अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

चिर-प्रतीक्षा - नागेन्द्रदत्त वर्मा

चिर-प्रतीक्षा लिये उर-विरह को सँजो,
मानिनी भामिनी द्वार पर मौन थी।
नित नई आस ले प्रिय मिलन को सुमुखि,
रात गिनती हुई कामिनी मौन थी॥

नयन कह रहे थे हृदय की व्यथा,
बह रहे थे सदा किन्तु निर्झर सदृश।
इक कसक को हृदय में दबाये हुए,
प्यार के उन क्षणों को सँजोये हुए।
लाज, सम्मान, दुःख-भार से वह दबी,
प्रीत पिय की लिये प्रेयसी मौन थी॥

दिन ढला, अब निशा की घड़ी आ गई,
फिर मधुर प्यार की वह घड़ी आ गई।
किन्तु सूना है घर और सूना है मन,
और सूना है मधुमास का आगमन ,
निज विरह-ताप में वह झुलसती रही,
चाँद ढलता रहा चाँदनी मौन थी ॥

युग गये किन्तु फिर भी न आये सजन,
आ गये मेघ काले सजल औ सघन।
मेघ पावस के ज्यों ज्यों परसने लगे,
नैन प्रिय के लिये त्यों तरसने लगे।
होंठ सूखे मधुर और हुआ कृश वदन,
सुन्दरी जग रही, यामिनी मौन थी ॥

प्रेम-पाती लिखी किन्तु लिख न सकी,
गात निश्चल हुआ और कर ना उठे।
जब किसी कोकिला-कंठ ने कूक कर,
हूक दिल में उठाई, नयन भर उठे।
उर की गहराइयों में उठी इक तड़प,
वह तड़पती रही पर तड़प मौन थी॥

अमिट प्यार का दिल में दीपक सजाय़े,
पवन के झकोरों से भेजे निमंत्रण।
गगन-मेघ के हाथ भेजे पिया को,
बहुत बार अनगिन सुमुखि ने नयन-कण।
नयन-जल ढरकते रहे रात भर,
वह सिसकती रही पर सिसक मौन थी॥

चिर प्रतीक्षा लिये उर-विरह को सँजो,
मानिनी भामिनी द्वार पर मौन थी॥

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

बाल साहित्य कविता

सामाजिक आलेख

ललित निबन्ध

लोक गीत

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं