अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा वृत्तांत डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

डायरी का एक पन्ना – 003: यमराज

एक मशहूर कहावत है कि “दूसरे की थाली में परोसा हुआ बैंगन भी लड्डू लगता है”। अपना जीवन तो हम सब जीते ही हैं लेकिन दूसरे की ज़िन्दगी में झाँक कर और उसे जी कर ही असलियत का पता चलता है। इस कड़ी में अलग अलग पेशों के लोगों के जीवन पर आधारित जीने का प्रयास किया है।


यमराज के पद पर अपनी नौकरी लगने के कुछ दिन बाद जब मैंने अपने काम और ज़िम्मेवारियों के बारे में पूछताछ की तो इस बात की पुष्टि हो गई कि धरती के बोझ का संतुलन रखने के लिये ही मुझे इस नौकरी पर रखा गया है और शिवजी (महेश) महाराज मेरे बड़े साहब (बॉस) हैं। 

प्रशासन सम्बन्धी पद्धति के अनुसार धरती पर जब कभी भी किसी का जन्म होता है तो ब्रह्माजी के दफ़्तर से एक पत्र  विष्णु जी को जाता है। यह सब इसलिये क्योंकि विष्णु जी के महकमे की ज़िम्मेवारी पैदा हुये सब प्राणियों के लालन-पालन की होती है। इस पत्र में पैदा हुये प्राणी के जीने की कितनी लम्बी लीज़ है और उसे धरती से कब उठा लिया जायेगा; इसके बारे में भी साफ़-साफ़ लिखा होता है। ब्रह्मा जी का दूसरा पत्र शिवजी महाराज को जाता है। इस पत्र में हर प्राणी का आई.डी. और जीवन की लीज़ ख़तम होने की तिथि और समय लिखे होते हैं; क्योंकि उन्हें धरती से उठाना शिवजी का महकमा है। अब शिवजी महाराज ठहरे मस्त-मौला। कैलाश पर्वत की मस्ती से उन्हें कहाँ फ़ुर्सत! इस उठाने-बिठाने के लिये न तो उनके पास समय है और न ही कोई रुचि। यही कारण है कि ब्रह्मा जी के पत्र को फटाफट देखने के बाद वो इसे मेरे पास भेज देते हैं। यमराज के इस पद पर लोगों को ऊपर लाने की पूरी ज़िम्मेवारी अब मेरी ही है। क्योंकि हमारा एरिया बहुत विशाल है इस लिये मेरे पास यमदूतों का एक अच्छा ख़ासा डिपार्टमैण्ट है और उस में काम करने वाले यमदूतों के अपने अपने क्षेत्र बँधे हुए हैं।

रोज़ सुबह दफ़्तर खुलने पर सारे यमदूतों को उनके इलाक़ों के कार्ड दे दिये जाते हैं। इन कार्डों पर हर ऊपर लाने वाले प्राणी का नाम, पता और प्राण निकालने का समय दर्ज होता है। प्राण खेंचने के समय में कोई भूल न हो जाये इसीलिये हर कार्ड पर नंबर होता है और यमदूत नंबरों के हिसाब से ही प्राण खींचते हैं। एक दिन अचानक मेरे एक सीनियर यमदूत की तबियत ख़राब हो गई। खाँसी और ज़ुकाम के मारे बुरा हाल था। क्योंकि उसकी हालत नीचे जाने लायक़ नहीं थी और मेरे पास वैसे भी स्टाफ़ की कमी थी, क्योंकि कुछ यमदूत छुट्टी पर गये हुये थे। स्टाफ़ कम होने के साथ-साथ आज की लिस्ट भी काफ़ी लंबी थी। यही सोच कर मैंने फ़ैसला किया कि आज धरती पर यमदूतों के साथ मैं स्वयं जाऊँगा। इस बहाने मेरा भी कुछ सैर-सपाटा हो जायेगा और मेरे यमदूत फ़ील्ड में कैसा काम करते हैं इसकी भी रिपोर्ट मिल जायेगी।

दफ़्तर की गाड़ियों में बैठ हम ठीक समय पर अपने अपने इलाक़ों में पहुँच गये। हमारे दफ़्तर का एक नियम था कि किसी के प्राण लेने से पहले हम उसका इंटरव्यू  लेते थे। मरने से पहले वो अपने सब चाहने वालों से मिल ले इसलिये हम उसे दो घण्टे का समय देते थे। उस दिन शाम के पाँच बजे तक हम कोई पन्द्रह जानें ले चुके थे। सोलह नम्बर कार्ड ’चुलबुली’ नाम की एक महिला का था। जब हम उसे लेने पहुँचे तो देखा कि वो एक क्लब में किसी मित्र की पार्टी में बड़े ज़ोर-शोर से नाच रही थी। उसे देख कर ऐसा लगता था कि उसे दुनिया का कोई ग़म नहीं है और वो पूरी मस्ती से हर पल को जी रही है।

