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और मैं बड़ी हो गई

चंचलता और नटखटता उसके हर एक नस में बसी थी जो जवानी की तरह उमड़-उमड़कर अपना इज़हार किसी न किसी स्वरूप में करती रहती थी। अभी उसकी उम्र भी तो अल्हड़ थी,  उसका लहज़ा, उसका उठना,  उसका बैठना हो या बात करना,  सब चंचलता से भरपूर।

"मैं कभी दो चोटियाँ नहीं कर पाऊँगी, क्यों? "

"क्योंकि तुम बड़ी हो गई हो? "

"तो क्या बड़े होकर दो चोटियाँ करना मना है?"

"अरे मना नहीं है,  हर इक उम्र की अवस्थाएँ बदल जाती है,  रिश्तों के नाम बदलते हैं, तो अपनी देख-रेख और बर्ताव भी तो बदलना पड़ता है या नहीं? "

"आपका मतलब है रिश्तों के नाम बदल जाने से हम भी बदल जाते है या जबरन यह बदलाव लाना पड़ता है।"

"अरे बाबा, तुमसे बात करना बहुत ही मुश्किल है मिनी, बात की खाल निकालने लगती हो। बेटा मैं नहीं समझाऊँगी तो उन ऊँच-नीच की गलियों से गुज़रने के लिये, और कौन आकर तुम्हें ये दुनियादारी के सलीके बताएगा।"

" तुम चाहती हो कि दुनियाँ की सब लड़कियाँ जब औरत बन जायें तो सब कुछ भूल जायें, हँसना, मुस्कराना, लंगड़ी खेलना, कबडी-कबडी, तू तू मैं मैं, जो बचपन से लेकर आज तक वो करती रही सब कुछ छोड़ दे और तेरी तरह बन जाए - दो पाटों के बीच पिसती हुई कोई धान का दाना। क्या हर शादी का अंत ऐसा ही होता है माँ, ये पति की सेवा, उसके माता-पिता के पाँव दबाना, उसके बच्चों का लालन-पालन करना, खाना बनाकर खिलाना, स्कूल के लिये तैयार करना और उनकी ज़रूरत और माँगों की कशमश में घिरे रहना, जैसे कोई टूटी फूटी नांव चल रही हो महाकाल की भंवर में।"

" क्या कह रही हो मिनी, ये तो बाग़ी सोच है। परिवार के लिये अपना समस्त अर्पित कर देना कुरबानी नहीं,  यह तो कर्तव्य होता है,  वो मेरे हैं और उनका परिवार भी मेरा है।"

"यह तुम कह रही हो माँ, अब मैं छोटी नहीं हूँ जो यह भी न समझ सकूँ। आप जिनकी बात कर रही है, वह मेरे पिता होते हुए भी मेरे पिता नहीं है। पिता जैसा उनमें कुछ भी नहीं है। उन्हें यह तक मालूम नहीं है कि किस कक्षा में मैं पढ़ती हूँ, कब मीरा परीक्षा होती है, कब घर से जाती हूँ, कब आती हूँ, मेरा छोटा भाई किस पाठशाला में जाता है, क्या ओढ़ता है, क्या बिछाता है। बस साल में एक दो बार अपने स्वार्थ भरी ज़िंदगी से जब होश में होते हैं तो पूछ लेते हैं, "पढ़ाई कैसे चल रही है" और ऊपर से सुझाव देते हैं "घर से बाहर ज़्यादा मत रहा करो,माँ की बात सुना और माना करो।" मिनी अपनी उम्र की बाग़ी सोच को उड़ेलते हुए कहती रही।

"मिनी यह आज क्या हो गया है तुम्हें, जो अपने मन के ज्वालामुखी के इस अनकही पीड़ा को उंड़ेल रही हो।" कहते हुए माँ की आँखों में एक अनकहे दरद की परछाइयाँ मंडराने लगीं।

" माँ तुम तो ऐसे कहती हो जैसे वो कभी तुम्हारी बात सुनते हैं और मानते हैं - मुझे तो लगता है उन्हें अपने नशे में और जवानी की चौखट पर बैठी मैत्री के सिवा कुछ याद नहीं रहता। क्या तुम इसे कर्तव्य कहती हो जो फ़कत एक तरफ़ा ही रह गया है।"

मिनी कहती रही और माँ सुनती रही, माँ की ज़ुबान को अब ताले लग गये। सच ही तो कह रही है मिनी। दिखने में वो चुलबुली है पर समझ में काफी सतर्क है। दसवीं में पढ़ रही है पर दुनियादारी को समझते हुए न समझने का दिखावा करती है।

मिनी अपनी माँ की सखी है, उसके अंतरमन के घट को छू आती है। वहाँ पर जो ज़ख़्मों के छाले हैं कभी-कभी उन्हें ऐसी ही बातों से फोड़ आती है - ताकि माँ के दिल का दर्द ज़हर बन जाने के पहले अश्रु बनकर बह निकले। उसके मन के संघर्ष से वह भली भाँति परिचित थी। अपनी तरफ़ से एक अनजान दिखावे को वह ओढ़कर विचरती रहती है, पर नज़र चारों ओर उस घर की चारदिवारी के अंदर और बाहर के आसपास मंडराती है।

जिस दहलीज़ की मर्यादा के सुर माँ को अलापते हुए सुनती, उसीका रोना रोते एक दिन, जाने किस बोझ को अपने महीन आँचल में न संजो पाई तो बेटी को पास बिठाकर माँ कहती रही.....

" बेटा घर की बात घर में ही रहे तो बेहतर। मुझे तेरी भी तो चिंता लगी रहती है। साल भर में कोई अच्छा लड़का देखकर तेरी शादी कर दूँगी, फिर मेरी नैया का जो हो सो हो। तेरा भाई तो लड़का है। ज़िन्दगी के सफ़र में मर्दों को कई दिशाएँ मिलती हैं, कई मोड़ आते हैं जहाँ वो अपना पड़ाव डाल लेते हैं। दुनिया उसे गवारा कर पाती है पर औरत का एक ग़लत कदम उसी मर्यादा के उल्लंघन के नाम से कलंकित हो जाता है। जिसके बाद उम्मीदों के सारे दरवाज़े अपने आप उस पर बंद होते चले जाते हैं।"

अब मिनी कुछ ज़्यादा ग़ौर से सुनने लगी और सोचकर कि माँ क्यों ऐसा कह रही है और क्या कहना चाह रही है - जहाँ उसकी सोच उसकी जुबान का साथ देने से कतरा रही है।

घर के आँगन को पार करते हुए दो बार मैत्री पिछवाड़े के कमरे में पिताजी के साथ बेधड़क चली गई थी और तब माँ की उदासी और गहरी होती हुई देखी थी उसने। मिनी की पैनी नज़रों से यह सब छुपा नहीं था।

" माँ तुम किस सन्दर्भ में बात कर रही हो? कौन-सा डर मन में पाल लिया है मुझे बताओ, शायद अपने ढंग से कुछ सोच पाऊँ और किसी सुझाव का दरवाज़ा खटखटाऊँ।" कहते हुए मिनी ने अपने हाथों में माँ का चेहरे इस तरह ले लिया, पल भर को लगा वह माँ की माँ बन गई हो। उस प्यार में नर्मी थी, गर्मी थी, अपनापन था।

"मिनी"...और माँ आँसुओं के दरिया में डूबती हुई नज़र आई।

" माँ कहो ना, क्या बात है जो तुम चाहकर भी नहीं कह पा रही हो, कुछ तो है जो तुम चाहकर भी कह नहीं पा रही हो, पर सच मानो माँ तुम्हारे साए में बड़ी होते होते मैं अब इतनी छोटी भी नहीं रही कि अनकहे शब्दों का अर्थ न समझ सकूँ, पर तुम्हारी ज़ुबान से सुनना चाहती हूँ, कि कौन सी बात तुम्हारे मन पर बोझ बनी हुई है....? "

"बेटी तुम्हारे पिताजी तुम्हारे रिश्ते की बात कर रहे थे.... और मैं जानती हूँ उन रिश्तों की नींव कितनी कमज़ोर होती है....!!"

मैं सुनकर बहरी हो गई मिनी, ब्रह्मांड सारा धरातल पर रखे उसके पावों में सिमट गया, जैसे किसी ने उसे पूरे अस्तित्व के साथ उछाल दिया हो, कुछ इस तरह कि उसका वजूद बिखरता चला गया। सोच ने साथ छोड़ दिया पल में ही,  और वह जड़ बनी खाली आखों से माँ की ओर देखती रही। जाने क्या सोचकर उसका शरीर अपने बचपन की सारी चंचलताएं, शोख़ियाँ,चुलबुलाहट भूल बैठा ओर उसे लगा कि वह उस औरत का साया बन गई है जो उसकी जन्मदातिनी है। क्या वरसे में उसे भी यही सब कुछ मिलने वाला है इस घर की चौखट से। ...इस सोच से वह सिहर सी उठी। मन ही मन में पल के बदलाव में अपने मन के मनोबल को तोलती रही, सोच के बदलाव को महसूस करती रही अपनी उस मौन परिवर्तन में।

"बस कोई लड़का तलाश करके तेरे हाथ पीले करना चाहती हूँ और यह प्रार्थना करूँगी कि इस घर से तू बहुत दूर चली जा, जहाँ ये ज़हरीली हवाएँ साँसों में घुटन न पैदा कर सके....!!"

चर-चर की आवाज के साथ पुराने दरवाज़े का चरमराता किवाड़ खुला और अंदर आने वालों में पहले पिा फिर मैत्री और साथ में एक नवयुवक का नया चहरा नज़र आया, जो अपनी भूखी नज़रों से मिनी पर नज़र डाल कर आगे बढ़ गया, आँगन के उस पार वाले कमरे की ओर। पिताजी ने वहाँ कुछ ओताक जैसा माहौल बना रक्खा था। पान का बक्सा, बीड़यों के चंद छल्ले,माचीस की तीलियाँ यहाँ-वहाँ बिखरी भरी और खाली बोतलों की महक से वह कमरा गंधमय होता जा रहा था। कभी-कभी माँ को लातों से मारकर उसकी सफाई की ताकीद करते हुए सुना है, पर माँ वह काम कब करती है यह मैंने खुली आँखों से कभी नहीं देखा, पर जानती हूँ हमारी पलकों में नींद भर जाने के बाद वह करती रही होगी, यह है मेरी माँ।

सोच के भी डर लगने लगता है कि ऐ औरत क्या यही तेरी कहानी है? क्या इन बेजुबान ज़ख्मों को देखकर आदम का दामन आयुओं से नहीं भरता? और ऐसे कई सिलसिलों को देखकर, उन्हें महसूस करते हुए मुझे लग रहा है जैसे मैं वह दौर खुद जी रही हूँ - उन दरिंदों के चंगुल का शिकार बनकर, जिनमें आदमीयत का नामों-निशान बाकी नहीं। पर आज जो हादसा हुआ उसके गुजर जाने के बाद अब मैं बड़ी हो गई हूँ !!

वहीं उस चौखट पर बचपन लुट गया, उसकी मासूमियत लुट गई। वो खिलखिलाना, वो चुलबुलाहट, वो नटखटता उस मानवता के आगे घुटने टेक कर रह गई। शायद अमानुष बनना ज्यादा आसान है। मानुष तो बस कीमत चुकाने के लिये होता है।

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