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बदला

अचानक गाड़ी रुक गई।

"क्या हुआ... गाड़ी क्यों रोक दी?" सबाना ने पूछा।

"बस आगे जाने का मन नहीं... ज़िंदगी भी कुछ ऐसी ही है सब्बू।" वह स्वयं को नहीं सम्भाल पाई। आँखों में मेघ उमड़ने लगे। कार पार्क कर चाबी हाथ में घूमाते हुए वीना पार्क की हरी भरी घास की तरफ बढ़ गई। दोनों गार्डन की मखमली घास पर टहलने लगीं।"वीनी..." कुछ पूछना चाह कर भी सबाना आगे कुछ न बोल पाई।

"औरत कई रूपों में बँट जाती है," कह कर वीना एकदम चुप हो गई।

पूरा एक घण्टा हो गया कार में घूमते। हँसते-हँसाते दोनों बीते दिनों की याद ताज़ा करती रहीं। अचानक वीना चुप हो गई। सबाना ने गाड़ी चलाती वीना के चेहरे को ध्यान से देखा। जो कभी फूलों की तरह खिला रहता था ....अब....समय कितना अन्तर ला देता है।

"तू खुश तो है ना?" सबाना ने उसका चेहरा देखते हुए पूछा।

"हाँ... इतनी खुश.....हँसती हूँ तो रोना आता है। अधिक खुश हूँ ना...इतने साल हो गए शादी को। मैं ही एडजस्ट हो पाई हूँ....मन को नहीं कर पाई हूँ.....क्या कमी है?" वीना ने ठहरे लहजे में कहा, "शादी के बाद अगर पवन केवल मेरे साथ जीवन का सफर शुरू करता तो मैं कितनी सुखी होती। सब्बू वह मेरे होते हुए भी...." वीना एक जख्मी हँसी हँसते हुए बोली, "तुम तो जानती हो मेरे पति का स्वभाव कैसा है...? उसकी आँखों में दर्द उभरा।

"क्या अभी भी दूसरी औरत का कोई चक्कर...?"

"हाँ कभी खत्म नहीं होनेवाली आदत.... फिर नया चक्कर....."

"आखिर क्यों भागता है पवन दूसरी औरतों के पीछे? तुम जैसी सुन्दर सुशील पत्नी को छोड़ कर...।" सबाना ने हैरत से पूछा, "वह तुम्हारे बिना एक पल भी रह नहीं पाता है फिर भी...? सच है कुछ मर्द...।"

"हाँ...सभी जानते है मैं बहुत अमीर औरत हूँ लेकिन सच यह है कि मैं एक गरीब औरत हूँ," एक उदास मुस्कान उसके होंठों पर फैल गई।

"क्या तुम और गरीब...? तुम खुद करोड़ों की मालकिन...."

"हाँ सब्बू मैं बहुत गरीब हूँ। धन-दौलत से कोई सुखी नहीं होता....स्त्री करोड़पति क्यूँ न हो .... अगर उसका पति चरित्रहीन हो तो उसकी बीबी बेहद गरीब हुई न। भले ही वह मेरी तरह करोड़पति हो.... मुझसे बढ़कर कोई गरीब नहीं। ठीक इसी तरह अगर किसी मर्द की बीबी वफ़ादार न हो तो ... सच सब्बू मैं गरीब हूँ...बहुत गरीब।"

"ये कैसी परिभाषा है?" उसके दुख को समझते हुए बोली। यही ज़िंदगी की सच्ची परिभाषा है। इस दुनिया में कुछ अपवादों को छोड़कर लगभग हर औरत मेरी तरह गरीब है।" वीना ने बड़ी ज़हरीली हँसी हँस कर कहा। उस कड़वाहट से भरी हँसी में सारा इतिहास सिमट आया।

"यानी तेरा कहना है कि कुछ को छोड़कर.... हर पुरुष....?"

"अक्सर मौका मिलने पर हर पुरुष पराई औरत पर डोरे डालने से नहीं चूकता। लाखों में कुछ को छोड़कर कई औरतें भी हैं जो ....," फीकी हँसी हँसते हुए कहा।

"मैं पति को दस बार मोहब्बत करती हूँ और दूसरी ओर बीस बार नफ़रत। कुछ भी तो मेरा अपना नहीं लगता।....जानती है आधुनिक समाज में औरतें इसलिए पेट भर कर खाना नहीं खा सकती कि उनके शरीर की बनावट बिगड़ जायेगी।....घर का काम नहीं कर सकती ...हथेलियाँ खुरदरी हो जायेंगी।......पति का रातों में जागकर इन्तज़ार करने से कहीं सुन्दर आँखों के गिर्द स्याह रंग के घेरे न पड़ जाएँ। फिर भी पति....," उसके दिल में तूफ़ान मचल रहा था। सबाना ने उसका हाथ अपने हाथ में लेकर अनमनी सी बैठी उसे देखने लगी।

