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चलो उठो बढ़ो

नवोदित साहित्यकार 
जैसे 
वटवृक्ष के नीचे 
ऊगते पौधे। 
जैसे दाँतों के बीच 
मासूम जीभ 
जैसे बुनकर की धुनकी से 
धुनकती हुई रुई। 
शिक्षकों की कक्षा में 
अलग बेंच पर 
बैठा छोटा सा बच्चा। 
 
एक नवोदित युवा साहित्यकार 
असमंजस के जाल में उलझा हुआ 
लगभग हतप्रभ  
अपनी रचनात्मकताओं को 
किस विधा में उजागर करे। 
कौन से शिल्प में बाँधे? 
 
युवा सृजनात्मकता की सही संवाहक हैं,
सम्वेदनाएँ, अभिव्यक्तियाँ
और अनुभूतियाँ। 
आपकी संवेदनाएँ अगर 
नहीं हिल रहीं हैं। 
घने कोहरे में रोशनी की
तलाश अगर नहीं है ,
तो सिर्फ़ आपका लिखना काग़ज़ गूदना है।
 
असंभव है कि एक मृतप्राय संवेदना 
के पात्र 
संवेदनशील हों, विचारवान हों।
लिखना होगा तुम्हे 
संवेदनाओं में लिप्त होकर 
अविभाज्य, प्रदीप्त, प्रस्फुटित, शब्दहीन
चिंतन परंपरा 
और वर्तमान, को रँगना होगा 
व्याकरण तथा वाक्य विन्यास, के साथ 
शिल्प के स्तर पर 
करना होगा निरंतर संघर्ष। 
 
तुम्हें बलात्कार के मुद्दे पर, 
भीड़ द्वारा हत्या के मुद्दे पर, 
राजनीति की गंदगी पर, 
आतंक के मुद्दे पर भरनी होगी चीत्कार। 
तुम्हे साँपों, स्वानों, लकड़बग्घों 
के बीच कहीं पर रौंदा हुआ
तड़पता हुआ 
मानव मन 
खोजना होगा। 
तुम्हें गढ़नी होगी 
सामाजिक अभिव्यक्ति की नई कहानी। 
 
तुम्हारे आसपास होंगे 
कुछ एक महान लेखक 
जिनकी सिरों पर सींग पाए जाते हैं,
जिन्हें प्रणाम करने के लिए
तुम सिर झुकाते हो।
तो तुम्हारी टोपियाँ टपक जाती होंगी। 
ये वो साहित्यकार हैं 
जो अंदर से मरे हुए हैं,
ढो रहे हैं अपने साहित्य को
नाम के भूखे हैं, 
और हीनभावना से ग्रस्त हैं। 
इनकी लेखनी को दीमक चाट गया है,
मत चलो इनके रास्ते पर। 
उठो नई व्यंजना का 
सोता स्रवित करो। 
संघर्ष की साधना में
संवेदनाओं से झरो।

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