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भाषा विमर्श शृंखला - 004 'भाषा संस्कृति और व्यापार'

विश्व हिन्दी सचिवालय और वैश्विक हिन्दी परिवार
भाषा विमर्श - 04

'भाषा संस्कृति और व्यापार'

‘विश्व हिन्दी सचिवालय' तथा 'वैश्विक हिन्दी परिवार' के संयुक्त तत्वावधान में भाषा विमर्श शृंखला के अंतर्गत 5 जुलाई, 2020 को भाषा विमर्श सत्र- 4 रखा गया। इस वेबिनार में इटली के हिन्दी विद्वान डॉ. मार्को जोल्ली और लंदन से बीबीसी के पूर्व पत्रकार विजय राणा ने "भाषा संस्कृति और व्यापार" विषय पर अपने विचार रखे। इस सत्र में सभी वक्ताओं और प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए डॉ. जवाहर कर्नावट जी ने भाषा विमर्श शृंखला के पूर्व सत्रों का उल्लेख करते हुए "भाषा संस्कृति और व्यापार" सत्र की पूर्व पीठिका रखी। डॉ. मार्को जी का परिचय कराते हुए डॉ. कर्णावट ने कहा कि वे भारत और इटली के संबंधों के बीच की एक अत्यंत महत्वपूर्ण कड़ी हैं। वे शुरुआत में मसूरी आ गए और यही पर हिन्दी की शिक्षा ग्रहण की। आपने यह भी बताया कि डॉ. मार्को जोली ने भीष्म साहनी पर पीएच.डी. की है और आप दिल्ली यूनिवर्सिटी में इतालवी पढ़ाते रहे हैं।

कार्यक्रम का संचालन अमेरिका से हिन्दी और संस्कृत की विदुषी डॉ. कविता वाचक्नवी ने किया। अपने सम्बोधन में डॉ. कविता ने गुरुपूर्णिमा पर सभी को बधाई देते हुए कहा कि भाषा के प्रयोग के विविध प्रयुक्ति क्षेत्र होते हैं और इन प्रयुक्ति क्षेत्रों की अपनी अलग शैली और विशिष्ट शब्दावली होती है। इसी प्रकार व्यापार और वाणिज्य के विभिन्न क्षेत्रों की भी अपनी एक विशिष्ट शैली और शब्दावली है जिसके साथ भी तमाम भाषाई और सांस्कृतिक पहलू अंतर्निहित होते हैं। आपने बताया कि डॉ. मार्को जी की इस क्षेत्र में विशेषज्ञता है। आपने भाषा के छात्र, शिक्षक और अन्वेषक के रूप में अपने व्यापक अनुभव और भारत में व्यापार कर रही इतालवी कंपनियों के साथ काम करके इन अंतर्निहित संबंधों पर गहन शोध किया है और वर्तमान में आप इतालवी कंपनियों को सलाहकार के रूप में भारत में व्यापार करने के लिए सांस्कृतिक बारीक़ियों को समझाते हैं।