इन्टरव्यू के दौरान जब चुलबुली को हमारे आने का कारण पता चला तो वो बहुत गिड़गिड़ाई और कहने लगी कि अगर उसको कुछ दिन और जीने का मौक़ा मिल जाये तो हमारी उस पर बहुत बड़ी कृपा होगी। मैंने उसे बताया कि हम ब्रह्मा जी और शिवजी के नियमों से बँधे हुये हैं और इस मामले में नियम के उल्लंघन करने की कोई भी गुंजाइश नहीं है। मेरे हाथ में कार्डों की मोटी गट्ठी देखकर चुलबुली समझ गई कि हम लोग अपने कार्डों के हिसाब से ही अगला प्राणी चुनते हैं। एकाएक उसकी आँखों में एक चमक सी आ गई और वो कहने लगी कि अगर हम अपने अगले प्राणी का कार्ड की ढेरी के नीचे से चुनेंगे तो उसका नंबर सब से बाद में आयेगा और उसे जीने और नाचने का कुछ और समय मिल जायेगा।

हालाँकि ऐसा करना हमारे डिपार्टमैन्ट के क़ायदे-क़ानून के बिल्कुल ख़िलाफ़ था फिर भी न जाने क्यों मुझे चुलबुली पर तरस आ गया और मन ही मन मैं ने यह फ़ैसला कर लिया कि अगले प्राणी हम चुलबुली के सुझाव से ही चुनेंगे। यह बात मैंने किसी को भी नहीं बताई। मुझे यह भी पता था कि चुलबुली के बाद हमारा अगला प्राणी भी इसी क्लब में है। 

चूँकि खाने का समय हो गया था इसलिये उसी क्लब में एक कोने में बैठ कर खाने का आर्डर कर दिया। इस बीच चुलबुली भी मेरे वाली मेज़ पर आ गई। कार्ड की ढेरी को मेज़ पर छोड़ कर मैं हाथ धोने के लिये वाशरूम गया । समय आने पर मैंने चुलबुली को बुलाया और कहा कि मैंने उसकी बात मान ली है और आगे के सब प्राणी मैं नीचे से ही चुनूँगा। कहाँ तो मैं सोच रहा था कि चुलबुली यह सुन कर बहुत ख़ुश होगी लेकिन जैसे ही मैंने सब से नीचे वाला कार्ड निकाला चुलबुली के चेहरे की हवाइयाँ उड़ चुकी थीं और वो हक्का-बक्का हो कर मेरी तरफ़ देख रही थी। वो रह रहकर गिड़गिड़ा रही थी कि मैं नीचे वाले कार्ड से अपना अगला इंसान न चुनूँ। उसका कहना था कि मैं अपने बनाये हुए हिसाब से ही चलूँ। मैं बहुत परेशान हो गया। क्या हो गया है इस औरत को जो थोड़ी देर पहले कही अपनी बात का ही खण्डन कर रही है। हालाँकि कार्ड ढेरी में से निकाला जा चुका था और मुझे कार्ड वाली आत्मा को अपने साथ ले जाना था फिर भी मैं ने बड़ी उत्सुकता से पूछा कि आख़िर माजरा क्या है?

मेरा सवाल सुनकर रोते हुये चुलबुली बोली, “यमराज जी, जब आप वाशरूम गये थे उस समय मैंने अपना कार्ड चुपके से गट्ठी के सब से ऊपर से हटा कर सब से नीचे रख दिया था। मुझे क्या पता था कि आप मेरा सुझाव मान लेंगे।“ 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

 छोटा नहीं है कोई
|

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के गणित के प्रोफ़ेसर…

अक़लची बन्दर
|

किसी गाँव में अहमद नाम का एक ग़रीब आदमी रहता…

आतंकी राजा कोरोना
|

राज-काज के लिए प्रतिदिन की तरह आज भी देवनपुर…

आत्मविश्वास और पश्चाताप
|

आत्मविश्वास और पश्चाताप में युद्ध होने लगा।…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

सांस्कृतिक कथा

ललित निबन्ध

कविता

किशोर साहित्य कहानी

लोक कथा

आप-बीती

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं