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बबलू की बिल्ली

बबलू की बिल्ली का नाम मिनि था। स्कूल से घर आने के बाद वह अपनी बिल्ली के साथ खेला करता था। मम्मी और पापा ने उसे अनेक बार समझाया था कि स्कूल से घर आने के बाद वह खाना खा लेने के बाद सीधे पढ़ाई–लिखाई में लग जाए। लेकिन मिनि के प्रति उसका लगाव कुछ इस प्रकार से बढ़ गया था कि वह उसके बिना एक पल भी नहीं रह सकता था। छुट्टी वाले दिन तो मिनि के पीछे उसे खाने–पीने की सुध भी नहीं रहती थी। 

उसके पापा बहुत बड़े डॉक्टर थे। वे बबलू को भी एक बहुत बड़ा डॉक्टर बनाना चाहते थे। बबलू का बिल्ली के प्रति इतना अधिक लगाव देखकर उन्हें ग़ुस्सा आ जाता था। उन्होंने भी बबलू को एक–दो बार डाँटा था। लेकिन बात यह थी कि उनके डॉंटते ही बबलू रोने लगता था और खाना–पीना छोड़ देता था। इस वज़ह से वे उसे अधिक डाँट भी नहीं सकते थे। बबलू घर में अकेला था। इसलिए मम्मी–पापा का उस पर बहुत अधिक स्नेह था। लेकिन दोनों को चिंता भी होती थी कि बबलू पढ़ाई पर उतना ध्यान नहीं देता जितना कि देना चाहिए। 

एक दिन बबलू स्कूल से घर आया तो उसे पता चला कि उसकी बिल्ली ने चार बच्चों को जन्म दिया है। वह तुरंत बिल्ली और उसके बच्चों को देखने गया। मिनि अपने चारों बच्चों को दूध पिला रही थी। बबलू को देखकर वह पूँछ हिलाने लगी। मिनि के बच्चों को देखकर बबलू बहुत ख़ुश हुआ और एक–एक को गोद में उठा लिया। अब तो बबलू को किसी की ज़रूरत ही नहीं थी। वह दिन–रात उन्हीं में मगन हो गया। इसका उसकी पढ़ाई पर बुरा असर हुआ और इस बार के यूनिट टेस्ट में उसे बहुत कम अंक मिले। इस वज़ह से उसके माता–पिता नाराज़ हुए और उनकी चिंता भी बढ़ गई।

पिता ने तय कर लिया कि वे किसी भी हालत में बबलू की पढ़ाई बरबाद नहीं होने देंगे। कुछ दिन बीत गये। दोपहर का समय था। बबलू अभी–अभी स्कूल से आया था। आते ही माँ ने कहा कि वह मुँह–हाथ धो ले और जल्दी से खाना खा ले लेकिन बबलू तो रोज़ की तरह आज भी सबसे पहले अपनी बिल्ली के पास गया। मिनि बेचैन होकर इधर–उधर घूम रही थी और थोड़ी ग़ुस्से में भी लग रही थी। वह बार–बार म्यायूँ–म्यायूँ कर रही थी। बिल्ली के बच्चों को न देखकर बबलू भी परेशान हो गया। इधर–उधर देख लेने के बाद भी जब बिल्ली के बच्चे न दिखे तो वह उल्टे पाँव वापस अपनी माँ के पास आया और उनसे पूछने लगा।

“मम्मी. . .  बिल्ली के सब बच्चे कहाँ हैं? एक भी बच्चा दिखाई नहीं दे रहा है।”

मम्मी बोली, “पापा ने बिल्ली के बच्चों को बेच दिया है, अब वे बच्चे यहाँ नहीं आएँगे। वे सब बिल्ली के बच्चों को लेकर कहीं दूसरी जगह चले गये हैं।”

यह सुनकर बबलू ज़ोर–ज़ोर से रोने लगा। माँजानती थी कि बबलू रोएगा इसलिए वह उसे प्यार से समझाने लगी। लेकिन बबलू के आँसू थमने का नाम न ले रहे थे। माँ का समझाना बेकार गया। शाम तक बबलू ने कुछ खाया–पीया नहीं। रात में उसके पापा जब घर आये तो बबलू को पहले को प्यार से समझाया लेकिन जब वो नहीं माना तो उसे डाँटने लगे। बबलू बार–बार बिल्ली के बच्चों को वापस लाने के लिए कह रहा था। यह सुनकर उसके पापा का क्रोध बढ़ गया और उन्होंने कसकर बबलू को दो थप्पड़ मार दिये। और यह कहा कि अगर वह चुप नहीं हुआ तो वे मिनि को भी किसी और को दे देंगे। मार खाकर बबलू को इतना दुख नहीं हुआ जितना कि पापा के मुँह से यह सुनकर कि वे मिनि को भी किसी और को दे देंगे। वह और ज़ोर–ज़ोर से रोने लगा और दौड़ता हुआ मिनि के पास चला गया। मिनि ने भी अपने बच्चों के खो जाने के दुख में सुबह से दूध तक नहीं पीया था। बबलू मिनि को गोद में लेकर रोने लगा। यह दृश्य देखकर बबलू की माँ की आँखों में भी आँसू आ गये। पिता को भी अपनी ग़लती समझ में आने लगी थी। दोनों ने बबलू को फिर से समझाया लेकिन बबलू ज़ोर–ज़ोर से चीखने लगा। माता–पिता दोनों घर में चले गए। बबलू मिनि को गोद में लिए हुए रोते–रोते वहीं सो गया।

सुबह को जब बबलू की नींद खुली तो उसकी गोद में मिनि नहीं थी। वह बहुत ही घबरा गया। उसे लगा कि पापा ने मिनी को भी किसी को दे दिया। लेकिन उसकी ख़ुशी का ठिकाना ही नहीं रहा जब उसने देखा कि कुछ ही दूरी पर मिनि अपने चारों बच्चों को दूध पिला रही है। उसके बाद बबलू की नज़र अपने माता–पिता पर पड़ी। वे सामने खड़े मुस्कुरा रहे थे। बबलू उनके पास गया और पापा ने उसे गले से लगा लिया। बबलू नें माता–पिता को वचन दिया कि वो अब से पढ़ाई पर अधिक ध्यान देगा और तब से बबलू अपने वचन का पालन भी करने लगा।

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