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डायरी का पन्ना – 005: मिलावटी घी बेचने वाला

एक मशहूर कहावत है कि “दूसरे की थाली में परोसा हुआ बैंगन भी लड्डू लगता है”। अपना जीवन तो हम सब जीते ही हैं लेकिन दूसरे की ज़िन्दगी में झाँक कर और उसे जी कर ही असलियत का पता चलता है। इस कड़ी में अलग अलग पेशों के लोगों के जीवन पर आधारित जीने का प्रयास किया है।


लाल चौक के दक्खनी नुक्क्ड़ पर, “बंसी सुपरमार्केट” नाम की, मेरी करियाने की दुकान है। वैजीटेबल घी के साथ-साथ मैं अपनी दुकान पर आटा, दाल, चावल, बेसन, चीनी और खाने-पीने का सारा सामान भी बेचता हूँ। सस्ते और बढ़िया माल के लिये मेरी दुकान सारे शहर में मशहूर है और मेरे ग्राहक भी बँधे हुये हैं।

अपनी आमदनी को थोड़ा और बढ़ावा मिल जाये इसलिये दुकान के थड़े (चबूतरे) के एक हिस्से में मैंने एक पान वाले को बिठा लिया था। शाम तक उसकी जो भी कमाई होती थी, उसका २५ प्रतिशत वो मुझे देता था। क्योंकि पान वाले का बैठना ग़ैरक़ानूनी था इसलिये उस एरिया के पुलिस वाले का मुँह बन्द करने के लिये मुझे उसको भी हफ़्ता देना पड़ता था। मैं ख़ुश, पान वाला ख़ुश और पुलिस वाला ख़ुश। बस और क्या चाहिये मुझे? मौजाँ ही मौजाँ! अपनी तो चैन की बंसी बज रही थी।

ना जाने क्यों. . . आसपास के और दुकानदारों को देख कर मेरे मन में भी घी में मिलावट करने की सनक सवार होने लगी। काफ़ी देर तक तो मैंने इस सनक पर ध्यान नहीं दिया। आख़िर लालच ने घेर लिया और इसी चक्कर में मैंने शहर के जाने-पहचाने बुद्धू हलवाई से उसके इस्तेमाल किये हुये घी को उठाने का ठेका कर लिया। अब रोज़ रात को मैंने इस तले हुये घी को असली वैजीटेबल घी में एक नपी-तुली मात्रा में मिलाना शुरू कर दिया।  क्योंकि अपने तो बँधे हुये ग्राहक थे और मिलावट भी बहुत कम होती थी, इसलिये किसी ग्राहक ने कभी कोई शिकायत नहीं की। यही नहीं, मुझे कुछ ऐसा एहसास भी होने लगा जैसे धीरे-धीरे मिलावटी घी खाने की मेरे ग्राहकों को एक आदत सी भी पड़ गई है। 

एकाएक इन्दिरा गांधी ने देश में अमर्जेंसी लगा दी। ऐसा लगने लगा था जैसे एक ही झटके में देश का सारा ढाँचा ही उलट-पुलट हो गया हो। रातों-रात लोगों के दिलों में एक दहशत और डर सा बैठ गया। ऐसे में पुलिस वालों की तो चाँदी हो गई क्योंकि उन्हें मनमानी करने की खुली छुट्टी मिल गई थी। कहाँ तो पुलिस वालों का बँधा हुआ हफ़्ता होता था और कहाँ अब वो दूसरे-तीसरे दिन आन टपकते और पैसा माँगने लगे थे। मैंने जब कभी भी ज़रा सी भी आनाकानी करी तो अमर्जेंसी का रोब देना शुरू कर दिया। झख मार के उन्हें पैसा देना पड़ता था। दुखी हो गया मैं, लेकिन कुछ कर भी तो नहीं सकता था। इन सभी चक्करों में अब अपनी आमदनी भी कम होती जा रही थी। 

आख़िर मरता क्या ना करता। बहुत मगज़-पच्ची के बाद इस नतीजे पर पहुँचा कि क्यों ना घी में मिलावट की मात्रा थोड़ी और बढ़ा दी जाये। यही सोच कर अगले बैच में बुद्धु हलवाई का तला हुआ घी थोड़ी अधिक मात्रा में मिलाना शुरू कर दिया। अगले दिन सारा मिलावटी घी बिक गया और एक हफ़्ते तक किसी भी ग्राहक की कोई शिकायत नहीं आई। 

धीरे-धीरे मुझे ऐसा लगने लगा जैसे मेरे सभी ग्राहकों को मेरे मिलावटी घी इस्तेमाल करने में कोई परेशानी नहीं है। यही सोचकर मैंने मिलावट की मात्रा कुछ और अधिक कर दी। क्योंकि अमर्जेंसी की वज़ह से शहर में घी की क़िल्लत भी शुरू हो गई थी इसलिये मेरी दुकान पर कुछ नये ग्राहकों ने भी आना शुरू कर दिया था। मामला ऐसे ही चलता रहा और मेरा लालच भी बढ़ता गया। समय के साथ-साथ मेरी मिलावट की मात्रा भी ज़्यादा होने लगी। 

