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डायरी का पन्ना – 004: जौगर

एक मशहूर कहावत है कि “दूसरे की थाली में परोसा हुआ बैंगन भी लड्डू लगता है”। अपना जीवन तो हम सब जीते ही हैं लेकिन दूसरे की ज़िन्दगी में झाँक कर और उसे जी कर ही असलियत का पता चलता है। इस कड़ी में अलग अलग पेशों के लोगों के जीवन पर आधारित जीने का प्रयास किया है।

 

मशहूर कहावत है कि जब तक अफ़ीमची को अफ़ीम का गुटका, शराबी को शराब का पौआ और नशेख़ोर को चिलम का सुट्टा नहीं मिलता, उसका बेचैनी के मारे बुरा हाल रहता है। जौगिंग के बिना, समझ लो कि अपनी गिनती भी इन्हीं लोगों में आती है। अपना तो यह आलम है कि सुबह हो या शाम, गर्मी हो या सर्दी, बदली हो या धूप, जब तक दिन में कम से कम एक बार जौगिंग ना करलूँ; सारा जिस्म टूटने लगता है। ऐसा महसूस होता है जैसे ज़िन्दगी का सारा मज़ा ही किरकिरा हो गया हो और किसी भी काम में मन नहीं लगता।

मेरे जौगिंग करने का बँधा-बँधाया एक अपना ही रूट है। इस रूट पर फ़ुटपाथ के दोनों ओर घने पेड़ों से सजे रास्ते से मैं पूरी तरह से वाकिफ़ हूँ। ट्रैफ़िक भी बहुत कम है। इसी बहाने और सैर करने वालों और दूसरे जौगिंग करने वालों से हैलो भी हो जाती है। मेरे इस रूट वाले सबडिविज़न में म्युनिसिपैलिटी वालों को नया सीवर डालना था इसलिये अब इस रास्ते में कंस्ट्रक्शन का काम शुरू हो गया था। कुछ तोड़ा-फ़ोड़ी तो हो भी चुकी थी और लम्बे सीवर डालने के लिये काफ़ी खुदाई का काम भी बाक़ी था। जगह जगह पर “ख़तरे” के बोर्ड लगा दिये गये थे।  

यह सोचकर कि अब यह रूट जौगिंग के लिये ठीक नहीं है और ख़तरनाक होता जा रहा है, मैंने साथ वाले पार्क में जाना शुरू कर दिया। इस पार्क में लोग अपने कुत्तों के साथ घूमने आते थे। वैसे तो म्युनिसिपैलिटी का क़ानून है कि कहीं भी बाहर ले जाने के लिये कुत्ते के गले में पट्टा होना ज़रूरी है लेकिन शहर में केवल यही एक ऐसा पार्क है जहाँ लोग अपने कुत्तों को खुला छोड़ सकते हैं ताकि वो चारों ओर भाग सकें। थोड़ी देर बाद मालिक अपने अपने कुत्तों को पट्टा बाँध कर घर ले जाते हैं। 

पार्क में मेरा यह दूसरा दिन था। बैंच पर बैठा मैं दौड़ने की तैयारी में अपने स्नीकर कस ही रहा था कि आठ दस साल का एक छोटा बच्चा मेरे पास आकर बोला। “अंकल, अंकल, वो जो भूरे रंग का कुत्ता आप देख रहे हैं न, वो मेरा टॉमी है। मुझे घर जाना है और टॉमी मेरी पकड़ में नहीं आ रहा है। प्लीज़, प्लीज़, अंकल क्या आप उसको पकड़ने में मेरी हैल्प करेंगे।” मुझे समझ नहीं आ रहा था कि उस बच्चे को मैं क्या जवाब दूँ? फिर कुछ सोचकर मैंने हाँ कर दी और लपका टॉमी की तरफ़। मेरा ख़्याल था कि एक ही झटके में मैं टॉमी को पकड़ कर उस बच्चे के हवाले कर दूँगा। लेकिन मेरा सोचना ग़़लत निकला। जैसे-जैसे मैं टॉमी को पकड़ने के लिये हाथ बढ़ाता, वो मुझ से एक क़दम आगे भागने लग जाता। यह सिलसिला काफ़ी देर तक चलता रहा और टॉमी ने मुझे एक घण्टे तक सारे पार्क का चक्कर लगवा दिया और फिर भी हाथ न आया। ख़ैर जैसे-तैसे करके मैंने एक-दो और लोगों की मदद लेकर टॉमी को पट्टे में बाँध कर उस बच्चे के हवाले किया। इस मशक़्क़त करने के बाद अब और जौगिंग करने की मेरी ताक़त ख़तम हो चुकी थी। खिरामाँ-खिरामाँ जैसे-तैसे घर पहुँचा। 

