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बजट

बगैट या छोटा चमड़े का थैला या फिर एक प्रकार की ब्रेड या फिर बजट। आख़िर क्या है ये? फिर हमारा बटुआ वो ज़्यादा अच्छा था। अपना भी था और अपनापन भी। क्यों फ्रेंच? भारत वैसे भी इंडिया हो गया, बटुआ अपना बगैट हो गया। सब पराये होते जा रहे हैं, फिर हमारा कौन? बेटियों का ब्याह कर उन्हें भी ऐसे ही पराया कर दिया जाता है। अब पूरी परायी नहीं होतीं बल्कि अपना हक़ माँगने लगी हैं। पर फिर भी जातीं तो अब भी दूसरे घर ही हैं। 

बजट भी ऐसे ही नयी नवेली दुल्हन की तरह आता है, हर बार। शुभलाभ का आशीर्वाद लेकर। पहले से ही इतनी तैयारियाँ की आते-आते तक आतुरता सारी हदें पार कर जाती हैं। कितनी शिद्दत से गाजे-बाजे के साथ उसका स्वागत, पूरी आत्मीयता और अपनापन। विपक्षी यहाँ ससुराल पक्ष की भूमिका निभाते हैं। तन-मन-धन से कमियाँ खोजने में जुट जाना, उनका कर्तव्य है। जैसे नयी दुल्हन में ढूँढ़ी जाती हैं। और फिर वही जो हर नयी दुल्हन के साथ होता है। उसकी हर चाल, आवाज़ की खनक मतलब उसके स्वर का उतार-चढ़ाव, नज़रें झुकाकर बात करना या गर्दन हिलाकर हामी भरना, उठना, बैठना... यानी हर तरीक़े से उस पर निगरानी। जरा सी ऊँच-नीच पर इतना हल्ला, शोर-शराबा जैसे बाक़ी सब दूध के धुले हों। उसका पूरा छिद्रान्वेषण कर छिछालेदर करना। और अंत में उसे घटिया, संकुचित दृष्टि, स्वार्थी, मानसिक रूप से असंतुलित और न जाने किन-किन उपमा-अलंकारों से सुसज्जित कर नक्कारखाने में फेंकने वाला बता दिया जाता है। जैसे उन्होंने अपने ससुराल पक्ष का धर्म निभा लिया हो।

वहीं, जो बजट पेश करता है वह बेटी का मायका पक्ष होता है। कुछ भी हो, कमियाँ होने के बावजूद उसे सिरे से खारिज करना, अपने आप को सर्वश्रेष्ठ घोषित करना, आय-व्यय का पूरा जोखा सबके सामने रखना, ये भी बताना की आप पर हमने आज तक कितनी महरबानियाँ की हैं, यह भी कि हमारी बेटी के कारण ही आपका घर आज तक फला-फूला है और आगे भी ऐसे ही रहने की उम्मीद है। मतलब येन-केन-प्रकारेण सामने वाले को उपकारों से इतना लदा देना कि वह सर ऊँचा न कर पाये। कोशिश यह करना कि हम दुनिया का आठवां अजूबा लेकर आए हैं, लोगों का उद्धार करने। और साथ में कभी-कभी ससुराल पक्ष की बुराइयाँ गिनवाना।

अच्छा..., पर एक बात है, उसके आने के बाद हमें और आपको बहुत ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ता है। क्योंकि बजट हमारे लिए होता ही नहीं। मिडिल क्लास वालों का बजट हमेशा से बिगड़ा ही रहा है और रहेगा। पढ़ा-लिखा, दो वक़्त की कमाई करने वाले को कौन पूछे! पूछ-परख के लिए अमीर या ग़रीब ये दो ही इस श्रेणी में आते हैं। हम त्रिशंकु ठहरे। नारदमुनि होते तो संभावनाएँ प्रगाढ़ हो जाती। लेकिन मीडिया वालों और नेताओं की दुकान एकदम चमक जाती है।

नेताओं को लगता है देश उनके कारण चल रहा है, मीडिया भी अपने में यह भ्रम पाले रखता है। पर ये कैसे भूल जाते हैं कि देश तो असल में मध्यम वर्ग ही चलाता है। उसके जितना ईमानदार कोई नहीं होता। पूरी तन्मयता से काम करता है क्योंकि उसमें आगे बढ़ने की ललक भी सबसे अधिक होती है। नाते-रिश्ते भी वही निभाता है क्योंकि उसी में सबसे ज़्यादा आत्मीयता और अपनेपन का बोध रहता है। और सबसे प्रमुख बात कि देश को सबसे ज़्यादा वही चाहता है इसीलिए देश की सेवा ख़ातिर अपनी इतनी-सी कमाई में से बड़ा-सा हिस्सा टैक्स के नाम पर दान कर देता है। जिससे भूखे को खाना, नंगे को कपड़ा और बेघर को छत मिल सके। उसके इन्हीं संस्कारों और दानवीरता के कारण हमारे देश कि जड़ें अभी भी मज़बूत हैं। उसे कभी कोई नहीं हिला सकता, माध्यम वर्ग हमेशा ही रहेगा क्योंकि उसके लिए कभी कोई बजट नहीं बनेगा.....।

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