अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

धार्मिक भाइयों की मुस्लिम बहन

ये मिट्टी
बन जाती है शोला
धार्मिक भाइयों की मुस्लिम बहन
शरीअत के मुताबिक़
सख़्त पर्दे के बीच 
बचपन के किसी खेल का नाम याद
न किसी फ़िल्म का
बचपन में ही
सँकरे बावर्चीख़ाने में बैठकर
सुना करती है
भाइयों के दाख़िलों की आवाज़ें
जो उतर जाती हैं
अतल गहराइयों में
और सिखा देती हैं उसे आत्मत्याग
ख़ुश होना
कामयाबी पर उन धार्मिक भाइयों की
जिनके लिए
थरथराती हुई
भरी सर्दी की रातों में
बुनती है वह बारीक ऊन के
सुंदर स्वेटर और जर्सियाँ
भूखे रहकर 
गोश्त की कई ग़िज़ाएँ
जिन्हें बनाते-बनाते
आ जाता है वक़्त उसके जाने का 
पर्दे में रहकर 
एक चार दीवारी से दूसरी
चार दीवारी की ओर प्रस्थान 
यही है वो स्थान
जहाँ भेज दिया जाता है उसे
कुछ कपड़ों, गहनों और बर्तनों के साथ
जिन्हें चिपकाए रहती है 
अपने सीने से उम्रभर वह
और कर लेती है बातें
अपनी तन्हाई की कुछ, बिन कुछ बोले
कोसों दूर कर दी गई है अब शरीअत
धार्मिक भाइयों की मुस्लिम बहन के लिए
बाप की ज्यादाद में क्या है 
यह भूलना ही है उसे
याद रखना है तो बस यह
की दूसरी चार दीवारी से आवाज़
बाहर न आने पाए…!

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं