अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

धैर्य की पाठशाला

("अगले जनम मोहे कुत्ता कीजो" व्यंग्य संग्रह से)


वर्तमान समय का सबसे बड़ा संकट सहनशीलता व धैर्य की कमी होना है। यातायात सबसे अच्छा उदाहरण है, ज़रा सा जाम लगा कि पीछे वाले ने लगातार कानफोड़ू हार्न बजा आगे वाले को वार्न किया। जानकर भी अनजान बनते हुये कि आगे के वाहनों के पहिये थमने के पीछे उनके भी आगे के वाहनों के पहियों का थमना है!

एक टिकट काउंटर पर भी धक्का-मुक्की चलती रहती है। लाईन के शब्दकोश में धैर्य नहीं होता, यदि कोई सीधे खिड़की पर अपने बचे हुये पैसे लेने आ जाये तो भी पूरी लाईन समवेत स्वर में प्रतिकार कर दुत्कारती है कि हम सारे मूर्ख हैं क्या? क्या करें ये इस ’समय की धारा’ है कि सहनशीलता किनारा करती जा रही है। अधैर्य तो इतना ज़्यादा है कि यदि पानीपूरी की दुकान पर पानी पूरी मिलने में देरी हो जाये तो आदमी हंगामा खड़ा कर सकता है जबकि दुनिया में यदि सबसे जल्दी कोई करता है तो यह पानी-पूरी वाला ही होता है, बस एक बार शुरू करने की भर देर है! यही हाल सिनेमा हॉल का होता है ज़रा सा सिनेमा दिखाया जाना बंद हुआ कि तेज़ सामूहिक सीटी बजती है। वैसे पानी-पूरी वाले को तो उल्टे तरह की सहनशीलता नहीं है देरी की! सामने वाला मुँह में पिछले गोलगप्पे को डाल ही न पाये और अगला पेश कर देता है ऐसा कि खाने वाले का मुँह स्थायी रूप से फूल के कुप्पा बना रहता है! जबडे़ की सबसे उम्दा एक्सरसाईज़ पानी पूरी खाते समय ही होती है! 

गंगू की एक नेक सलाह अनेक को है। वह स्वयं भी इस समस्या से दो-चार, दो-चार साल से हो रहा था, लेकिन कोई हल नहीं दीख पड़ता था, कि फिर एक आइडिया ने सब बदल दिया! हाँ, पड़ोस में एक कुतिया ने चार पिल्ले दिये, एक कुतिया स्वामी ने रखा व बाक़ी तीन सुधि पड़ोसियों ने बाँट लिये। गंगू ने ज़िंदगी में पहली बार ’श्वान पालन’ किया था तो तरह-तरह के खट्टे-मीठे अनुभव उसे हुये। और यहीं से ’धैर्य की पाठशाला’ की नींव पड़ गयी। पपी जी को कुछ खाना खिलाओ, तो कभी तो वे खा लें और कभी उनका मिज़ाज बिगड़ा हो तो वे अपनी थूथन को ज़रा सा भी कष्ट न दें, लेकिन उनके थोबडे़ को छोड़ घर भर के थोबड़ों पर चिंता की लहर व्याप्त हो जाये। उनके पास बैठ कर कई तरह की मिन्नतें करने पर वे तनिक पसीजते और एक-दो दाने मुँह में मुश्किल से गटकते। खाना खाना सीखना हो तो ऐसे नखरैल डॉगी से सीखो, ऐसे धीरे-धीरे खाता है कि घंटाभर यों ही निकल जाये मनाते-मनाते। एक बार की मान-मनौव्वल में वे एक दाना या दो मुश्किल से मुँह में डालने का महान कार्य अंजाम देते थे। बस यहीं से हमारे धैर्य की अग्नि परीक्षा शुरू हो गयी, आप अपने सारे कार्यों को तिलांजलि दे बस इनके सामने बैठे रहो। अब घंटे भर में इन्होंने भोजन डकारा तो फिर आपको चिंता हुई कि रात भर के बाद अब सुबह इनको हल्का करवाना ज़रूरी है, लेकिन यहाँ भी इनकी मनमर्ज़ी चलती है! केवल इंसान अकेले का हाज़मा कौन ख़राब होता है, इनका भी चाहे जब हो जाता है। कभी कब्ज़ियत है, तो कभी उनकी तबियत नहीं है, हल्का होने की। आप को वह चक्कर पे चक्कर लगवा रहा है, और आप चक्कर खाने ही वाले हैं, लेकिन वे नहीं पसीज रहे हैं, आप सर्दी में पसीना पोंछ रहे हैं। आपकी कमीज़ गीली हो गयी है कि भाई साहब अब तो हल्के हो जायें, नहीं तो फिर स्वच्छता अभियान का बंटाधार करके रख देंगे। आपके दफ़्तर गमन के बाद। ऐसे ठोस तरीक़े से धैर्य का गुण आपके अवचेतन में चुपके-चुपके घर कर आपको धैर्यवान बना देता हैं। किसी व्यक्तित्व विकास की कक्षा या पुस्तक आपको इतनी सहनशीलता नहीं सिखा सकती है जो कि एक डॉगी आपको सिखा देता है! सुबह के अख़बार की धैर्य की पाठशाला का नियमित कॉलम आपको पढ़ने की ज़रूरत ही नहीं है! आगे डॉगी द्वारा सिखाये गये धैर्य के मंत्र और भी हैं। इन्होंने आपके घर की कोई चीज़ अचानक मुँह में दबा ली चाहे वह हैंगर हो, बाॅटल हो या आपकी बाॅटली, पत्नी का रिबन या ओढ़नी, मोजा, स्लीपर या कि बरसात में एकमात्र सूखी गंजी हो अब आपका मुँह सूख रहा है, लेकिन वे इसे छोड़ नहीं रहे हैं। आप मिन्नतें कर रहे हैं, लेकिन इन पर इसका तनिक सा भी असर हो नहीं रहा है। आपको वह धैर्य का पाठ गहराई से पढ़ा रहा है अर्थात धैर्य की पाठशाला का यह एडवान्सड्‌ पाठ है, जो कि आपने इतनी पढ़ाई करने के बाद भी नहीं पढ़ा है। 

 अतः सिद्ध हुआ कि डॉगी पालन करना ’धैर्य की पाठशाला’ चलाने के बराबर है। यह दुनिया रहने के लिये और बेहतर जगह हो जायेगी, यदि हर इंसान एक डॉगी पालन करे! समाज जो धैर्य व सहनशीलता के ब्लैक होल में जा रहा है वह इससे लबालब भर जायेगा! न्यू इंडिया धैर्यवान इंडियन्स का होगा बस हर शख़्स कुछ और इसके लिये न करे एक मूडी डॉगी पाल लें। 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'हैप्पी बर्थ डे'
|

"बड़ा शोर सुनते थे पहलू में दिल का …

60 साल का नौजवान
|

रामावतर और मैं लगभग एक ही उम्र के थे। मैंने…

 (ब)जट : यमला पगला दीवाना
|

प्रतिवर्ष संसद में आम बजट पेश किया जाता…

 एनजीओ का शौक़
|

इस समय दीन-दुनिया में एक शौक़ चल रहा है,…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी

आत्मकथा

लघुकथा

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं