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औलाद के लिए माँ की चाहत

भगवान विष्णु और लक्ष्मी के बीच ’माँ अपनी सन्तान के लिए क्या चाहती है?’  विषय पर बहुत वाद-विवाद होता रहा। और अन्त में विष्णु को लक्ष्मी ने कहा– "प्रभु जाइए मर्त्यलोक में। ‌माँ सन्तान के लिए क्या चाहती है, वहीं से आप को अवगत हो जाएगा । जाइए, झुमावती देवी के घर में जाकर इस बात का उदाहरण देखिए। वह अभी बहुत बीमार ‌और मृत्युशय्या पर है।"  

इतने में भगवान विष्णु भेष बदलकर झुमावती देवी के घर में पहुँचे और देखा कि वह बिस्तर पर लेटी हुई थी।  उनसे भगवान विष्णु पूछने लगे– "माताजी अब आप कैसी हैं?"

"और तो सब कुछ ठीक है, फिर क्या बताऊँ? अब मेरा अन्त भी आ गया . . . पर मेरे जाने के बाद बेटे का क्या होगा यही चिन्ता सता रही है।"

"अगर आप से भगवान इस वक़्त आके पूछे कि 'माता जी आप क्या चाहती हैं?' तो आप क्या माँगतीं?"

झुमावती देवी बहुत मुश्किल से बोली, “मैं तो भगवान से माँगती . . .”

"क्या माँगती?"

"भगवान मुझे और दो महीने मोहलत और दे दो।”

"दो महीने ही क्यों? दो वर्ष भी माँगतीं।"

"दो महीने के बाद ठण्डी कम हो जाएगी न,  इसलिए।"

"मरने और ठंड का क्या मतलब है? मरना तो आख़िर मरना है चाहे ठण्ड हो या गर्मी हो।"

"सो तो है। इस बहुत कड़ाके की ठण्ड में मैं मर गई तो बेटे का क्या होगा? कैसे मेरा क्रिया-कर्म करेगा! वह रोज़-रोज़ कैसे नहाएगा ठण्डे पानी से? क्रिया-कर्म में बैठे हुए पुत्रों को गरम कपड़े भी तो नहीं पहनने देते पण्डित लोग। इसलिए भगवान से मैं, जब गरम मास शुरू हो तभी मरूँ, यही मन्नत माँगती हूँ।"

भगवान को पर्याप्त उदाहरण  मिल गया था कि माता अपने सन्तति के लिए क्या चाहती है; और वह अन्तर्धान हो कर वैकुण्ठ की ओर चल दिए।

इधर झुमावती देवी का पुत्र उनकी सेवा में जुट गया ।
 

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