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छोटे बच्चे - भारी बस्ते

जब मैं छोटे-छोटे बच्चों को, अपनी पीठ पर, मोटे-मोटे बस्ते लादे हुए,स्कूल जाते देखता हूँ तो मुझे हमारी दूरदर्शी शिक्षा नीति पर गर्व होने लगता है। भारी-भरकम देश का भावी भार इन नौनिहालों को ही तो ढोना है अतः अभी से ही इनकी पीठ पर मोटे-मोटे बस्ते लाद दिये जाने चाहिए। अँग्रेज़ों के ज़माने की शिक्षा प्रणाली ने देश की शिक्षा कृषि में बाबुओं की फ़सल खूब उगायी, बस्ते ढोने का पूर्वाभ्यास कहीं उसी गंतव्यस्थल के लिए तो नहीं है?

स्वाधीनता प्रप्ति से पूर्व अँग्रेज़ साहब होते थे और भारतीय बाबू। इन दिनों भी अंग्रेज़ी तौर-तरीक़ों वाला भारतीय ही साहब होता है, तथा हिन्दी पढ़ने-पढ़ाने वाला बाबू या मास्टर। उन दिनों भी साहब को आते ही बाबू सावधान की मुद्रा में खड़े हो जाते थे आज भी सिर झुकाकर खड़े रहते हैं। भारी-भरकम बस्तों का बोझ झुककर चलना सिखा ही देता है।

इस देश का सारा प्रशासन, समूचा शासन बाबुओं पर ही निर्भर है। फ़ाइलों और बस्तों को अनंत काल तक सुरक्षित रखने की ज़िम्मेदारी बाबू की ही होती है। मंत्री और उच्चाधिकारी यदि लगातार एक ही विभाग में साल भर रह लें तो हम उसे चमत्कार कहेंगे। मंत्रियों और उच्चाधिकारियों की एक ही समानता है कि वे प्रत्येक विभाग के विशेषज्ञ होते हैं, अतःपुलिस विभाग से पदोन्नत होकर वे शल्यचिकित्सा विभाग के सर्वेसर्वा बनाये जा सकते हैं, जबकि बाबू को तो कई दशक तक एक ही विभाग में रहकर कार्य करना पड़ता है। इसी तर्क को ध्यान में रखकर बच्चों की पीठ पर बचपन से ही मोटे-मोटे बस्तों का बोझ लाद दिया जाना चाहिए।

बुज़ुर्ग लोग कहते हैं कि उन्हें तब बर्रू से लिखवाया जाता था, तथा उन दिनों शुद्ध और सुंदर लिखने पर ज़ोर दिया जाता था। वे सब बातें अब पुरातनपंथी हो गई। अब तो भले ही चार अक्षर ठीक से लिख न सको पर भड़कीले कपड़े पहिन कर फ़िल्म के हीरो दिखो।

शहरों में सिक्के बटोरने की होड़ वाली ज़िन्दगी में किस शिक्षिका या अध्यापक के पास सुंदर और शुद्ध लिखने-लिखाने की फ़ुर्सत है। अब तो बच्चों का शैक्षणिक स्तर बढ़िया से बढ़िया डिज़ाइन के बस्तों, महँगे वस्त्रों और ऊँचे रहन-सहन में सिमट गया है। बस्तों पर महात्मा गांधी, विवेकानंद, सी.वी.रमन या प्रेमचंद के चित्र न होकर आधुनिक नेताओं, अभिनेताओं की तस्वीरें होती हैं। समाचार पत्रों के माध्यम से इन्हीं नेताओं अभिनेताओं के कार्यकलाप वे ध्यान से पढ़कर उन्हीं रास्तों पर चलकर प्रगति करना चाहते हैं।

फ़िल्मों की चकाचौंध, भ्रष्ट तौर तरीकों पर आधारित राजनीति के ठाठ-बाट, बेईमानों की चाँदी-सोना बटोरती मानसिकता तथा अपराधियों को समाज में महत्वपूर्ण बनाने की साज़िश के चौराहे पर एक अबोध बालक अपनी पीठ पर मोटा बस्ता लादे खड़ा है। लेखक के रूप में मैं उसे सलाह देना चाहता हूँ कि फेंक दे यह मोटा बस्ता; इस चौराहे पर अब किताबी ज्ञान की कोई सार्थकता नहीं रही। अब तो सार्थक है मार-धाड़, जोड़-तोड़, उठा-पटक और आदान-प्रदान सामयिक ज्ञान सहेज मेरे बच्चे, बोझिल कर रहा है तुझे पुस्तकों का बोझ, किन्तु न जाने क्या सोचकर मैं होठों पर ताला डाल देता हूँ।

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