"क्या मैंने ऐसा जीवन चाहा था?" वीना ने उसकी आँखों में झाँक कर पूछा। "तुझे देखकर आज दर्द का बांध टूट गया....ओह मुझे क्या हो गया? तुझे भी दुखी कर दिया।"

"चल तेरे बेटे का स्कूल से आने का समय हो गया है तुझे पहुँचा देती हूँ। सच यह कुछ घण्टे तेरे साथ बहुत अच्छे बीते। अब तेरे पति का इस शहर में तबादला हो गया....अब रोज़ मिलेगे।" वह सबाना को उसके घर पहुँचा कर अपने घर पहुँची। बाहर लान में बिछी एक कुर्सी पर आ बैठी। सामने लान पर उसकी दृष्टि गई। लान में रंग बिरंगे फूल खिले हुए थे।

कोठी के दरवाज़े पर दरबान खड़ा सुस्ता रहा था। आसमान में धूल ही धूल छाई हुई थी। कोठी में नौकरों की चहल-पहल थी।

वीना बहुत सुन्दर है। कालेज में वह प्रोफेसरों से लेकर लड़कों तक समान रूप से चर्चित थी। वीना ने अपने अमीर होने का प्रभाव किसी पर नहीं डाला। वह हर बात बड़ी सादगी से ग्रहण करती। सबाना गरीब होते हुए भी उसके करीब थी।

हलकी-हलकी बूँदें गिरने लगीं वीना को हल्की बूँदो में भीगना अच्छा लग रहा था। कुछ देर पहले उमस थी अब हवा में कुछ ठंडक महसूस होने लगी। शायद तेज वर्षा होने वाली है। पवन कहाँ चला गया है अभी तक घर नहीं आया।

वह चिंतित होते-होते हँस पड़ी। ओह मैं पत्नी की तरह चिंता करने लगी हूँ....पर क्या वह पति की तरह साथ निभा पाता है? जसोदा आ कर पैरों के पास बैठ कर रोने लगी। उसकी आँख व गाल पर नीले निशान देख उसने पूछा।

"अरे तेरी यह हालत कैसे हुई?"

"बीबी जी शराब पीने के बाद शेर बना, अपनी ही औरत पर हाथ उठाता है। सारा दिन उसकी व बच्चों की रोटी जुटाने में लगी रहती हूँ। फिर भी पति की हाथ की मार खाती हूँ.......अपने शरीर की पीड़ा भुलाकर उसे सुख देती हूँ। उसका हर जुल्म बरदास्त करते हुए उसके लिए शराब का इन्तजाम करती हूँ....फिर भी।"

अपने पल्लू से आँसू पोंछते हुए गोद में लिए दूध पीते बच्चे की ओर इशारा करते कहने लगी, "जब इनकी भूख देखती हूँ कलेजा मुँह को आ जाता है। इसलिए पाँच जगह चौका बासन करने जाती हूँ। दिन भर इनके लिए भागती फिरती हूँ।" वह सिसक-सिसक कर रोने लगी। "और मेम साब ....कभी लूटती भी हूँ इनके लिए....पति के लिए ही ना...।"

"क्या...?" वीना के मुँह से आश्चर्य भरे शब्द निकले।

"जहाँ मैं काम करने जाती हूँ.....पत्नी घर न हो....या मौका मिलते ही मेरी मजबूरी का फायदा उठाते हैं.....काम छूटने का डर....हम कामवालियों को कितनी परेशानियों से सामना करना पड़ता है।"

वह चुप बैठी रह गई। इसका दुख....? जसोदा रोते हुए बोली, "आप फिकर ना करे मेमसाब, अब तो आदत पड़ गई है।" पल्लू से आँसू पोंछे। होंठों पर जुबान फेरते, झिझकते हुए बोली, "कुछ रुपये चाहिएँ....रुपये हाथ में आएंगे तो उसे दूँगी.... वह मुझे मना लेगा। मेमसाब वह मुझे बहुत चाहता है....बहुत प्यार करता है।" कहते-कहते शरमा गई। उसे अपने पति पर प्यार उमड़ आया। उसका क्रोध गायब हो गया। गालों में शर्म की लाली छा गई। मधुर क्ष्णों की याद आते ही होंठों पर हल्की सी मुस्कान रेंग गईं नीची नज़र कर बच्चे को दूध पिलाने लगी।

काला रंग कसी हुई देह। बालों को कस कर जूड़ा बनाया हुआ। आँसुओं से भीगी पलकें, पानीदार झील सी आँखें रोने से लाल हो गई थीं। गले में रंग-बिरगी मोतियों की तीन-चार मालायें। स्वस्थ हाथों में काँच व लाख की चुड़ियाँ। मेहनत करने से बना सौन्दर्य।

"मेमसाब मैंने इसे कितनी बार समझाया छोड़ दे इसे पर यह नहीं मानती है।" दूसरी नौकरानी कम्मो ने आकर कहा।

"कैसे छोड़ दूँ मेमसाब? वो मुझे बहुत चाहता है। मेरे सिवाय किसी दूसरी औरत को आँख उठाकर नहीं देखता," जसोदा बोली।

वीना सोचने लगी। पति-पत्नी का अपनी परिधियों के घेरे में बँधे रहने का भाव इनमें बहुत अधिक है। जसोदा व उसके पति का प्यार देख वह विचलित हो गई। जसोदा का प्यार बचाने के लिए बेचैन हो गई। अनजाने में पर्स में हाथ डाल कुछ नोट निकाल उसकी की तरफ बढ़ा दिये। जसोदा की भीगी आँखों में चमक आ गई। वह उठ खड़ी हुई। उस की आँखों में खुशी देख वीना को लगा मैंने इसका प्यार बचा लिया। उसके मन का जैसे कोई कोना तृप्त हो गया।

शाम बड़ी उदास थी। धीरे-धीरे रात घिर आईं वीना खिड़की के पास खड़ी बाहर देख रही थी। वह सोच रही थी हर घर में खिड़कियाँ क्यों होती है। खिड़कियों से चाँद क्यों नज़र आता है। यह कसूर खिड़कियों का तो नहीं। ना दिखाई देने वाले चाँद का। ...कसूर तो होता है मोहब्बत करने वालों का। चाँद अकेला क्यों है...? चाँद को देख किसी को अपने अकेला होने का अहसास होता हैं ....किसी की यादें ताज़ा होती हैं....यह कसूर तो है मन का। खिड़कियाँ तो घरों को, दिलों को रोशन करती है।

वीना पति को बहुत चाहती है। पति का अपने प्रति प्रेम न होना, उसे अपना अपमान लगता। शरीर एकदम काँटों से भर उठा।

एक कार आ कर गेट पर रुकी। कार में पवन का मिसेज पायल के साथ आना देख दिल में पीड़ा भरा आक्रोश उत्पन्न हो गया। पवन को गेट के पास छोड़ वह हँसते हुए गाड़ी आगे बढ़ा ले गई। पायल की हँसी वीना को ज़हर बुझी छुरी की तरह लगी।

"आज गाड़ी कहाँ छोड़ आए," उसने तीखी आवाज़ में पूछा।

उसके स्वर की तेज़ी व उसकी भावनाओं को समझ वह अपनी कमज़ोरी छिपाते हुए गुस्से से पाँव पटकते हुए दूसरे कमरे में चला गया। जब भी वीना किसी बात का विरोध करती वह आपे से बाहर हो जाता। वीना पति के हर रूप को पहचानती है। चार साल के विवाहित जीवन में अपनी पति के विचारों को कभी सच्चे मन से झेल नहीं पाई।

मैं कितना लोभ भरा जागरण करती हूँ, बिस्तर पर अकेली पड़ी। तुम्हें रोक पाने का सामर्थ्य क्यों ना संजो पाई। वह स्वयं से प्रश्न करती। उसे लगा पवन उसका अपना है किन्तु दूरी के अतिरिक्त कहीं से भी समीपता नहीं पाती। हर पल बेचैनी।

कुछ शादियाँ कर्ज़ की तरह निभाई जाती है। ऐसी शादियों का परिणाम होता है कि कहीं पति कहीं पत्नी, दोनों एक दूसरे की कमी में किसी और की तलाश में भटकते रहते हैं। वीना के मन में जलन के न जाने कितने सोते अन्दर ही अन्दर पनप कर बाहर निकलने को घुमड़ने लगे।

वह सोच रही थी प्रेम जबरदस्ती तो नहीं पाया जा सकता। प्रेम तो एक आत्मीक अनुभव है। दिल का दिल से सम्बन्ध होता है।

दुनिया के किसी भी समाज में दिल के मिलने का कोई नियम नहीं है। शरीर के मिलन के दुनिया के हर समाज में नियम बने हुए है।

नींद आने तक वह पति को टकटकी लगाये देखती रही। वह बे फिकर सो रहा था। रात ज्यों-ज्यों घिरती गई उसकी बेचैनी बढ़ती गई। मन को अकेलेपन का बोझ सालने लगा।

सुबह वह देर से उठी। बिना मेकअप के उसका चेहरा बड़ा सलोना लग रहा था। बाल बिखर गए थे। खिड़की से हवा का झोंका आ उसके बदन को छू गया। वह अंगड़ाई लेने लगी। उसकी शिराएँ कसमसा उठीं गहरी साँसें सीने में हलचल मचा गईं इतने रूप को छोड़...पवन नदी नालों को बाँधता फिरता हैं घर की नदी तो...? वह बेचैनी से मोम की तरह पिघलने लगी। अन्तर्मन में पति के प्रति आक्रोश है। वह बार- बार टूट कर बहता हैं दोनों के मन की विपरीत दिशा में तनातनी...बेबसी....रिश्तों का खोखलापन। उसके मन की स्थिति बड़ी विचित्र थी। खुशनुमा मौसम था। होटल के विशाल लान में रंग बिरंगे छातों के नीचे सुन्दर टेबल कुर्सियाँ लगी हुई थीं। चारों ओर स्त्री पुरुष बैठे गपशप कर रहे थे। आज वीना भी पवन के साथ आई थी। मिसेज अनामिका ने अन्दर आते ही पवन को देखा। लपक कर उनके पास आई। वीना देख रही थी उसको देखते ही पवन की आँखों में चमक आ गई है।

"हैलो अनी....बहुत दिनों बाद दर्शन दिए। कैसा रहा तुम्हारा टूर? वहाँ जाकर और निखर गई...बहुत खूब...."

उसकी आँखों में चमक उभरी देख वीना के दिल में बिजली की लहर सी कौंध गई। पवन अनामिका को प्रशंसा भरी नज़रों से देख रहा था।

आधुनिक नारी समाज पुरुषों के सम्मुख जब बिजली की तरह चमकता है तब पुरुष कैसे रोके अपने आपको।

"चलो हम लोग किसी दूसरी टेबल पर पार्टी जमाते हैं...खूब बातें करनी हैं... और तुम वीनी हमारे साथ बोर होने की आवश्यकता नहीं...."

वीना ने देखा पवन उठ कर उसके साथ चलने लगा तो जाते हुए अनामिका के होंठों पर कंटीली मुस्कान थी। यह रहस्यमयी मुस्कान ...वीना में व्यग्रता की चुनचुनाहट भर गई। मन में स्वतः शक की सुई चुभ गई। चुभन इतनी तेज़ थी कि कलेजे में गहराईं तक उतरती चली गई। वह अपना भटकता मन लिए कुछ देर बैठी रही। सारा कलाप देख वह एकदम व्यग्र हो गई। काश ...इन सबको झेल पाने की शक्ति कभी समाप्त नहीं होती। पति का इस तरह उसे छोड़ कर दूसरी औरत के साथ जाना। उसके हृदय के तार-तार झन्ना कर एकदम स्तब्ध हो गए। पलकें स्थिर हो गईं और दृष्टि में एक जलता प्रश्न नाच उठा। उसके स्वर्णिम महल ढह गए। वीना के मन की स्थिति विकृत हो गई। भीतर ही भीतर आकुलता अपने पंख फैलाने लगी। एक असामान्य क्रोध जाग्रत हो उठा। उसे लगा कुछ पलों के लिए हवा अचल हो गई है। द्वन्द्व व हलचल...इस पर स्वयं को साधने का यथा संभव प्रयास।

पति अक्सर अपनी महिला मित्र का परिचय देते समय घनिष्ट मित्र की पत्नी का रिश्ता स्वीकारते हैं। शेष सब छिपा लेते हैं। अपनी व्यवहार कुशलता से एक भ्रम की दीवार रखते हैं। वह कुछ देर आँखें बंद किए बैठी भीतर के क्रोध को पीने की कोशिश करने लगी। पर सयंत न हुईं और अधिक उद्विग्न व आकुल हो गई। ईर्ष्या द्वेष के बदलों से घिरी अपना आत्मनियंत्रण खोने लगी। पवन का उसे इस तरह छोड़कर जाना अपना अपमान लगा।

बदला....बदला। पति से जो प्यार नहीं मिला वह अन्य से लेने को आतुर हो उठी। ईर्ष्या से ग्रसित क्रोध पूर्ण कदम ....अपने परिवेश से टकरा कर पथभ्रष्ट हो जाना स्वाभाविक है। वीना के स्त्रीयोचित दम्भ एवं अहं को एक गहरी चोट लगी है आज। अन्दरूनी कुण्ठा ने उसे सुलगती आग में झोंक दिया।

पवन को क्या ज्ञात नहीं कि रौंदी हुई राख में छिपी चिनगारी अपने आप मे कितनी विनाशकारी होती है। अब सन्तुष्ट रहे तो कैसे? कोई भी नारी अपने बीच किसी को सहन नहीं कर सकती। अन्तराल में वीरानी विषाक्त परछाईयाँ पति से बदला लेने को आतूर हो उठीं। एक भयंकर विरोधी भाव। वीना के दिल में पति के प्रति कड़वाहट नफ़रत में बदल गई। उहपोह द्वन्द्व, मन स्थिति में उसे बार-बार बदले की आग उकसा रही थी। सभी आदर्श सोचों को धकेल तन-मन की हलचलों में मुक्त होने के भाव। आज वीना का मन अगला - पिछला भूलकर विश्राम चाहता है अज्ञात विवशता के अन्तर्गत उसका मन किसी के सामने समर्पण करने की सोच बैठी। बदला...बदला। उसे किशोर अवस्था वाला नितन्त्रण याद आ गया। वह अनजाने किस भाव के तहत उस तक खिंची चली गई। किशोर के आफिस का द्वार खोलकर उसके सामने जा बैठी। वह कुछ ना कह सीट पर सिर टिकाये आँखें बन्द किये बैठी रही।

"आओ वीना। हमें अपनी खुशियाँ खुद तलाशनी पड़ती हैं मैं तुम्हारी ज़िंदगी के बारे में सब जानता हूँ। पवन ने ..."

"नाम मत लो उसका ..." वह अचानक बोली। एक चिनगारी कई सालों से दबाई...अब शोला बन गई। वह पवन की बेवफाई से तमतमा रही थी।

"मेरे अन्दर की नारी ने चोट खाई है। चोट के बदले चोट," उसने मन ही मन कहा।

ताज़ा तरीन परफ्यूम की महक से महकता उसने पास आकर उसके बाजुओं को छूआ तो लहरें इस कदर उत्पन्न हो गई कि मन शीघ्र ही किनारों को लांघने लगा। उसके कपोल रक्ताभ हो उठे।
मधुर क्षणों की उत्तेजना पाकर वीना की अपनी वर्षों की तपती और प्यासी धरती आकस्मिक अनुराग की वर्षा से परितृप्त होने लगी। परेशानियों के अधिपात्य ने उसे एक अजीब प्रतिरोध तरीके से तटस्थ कर दिया।

बदला...बदला...एक चिनगारी शोला बन गई।

"सितमगर की की नज़र से नज़र मिला कर तुम्हें जीने में बहुत मज़ा आयेगा ...वीना," किशोर ने वीना के कान में कहा। हठात कामना का ज्वार...अपने अस्तित्व को पहचानकर...संस्कार इस घड़ी आड़े आ खड़े हुए।

"क्या मैं पति या किसी के सामने नज़र उठा पाऊँगी? उस शालीन....पवित्र बंधन का क्या होगा? शादी के पवित्र रिश्ते का यह प्रतिदान...?? फिर उसमें और मुझ में क्या अन्तर....??? पतन..... उसके दिल में लज्जा के साथ-साथ आत्मग्लानी का प्रबल प्रचंड तुफान उठ गया। वह ज़मीर के कठघरे में खड़ी हुई तो उसकी गलती गवाह बनकर ....उसका जुर्म साबित कर रहे थे। गृहस्थी में बँधी हुई ऐसी मूर्खता ये कलंक की चादर क्यों? उसके संस्कार उससे पूछ बैठे।

आकस्मात उसे एक अप्रत्याशित धक्का देते हुए वितृष्णा से चीख पड़ी।

"नहीं...नहीं मुझे हाथ मत लगाना। यह गलत है," उसके स्वर में असीम क्षोभ विरक्ति एवं दुख की भावना थी। वह लज्जित सी सिर पकड़ कर बैठ गई।

बन्धनों का अपना ही एक मोह है। इनमें अनगिनत कष्ट हैं। लेकिन इन कष्टों में ही हमारा सुख है।

वह अपने दिल का जायजा ले रही थी। एक क्षण में ही उसे अपनी गलती का अहसास हो गया। उसकी पलकों की पंखुड़ियों के बीच अश्रु अनिच्छा से चमक उठे।

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