ऐसे ही एक दिन एक ग्राहक ने, जो नया लगता था, मुझ से शिकायत की कि “लालाजी घी में कुछ अजीब तरह की गंध आती है”। मेरे कहने पर कि “मेरा घी तो बिल्कुल शुद्ध है और यह आपके मन का वहम है” वो कुछ नहीं बोला क्योंकि उसको पता था कि शहर में आजकल घी की बहुत कमी थी। हालाँकि इस बात से मैं चौकन्ना तो  ज़रूर हो गया लेकिन मिलावट मैंने उसी तरह से जारी रक्खी। इसी बीच मैंने नोट किया कि नये ग्राहकों में एक आदमी बाक़ी और ग्राहकों से कुछ सवाल कर रहा है। कुछ लोग तो उस से बात कर रहे थे लेकिन कुछ लोग कतरा कर एक तरफ़ हट गये थे जैसे उनको उस से कोई वास्ता नहीं है। उस ग्राहक को देखकर मेरे कान भी खड़े हो गये और मैं अधिक सावधान हो गया।

अमर्जेंसी का शिकंजा कसता ही जा रहा था। संजय गाँधी की तानाशाही बढ़ती जा रही थी। जबरन नसबन्दी के साथ-साथ हर रोज़ तरह-तरह की ख़बरें सुनने को मिल रही थीं। आख़िर बकरे की माँ कब तक ख़ैर मनायेगी और वो दिन जिस का मुझे डर था एक दिन आ ही गया। 

सोमवार को मैंने दुकान खोली ही थी कि वही आदमी, जो पहले दिन और ग्राहकों से सवाल-जवाब कर रहा था, मेरा पहला ग्राहक बन कर आया और बोला कि “लालाजी मैं फ़ूड इंस्पैक्टर हूँ और शिकायत हुई है कि आप बदबूदार घी बेचते हैं। आपका मैं चालान कर रहा हूँ और अगले हफ़्ते आपको ज़िला मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश होना होगा”। उसने चालान के काग़ज़ मेरे हाथों में थमा दिये और नमस्ते कहकर चला गया। उसके जाने के बाद जब चालान के काग़ज़ों को मैंने बहुत ग़ौर से देखा तो उन में घी के मिलावटी होने का कोई ज़िक्र नहीं था। 

अगले हफ़्ते नियत समय पर मैं अदालत पहुँचा। अपने नाम की आवाज़ सुनकर मैं मजिस्ट्रेट के कमरे में दाख़िल हुआ जहाँ मेरा मामला पेश हुआ। मेरे ख़िलाफ़ जुर्म था कि मैं जो घी बेचता हूँ उस में अजीब तरह की बदबू आती है जिससे लोगों की तबियत ख़राब होने लगी है। 

मजिस्ट्रेट ने जब मुझ से सवाल किया तो अपने बचाव में मैंने केवल यह कहा कि “साहब, मैं यह घी एक लम्बे अर्से से बेच रहा हूँ और आज तक मेरे किसी भी ग्राहक को कोई शिकायत नहीं हुई है। साहब, ऐसा भी हो सकता है कि फ़ैक्ट्री से जो माल आया हो उसी में कुछ गड़बड़ हो”। मेरे ख़िलाफ़ एक-दो ग्राहकों को भी पेश किया गया। सारी बातें सुन कर मजिस्ट्रेट ने फ़ैसला सुनाया कि बिना चैक किये मैंने ऐसा घी बेचा जो बदबूदार था और मुझे चेतावनी दी गई कि आगे से मैं अपने माल की अच्छी तरह से जाँच कर लूँ। चूँकि मेरी लापरवाही के इलावा मेरे ऊपर कोई और संगीन इल्ज़ाम साबित नहीं हुआ था इस लिये मजिस्ट्रेट ने मुझे तीन सज़ाओं में से एक को चुनने को कहा। 

वो सज़ायें थीं:

अपनी दुकान का ५० ग्राम घी पी लो।

अदालत के मैदान के चार चक्कर काटो।

२०० रुपये जुर्माना भुगतो।

यह सोचकर कि इतने अर्से से मैं सारे ग्राहकों को बेवकूफ़ बनाता आ रहा हूँ और मिलावटी घी बेच रहा हूँ, मैंने पहली सज़ा को चुना। मेरे आगे कटोरे में मेरी ही दुकान का ५० ग्राम घी लाया गया। जैसे ही मैंने पीने के लिये कटोरे को मुँह लगाया मुझे उल्टी आने लगी और मैं ५० ग्राम तो क्या अपनी दुकान का १० ग्राम घी भी नहीं पी सका। कोई और चारा न देख मैंने दूसरी सज़ा चुनी।

मैंने बाहर आकर अदालत के मैदान को देखा और चक्कर काटने को शुरू हो गया। अभी आधा रास्ता ही तय किया था कि पसीने के मारे बुरा हाल और साँस फूलने लगी। लगता था कि अब गिरा अब गिरा।

थक हार कर मैने तीसरी सज़ा क़ुबूल की और २०० रुपये देकर अपनी जान छुड़ाई।

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टिप्पणियाँ

Rajnandan Singh 2021/06/16 08:43 AM

सौ प्याज, सौ डंडे या सौ रुपये वाली सजा भी कुछ इसी तरह थी। अच्छा संस्मरण।

Rajnandan Singh 2021/06/16 08:43 AM

सौ प्याज, सौ डंडे या सौ रुपये वाली सजा भी कुछ इसी तरह थी। अच्छा संस्मरण।

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