरुषों के आने से पूर्व शुभ संकेत हो जाया करते हैं, क्योंकि ‘अचिन्त्यो हि महात्मनां प्रभावः’ अर्थात् महात्माओं का प्रभाव अचिन्त्य होता है।

जब कोई व्यक्तित्व पौधा से वृक्ष और वृक्ष से वटवृक्ष बनता है तो सहसा आशुतोष राणा का व्यक्तित्व आँखों में कौंध जाता है। गाडरवारा की पुरानी गल्लामंडी के एक छोर पर बने घर से एक सामान्य क़द-काठी और बहुत सामान्य नयन-नक़्श वाला व्यक्ति जब ध्रुव तारे की तरह आकाश में चमकता है तो युवाओं के अंदर  एक आत्मविश्वास जगाता है कि वो भी कुछ बन सकते हैं।

आशुतोष अनवरत यात्रारत हैं उनकी यह बाह्य और आंतरिक यात्रा हमें  निमंत्रण और संबल देती है कि हम परस्पर सामान्य मूल्यों का, एवं, स्नेहमय उद्देश्यों के मेल का आनंद उठायें। आशुतोष हमें सिखाते हैं कि सामंजस्य  सदभावना का मूल है और इससे हमारे कर्म सशक्त बनते हैं। एक मात्र गुरुकृपा ही हमे संतुलित व्यक्तित्व प्रदान कर सकती है और संतुलित व्यक्तित्व में आन्तरिक संघर्ष नहीं आते है और हमारे अंदर ऐसे प्रतिद्वन्द्वी विचार उदित नहीं होते जिससे निर्णय शक्ति का ह्रास हो। पूजनीय दद्दाजी के चरणों की कृपा से आशुतोष राणा ऐसे ही उदित व्यक्तित्व को धारण करते हैं। मैंने अक़्सर उनको नज़दीक से देखा है परखा है; मैंने पाया है कि आशुतोष की भावनाएँ उनके नियंत्रण से बाहर नहीं निकलतीं। उनके व्यक्तित्व में अद्भुत निर्भयता, श्रद्धा, उत्साह और शाँति है। मैंने पाया है कि आशुतोष ने जीवन में जो प्राप्त किया  है वह उससे  संतुष्ट तो हैं लेकिन वह  निरंतर अपनी क्षमता और ज्ञान को बढ़ाने का प्रयास कर अपने जीवन को ऊँचाईयाँ देने की कोशिश में लगे रहते हैं। संतुलित व्यक्ति में ईश्वर प्रदत्त एक ऐसी विवेक बुद्धि जाग्रत रहती है जो नीर-क्षीर विवेक में बड़ी सहायता देती है।

वैसे तो माँ सरस्वती की आशुतोष भाई पर अनुपम कृपा है उनकी लेखनी का अविरल प्रवाह लोगों को मानसिक शांति प्रदान कर रहा है और अपने जीवन के निर्णय लेने में सहायक है। उनका शिक्षा पर एक अद्भुत आलेख है जिसमें उन्होंने अपने पिता जी को उद्धृत करते हुए लिखा है।

"विद्या व्यक्ति को संवेदनशील बनाने के लिए होती है संवेदनहीन बनाने के लिए नहीं होती। मैंने देखा तुम अपनी माँ से लिपटना चाहते थे लेकिन तुम दूर ही खड़े रहे, विद्या दूर खड़े व्यक्ति के पास जाने का हुनर देती है न कि अपने से जुड़े हुए से दूर करने का काम करती है। आज मुझे विद्यालय और स्कूल का अंतर समझ आया, व्यक्ति को जो शिक्षा दे वह विद्यालय, जो उसे सिर्फ़ साक्षर बनाए वह स्कूल, मैं नहीं चाहता कि मेरे बच्चे सिर्फ़ साक्षर होके डिग्रियों के बोझ से दब जाएँ। मैं अपने बच्चों को शिक्षित कर दर्द को समझने उसके बोझ को हल्का करने का महारथ देना चाहता हूँ। मैंने तुम्हें अँग्रेज़ी भाषा सीखने के लिए भेजा था आत्मीय भाव भूलने के लिए नहीं। संवेदनहीन साक्षर होने से कहीं अच्छा संवेदनशील निरक्षर होना है। इसलिए बिस्तर बाँधो और घर चलो।"

ये पंक्तियाँ जीवन का सम्पूर्ण सार समेटे हैं।

यूँ तो आशुतोष भाई के ऊपर आलेख नहीं पुस्तक लिखने का मन है लेकिन आज बस इतना ही। आज उनके जन्मदिवस के अवसर पर हम सभी आत्मीय स्वजन सच्चे हृदय से उनके सुखमय भविष्य की मंगलकामनाएँ करते हैं।

"राना जैसा विरलतम, किंचित ही व्यक्तित्व।
शुद्ध बुद्ध संकल्पमय, निर्मल मन अस्तित्व।
निर्मल मन अस्तित्व, रेणुका संग तुम्हारे।
शौर्यमान सत्येन्द्र , पुत्र हैं प्यारे प्यारे।
तुम हो दिव्य सुशील, हृदय से अपना माना।
जियो हज़ारों साल, हमारे प्रियवर राना।"  

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