अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

कनफ़्यूज़ड

कल रात जब मैंने पड़ोसी वर्माजी की बेटी को एक नौजवान लड़के के साथ होटल में घुसते देखा तो थोड़ा चौंका। मैं यही सोचता रहा कि यह बात वर्मा जी से बताई या नहीं! कहीं ऐसा न हो कि वर्माजी इसे अपने पारिवारिक मामलों में दखल समझें या यह सोचें कि मैं उन्हें शर्मिंदा करने के लिये यह कह रहा हूँ। फिर यह भी तो हो सकता है कि वह घर से इजाजत लेकर किसी पार्टी में शामिल होने आई हो और वर्मा जी हमें टका-सा जवाब दे दें।

एक विचार यह भी आया कि हो सकता है दोनों में सच्ची मोहब्बत हो और प्लान कर रहे हों कि किस तरह घर वालों को शादी के लिए मनाया जाय! तब तो मैं और भी अपराधी हो जाऊँगा।

अंतत: मैंने चुप रहने का परम व्यावहारिक निर्णय लिया और दूसरे दिन सुबह जब वर्माजी मिले तो जवान को फिसलने से रोकते हुए कुछ औपचारिक बातें करके विदा ले ली। वर्माजी भी कुछ उखड़े 2 से लग रहे थे।

शाम को कालेज से आकर बैठा ही था कि वर्माजी आ गए। मैंने श्रीमती जी से चाय को कहकर उनकी तरफ प्रश्नावाचक निगाह दौड़ाई।

ऐसा लगा कि वे किसी पशोपेश में हैं। फिर थोड़ी देर तक पसरे मौन को तोड़ते हुए वे धीरे से फुसफुसाए, "ज्योति कल शाम सहेली के घर जाने का कहकर निकली थी लेकिन अभी तक लौटी नहीं और सहेली के घर तो गई भी नहीं थी - क्या किया जाय?" उनका गला रुंध गया था।

मैं फिर सोच में पड़ गया कि कल वाली बात बताऊँ या नहीं? अगर बताता हूँ तो कहेंगे तभी या सुबह क्यों  नहीं बताया और अगर नहीं बताता तो ...........

मैं फिर कनफ़्यूजड था।

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

अँधेरा
|

डॉक्टर की पर्ची दुकानदार को थमा कर भी चच्ची…

अंजुम जी
|

अवसाद कब किसे, क्यों, किस वज़ह से अपना शिकार…

अंडा
|

मिश्रा जी अभी तक'ब्राह्मणत्व' का…

अंधविश्वास
|

प्रत्येक दिन किसी न किसी व्यक्ति की मौत…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता-मुक्तक

कविता

लघुकथा

कहानी

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं