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देश और लकड़बग्घे

मैं कमरे में बैठा था,
टीवी अपना चालू था
अद्भुत घटना घटी,
अचानक महसूस हुआ...
टीवी भी मुझको देख रहा है
और दिन भर जो -
विज्ञापन प्रसारित करता रहता है
आज कुछ सन्देश देना चाहता है
तकनीकी ख़राबी का सहारा लेकर
चैनल बदल दिया उसने...
तो देखता हूँ -
 
एक मादा
घिरी है तीन ओर जल से
लकड़बग्घे घायल कर चुके हैं उसे
उसके निचले पैरों के मांस-खाल को नोच चुके हैं
कई जगह से शरीर घायल कर चुके हैं
फिर भी ज़िंदा है वो
उम्मीद है उसे बचने की...
 
पंजे, थूथ, नाक सब खून से
चिपचिपे हो गए हैं लकड़बग्घों के
पर लकड़बग्घे...
वे नहीं रुकेंगे
जब तक अंतिम रेशा मांस न नोच लें
 
घृणा मन में उपज पड़ी लकड़बग्घों के लिये
कई अभिशाप दिए उन्हें
पर साधारण आदमी के अभिशाप
कब लगते हैं दरिंदों को...
 
वही दृश्य आँखों में लिए
पल भर के लिये आँखे बंद कीं
तो देखा कुछ
कराह उठा मन...
 
मादा का शरीर आकृति बदलकर
हिंदुस्तान का नक्शा हो गया है
रंग बदल लिए लकड़बग्घों ने भी
काला, लाल, खाकी, 
सफेद, केसरिया, नीला, हरा...
सब बारी बारी से नोच रहे थे
कभी कभी एक साथ 
कई हिस्सों पर टूट पड़ते थे
बारी बारी से नोच रहे थे
बारी बारी से नोच रहें है
बारी बारी से...आज भी
क्योंकि मादा अभी ज़िंदा है

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