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भारत के लोगों को क्या चाहिये

भारत के लोगों को चाहिये
रोटी खाने को,
कपड़ा चाहिये पहिनने को।


मैं जब घूमा, गाँव गाँव,
उजड़ी खेती, खाली खलियान,
रोज़ी रोटी को तरसते इन्सान,
आत्महत्या करते किसान दिखे,
बंजर जंगल, लुटी खदानें,
नेताओं की देखीं करतूतें।


घूमा जब मैं शहर शहर,
मिल एक भी नहीं दिखी,
सब ओर दिखी विकट बरबादी।


राजधानी की थी शान निराली,
चमकतीं सड़कें,
हवा से बातें करती कारें,
ऊँची इमारतें, नीचे लोग,
अजब गजब थी बात निराली।


नेता, अफसर, डाकू, गुंडे,
इक थैली के सब बाट-बटखरे,
जब तब असलहे चमका-चमका कर,
जनता में भुस भरते देखे।


माँ, बहिनों का मान न करते,
बच्चे, बूढ़ों का ध्यान न रखते,
तहस–नहस है, मार-पीट है,
घर-घर में बरबादी है।


जेल सेज है,
ज़ुल्मों को देखो
क्या मिली खूब आज़ादी है।


वोट के साथ माँगते नोट-
नेताओं ने
देखो कैसी ठग विद्या अपनाई है,
अपना काला धन सफेद करने की
कैसी नई तरकीब लड़ाई है।


बच कर रहना इन वोट माँगने वालों से,
बाहर रक्षक पाछे भक्षक,
कैसे कैसे रूप बनाये हैं,
पर ये न भूलो भाई
ये सब विकट कसाई हैं।

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