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बचा रहे आपस का प्रेम

एक विचार अमूर्त सा
कौंधता है भीतर
कसमसाता है बीज की तरह
हौले से
सिर उठाती है कविता
फूट रहा हो जैसे
कोई अँखुआ
धरती को भेद कर;
 
तना बनेगा
शाखें निकलेंगी
पत्तियां प्रकटेंगी
एक दिन भरा-पूरा
हरा-भरा
पेड़ बनेगी कविता
 
पेड़ ही तो है कविता
इस झुलसाने वाले समय में
कविता से इतर
छाँव कहाँ
सुकून कहाँ !
यहीं तो मिल बैठ सकते हैं
सब साथ-साथ
चल पड़ने को फिर से
तरो ताज़ा हो कर
 
लकड़हारों को
कहाँ सुहाती है कविता
कहाँ सुहाता है उन्हें
लोगों का मिलना जुलना
प्रेम से बोलना बतियाना
भयभीत करती रहती है उन्हें
कविता के पत्तों की
खड़खड़ाहट
इसीलिये तो घूम रहे हैं वे
हाथ में कुल्हाड़ी लिये
हिंसक शब्दों के हत्थे वाली
 
बचाना है हमें कविता को
इन क्रूर लकड़हारों से
ताकि निर्भीक हो
बैठ सकें हम
इसकी छाँव में
 
ताकि
बचा रहे
आपस का प्रेम

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