डॉ. मार्को ने इस विषय पर अपनी बात रखने से पहले बताया कि वे पिछले कई सालों से इटली के वेनिस शहर और भारत के बनारस शहर के बीच अपना जीवन बिताते रहे हैं। उन्होंने बनारस शहर की सांस्कृतिक विशेषताओं का उल्लेख करते हुए वेनिस के साथ इसकी समानता और इसके साथ अपने लगाव का उल्लेख किया। आपने आगे यह भी बताया किस प्रकार वे इटली में हिन्दी से जुड़े और हिन्दी की पढ़ाई शुरू की और फिर आगे हिन्दी की पढ़ाई करने कैसे भारत आ गए। मार्को जोल्ली कहते हैं कि इटली में भाषा पढ़ाने की परंपरा अनुवाद और व्याकरण पर आधारित है। शुरू में उन्हें भाषा पढ़ना पसंद नहीं था। बाद में भाषा के प्रति उनका लगाव बढ़ता गया। भाषा सीखते, पढ़ाते और विभिन्न कंपनियों के साथ सलाहकार रहते हुए आपने सम्प्रेषण के भाषाई और सांस्कृतिक पहलू का गहन अध्ययन किया। मार्को कहते हैं कि “भाषा वो साधन है जिसके द्वारा हम अपने विचारों को व्यक्त कर सकते हैं और मैं इसे ही भाषा की परिभाषा मानता हूँ”। वे कहते हैं कि कम्यूनिकेशन का मतलब होता है कि बोली गई बात सुनने वाले के समझ में आनी चाहिए। यदि कम्यूनिकेशन में कहीं गड़बड़ होती है तो फिर कम्यूनिकेशन पूरा नहीं हो पाता है और ये उसे प्रभावित करता है। आपने बताया कि कम्यूनिकेशन के अनिवार्य घटकों में से भाषा और संस्कृति प्रमुख घटक होते हैं। अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए वे कहते हैं कि भाषा और संस्कृति दोनों ही निरंतर परिवर्तनशील होते हैं। वे स्टेटिक नहीं रह सकते इसलिए कम्यूनिकेशन में इनके लिए कोई स्थायी फ़ार्मूला नहीं दिया जा सकता है। आप आगे कहते हैं कि ज़्यादातर लोग केवल भाषाई पहलू पर ही ध्यान देते हैं और उसे ही सम्प्रेषण का प्रमुख घटक मानते हैं। किन्तु सांस्कृतिक पहलू भी कम महत्वपूर्ण नहीं होता है। हालाँकि किसी भी भाषा से जुड़ी हुई संस्कृति बहुत जटिल और व्यापक होती है और उसे इतनी आसानी से और थोड़े समय में समझा नहीं जा सकता है। किन्तु एक मॉडल के ज़रिए इसे समझा जा सकता है। उन्होंने बताया कि उन्होंने शोध करके व्यापार के लिए एक मॉडल बनाया है जिसको “बलबोनी मॉडल” नाम दिया। व्यापार में कम्यूनिकेशन बहुत ज़रूरी और अहम होता है और स्थानीय भाषा और संस्कृति का ज्ञान इस कम्यूनिकेशन बहुत प्रभावी बना देता है। अक़्सर व्यापार करने वाले दोनों लोगों की भाषा अलग-अलग होती है और वे किसी एक तीसरी भाषा के माध्यम से कम्युनिकेट करते हैं और प्राय: यह देखा गया है कि दोनों का हाथ उस तीसरी भाषा में तंग होता है। ऐसे में कम्यूनिकेशन प्रभावी नहीं हो पाता है। और उसमें गैप आ जाता है। ऐसी स्थिति में बलबोनी मॉडल अच्छी तरह से काम करता है। इस मॉडल में बताया गया है कि कम्यूनिकेशन में वर्बल और नॉन वर्बल लैंगवेज़ के साथ वैल्यूज़ भी शामिल होती हैं। विभिन्न उदाहरणों के ज़रिए उन्होंने इस मॉडल के इन पहलुओं के अंतर संबंधों पर प्रकाश डाला। वे आगे बताते हैं कि भाषा व्यापार और संस्कृति के संबंध को समझने के लिए उन्होंने अनुसंधान शुरू किया और बाद में एक मास्टर कोर्स (Business Management In India) शुरू किया। यह चार हिस्सों में था जिसमें एक भाषा, कल्चर, इकनॉमिक्स और सेमीनार था। इसमें हिन्दी और उर्दू भाषाएँ पढ़ाई जाती थीं। वे कहते हैं कि केवल अंग्रेज़ी बोलने वाला व्यक्ति भारत के भावों और विचारों को पूरी तरह कभी नहीं समझ सकता। वे कहते हैं कि भाषा और संस्कृति को जाने बग़ैर व्यापार करना असंभव ही है। 

इस सत्र के दूसरे वक्ता रहे डॉ. विजय राणा जिन्होंने बताया कि इतिहास का विद्यार्थी होने के नाते मैं इस विषय को इसी परिप्रेक्ष्य में देखता हूँ। उन्होंने कहा कि भाषा संस्कृति की संवाहक होती है। समृद्ध भाषाएँ ही समृद्ध संस्कृतियों का निर्माण करती हैं। उन्होंने विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से इस तथ्य की पुष्टि की कि जिन सभ्यताओं में भाषाई विकास नहीं हुआ वे सभ्यताएँ नष्ट हो गईं। भाषा और साहित्य के संबंधों को विश्लेषित करते हुए उन्होंने रामायण और राम कथा के उदाहरण के ज़रिए बताया कि किस प्रकार संस्कृत में लिखी रामायण वृहत्तर भारत और विदेशों में जा बसे भारतीयों को भक्ति और सांस्कृतिक रूप से जोड़े रखने का आधार बनी। आगे अपने सम्बोधन में उन्होंने भाषा, संस्कृति और सत्ता के बीच संबंधों तथा प्राचीन भारत में व्यापार और भाषा की भूमिका पर ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य के साथ वर्तमान संदर्भों में रेखांकित करते हुए हिन्दी की दशा और दिशा पर भी प्रकाश डाला। 

दोनों वक्ताओं ने अपने सम्बोधन के बाद श्रोताओं के प्रश्नों के उत्तर भी दिए। केंद्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा के उपाध्यक्ष श्री अनिल जोशी जी ने अपने संबोधन में कहा कि भारतीय मन को समझने के लिए भारतीय भाषाओं को जानना बहुत ज़रूरी है। बाहरी लोगों के हिन्दी सीखने का आकर्षण फ़िल्म, संस्कृति और व्यापार है। हम अगर इन्हें बेहतर बनाए रख सकें तो यह हमारे देश और हमारी भाषा के सीखने वालों के लिए काफ़ी अच्छा प्लैटफ़ॉर्म तैयार कर सकते हैं।

अंत में भाषा विमर्श कार्यक्रम के अंतरराष्ट्रीय संयोजक श्री पद्मेश गुप्त ने दोनों अतिथि वक्ताओं और प्रतिभागियों के प्रति आभार प्रदर्शन किया।

– नवेन्दु वाजपेयी


 

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