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बिछोह

जेठ की तमतमाती धूप,
पसीने से तर बदन,
आम का पेड़,
सुखद छाया।
कच्चे आमों का गुच्छा,
मन को बहुत भाया।


हैं बहुत से वृक्ष,
आस-पास
सफेदा-बकेन
नीम कटहल ख़ास,
बोलती कोयल,
सुखद स्वर प्रतिपल,
खड़े तरु मौन,
शान्त सहज निश्चल।


सहज ’पवन’ का,
झकोरा तेज़ आया,
डोल गया
कटहल-बकेन,
सफेदा और नींम।
डोल गये गुच्छे,
कच्चे आमों के,
हिन्डोल की तरह,
क्या सुखद मोहक लगे,
स्वप्न सरवर स्वच्छ,
निर्झर की तरह।


तभी आम के
किसी गुच्छे ने
एक कच्चा फल गिराया।
दौड़ कर उसको
सहज हाथों उठाया।
वियोग की आग,
बिछोह का राज़,
मुझे फल ने बताया।
यों ज़रा सी बात पर
कच्चे आम ने
ढेर भर आँसू बहाया।


मोह का बन्धन,
अपनत्व का क्रन्दन,
अज्ञात राहें,
अनजान बातें,
अबोध मन,
अविकसित तन,
असह अगन,
बेसहारा जीवन।


सभी का सहज संगम,
बन गया नयन जल विहंगम,
मैं रह गया अवाक,
देखकर आम्रफल का,
सहज वियोग उच्छावास।

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