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बच्चों के लिये लेखन

वर्तमान में यह सुखद और शुभ संकेत है कि बच्चों के लिये ख़ूब और ख़ूबसूरती से न केवल लिखा जा रहा है बल्कि उनसे संबंधित हर विषय को लेकर कुछ न कुछ रोचक, ज्ञानवर्धक और मनोरंजक साहित्य उपलब्ध कराया जा रहा है। यह एक पहलू है।

दूसरा पहलू यह है कि हमें अपने लेखन में मनोवैज्ञानिक रूप से भी सजग रहना आवश्यक है कि हम जो बच्चों को रचना देने जा रहे हैं वह उनके मन-मस्तिष्क और दिल को कितना सकारात्मक रूप से प्रभावित करेगी?

हमें इसके लिये न केवल सजग रहना होगा बल्कि गंभीर भी बनना होगा। हमें उदारवादी, संकोची स्वभाव से बचते हुये धैर्य और दृढ़ता का पक्ष मज़बूत करना होगा। ऐसा करना हमारे लेखन के लिये बहुत ही अहम है। हमारे लेखन में हमें विषय-भाव प्रस्तुति के लिये शब्द चयन का भी ध्यान रखना है। आजकल बोलचाल की भाषा में प्रयुक्त शब्दों को रचना में सीधे-सीधे उपयोग में लिया जा रहा है, यह न ठीक है, न उचित। हम भी वही करने लगेंगे तो फिर सही कौन करेगा?

  • हमें हिंदी की रचनाओं में विशेष तौर से पद्य में अँग्रज़ी शब्दों के उपयोग से बचना चाहिये। 
  • शब्द और व्याकरण की अशुद्धियाँ न हों,यह भी ध्यान रखना है।
  • पद्य की रचनाओं में तुक को प्राथमिकता देना आवश्यक है। इससे बच्चों को पढ़ने, सीखने और याद करने में कठिनाई नहीं होती। 
  • रचना जिस उम्र तक के बच्चों को लिखी जा रही है,शब्द चयन में हमें ध्यान रखना होगा। अत्यंत कठिन शब्द उपयोग में न लिये जाएँ।   
  • रचना लिखने के बाद विमर्श को भी स्थान मिलना चाहिये। साहित्य में रुचि रखने वाले और सहजता से उपलब्ध हमारे घनिष्ठों से, लिखी गई रचना के संबंध में उनसे विमर्श कर सुझाव लेने में कोई हर्ज़ नहीं होना चाहिये।
  • फिर इसी रचना को, परिवार के बच्चों से पढ़वाकर उनकी प्रतिक्रिया समझने का भी प्रयास कर, यदि रचना में सुधार की आवश्यकता नज़र आये तो वांछित सुधार कर लेना चाहिये। ऐसा करने से हमारी रचना हमारे उद्देश्य को सफल और सार्थक करने में खरी उतरेगी।
  • हमने कितना लिखा? उससे ज्यादा महत्वपूर्ण है हमने कितना अच्छा ... सार्थक लिखा।

अस्तु - आज पटल पर बात रखने का अवसर मिला तो प्रयास और साहस किया है। कमियाँ और असहमति हो सकती हैं। क्षमा करें।

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