इन सब के बावजूद जौगिंग का मेरा जनून वैसे ही जारी रहा और अब मुझे पार्क भी अच्छा लगने लगा था।

काम के सिलसिले में मुझे कोई दो सौ किलोमीटर दूर एक छोटे शहर पोर्ट एल्गिन में जाना पड़ा। वहाँ पर इलैक्ट्रिफ़िकेशन के काम का इंस्पेक्शन करना था और मुझे कोई दो तीन हफ़्ते वहाँ गुज़ारने थे। शहर में बस एक ही मोटल था और वहीं पर मैंने अपने ठहरने का बन्दोबस्त कर लिया था। दिन में तो मौक़ा मिलता नहीं था, इसलिये मैंने रोज़ शाम को जौगिंग करने का प्रोग्राम बना लिया। जिस सड़क पर मेरा मोटल था, उसी लाईन में और लोगों के घर भी थे। एक बात जो मैंने ख़ास नोट की वो थी कि हर घर में एक कुत्ता ज़रूर होता था। किसी-किसी घर में तो एक से अधिक कुत्तों को भी देखा था। और तो और, जिस मोटल में मैं ठहरा हुआ था वहाँ भी चार पालतू कुत्ते रक्खे हुये थे। 

ख़ैर, पहला जौगिंग का दिन ठीक तरह से गुज़र गया। उसी शाम को जब रैस्टोरैण्ट में बैठा मैं खाना खा रहा था तो मोटल का मालिक मेरे पास आकर बैठ गया। बातचीत के दौरान उसने बताया कि पोर्ट एल्गिन में चोरी की वारदातें आम होने की वज़ह से, और सारे शहर में सिर्फ़ चार पुलिस वाले होने के कारण, लोगों ने अपने घरों में कुत्ते रखने शुरू कर दिये हैं। उसने आगे बताया कि यही नहीं, घर वालों ने उन कुत्तों को भागते हुये लोगों का पीछा करने के लिये भी ट्रेन किया हुआ है। 

अगली शाम जब मैं जौगिंग के लिये, जैसे ही मोटल से निकला, तो थोड़ी दूर जाने पर एक कुत्ता घर से बाहर आया और मुझे देख कर भौंकने लगा। घबराकर मैंने भागना बन्द कर दिया और आहिस्ता-आहिस्ता चलना शुरू कर दिया। मुझे स्लो देखकर कुत्ता भी शांत हो गया और अपनी कोठी में चला गया। तीसरे दिन तो एक दूसरे मकान के कुत्ते ने, मुझे भागता देख, भौंकते हुये, मेरा पीछा करना शुरू कर दिया। जब-जब मैं स्लो हो जाता, कुत्ता भी चुप तो हो जाता और मेरे पीछे-पीछे चुपचाप चलने लगता। जैसे ही मैंने भागना शूरू करता कुत्ता भी भौंकते हुये मेरे पीछे भागने लगता। 

मेरी जौगिंग और कुत्तों का पीछा करने का यह सिलसिला यूँ ही चलता रहा। अब मुझे भी कुत्तों के भौंकने और पीछा करने की हरकतों की आदत सी हो गई थी। कुछ दिन बाद तो हालत यह हो गई कि गली के ही नहीं बल्कि मोटल के कुत्तों ने भी मेरा पीछा करना शुरू कर दिया। आगे-आगे मैं और पीछे-पीछे भौंकते हुये कुत्तों को देख कर ऐसा लगता था जैसे कोई बैण्ड मास्टर अपनी टोली के साथ किसी शादी में बैण्ड बजाता हुआ जा रहा हो।

शहर में इलैक्ट्रिफ़िकेशन के इंस्पेक्शन का काम भी ख़त्म हो गया था और मैं अपने घर वापस आ गया था। हालाँकि सबडिवीज़न का सीवर का काम पूरी तरह से ख़त्म नहीं हुआ था लेकिन मेरे पुराने रूट पर सीवर डल चुके थे और सारा मलवा भी उठा दिया गया था। बस और क्या चाहिये मुझे? मेरा पुराना रुटीन फिर से शूरू हो गया।

कुछ कहावतें हैं जैसे “कभी किश्ती पानी में और कभी पानी किश्ती में”, “कभी सवार घोड़े पर और कभी घोड़ा सवार पर”, “कभी पुलिसवाला चोर के पीछे और कभी चोर पुलिसवाले के पीछे”। 

अपने इस अनुभव को हमेशा ज़िन्दा रखने के लिये आज मैं इन कहावतों में “कभी आदमी के डर से कुत्ता भागे और कभी कुत्ते के डर से आदमी भागे” को शामिल करना चाहता हूँ।
 

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टिप्पणियाँ

पाण्डेय सरिता 2021/05/29 09:37 PM

बहुत खूब

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