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एक जोड़ी चप्पल

"नहीं तुम्हें कोरोना तो नहीं हुआ है, लेकिन एहतियात के तौर पर क्वारंटाइन सेन्टर जाना होगा," डॉक्टर के ऐसा कहते ही मनोज के जान में जान आयी साथ ही और लोगों के भी जो उसे अस्पताल लेकर आये थे। थोड़ी देर पहले ही तो पड़ोसियों के द्वारा हॉस्पिटल लाया गया था मनोज। लहूलुहान हुए पैरों में मलहम-पट्टी की गई थी और अब क्वारंटाइन सेंटर जाना होगा।

ख़ैर, अब जाना तो होगा ही। पर उसे मलाल है कि अपने हाथों से अपनी पत्नी रधिया को सैंडल नहीं दे सका। पर उसने साईकिल घर के द्वार पर लगाते हुए रधिया को बैग की ओर इशारा कर दिया था; इस बात का संतोष था।

क्वारंटाइन सेंटर सरकारी उच्च विद्यालय को बनाया गया था जहाँ मनोज को चौदह दिन मानों चौदह वर्ष के वनवास लगने वाले थे। वहाँ पहुँचते ही खाने में कीड़े होने की बात पर ख़ूब हंगामा हुआ। किसी तरह से बीडीओ साहब ने लोगों को समझाया तब जा के थोड़ी शांति हुई।

तीसरे दिन सुबह जब ध्यानासन- योग हो रहा था मनोज को याद आया कि कैसे गंगा नदी पर बने महात्मा गाँधी सेतु पुल पर ही उसका चप्पल टूट गया। एक बार ख़्याल आया कि रधिया के लिए ख़रीदी सैंडल ही पहन ले ताकि साईकिल चलाने में परेशानी न हो। पर अगर सैंडल टूट गयी तो! फिर किस मुँह से घर जाएगा, क्या रधिया नहीं पूछेगी कि मेरे लिए क्या लाये? यह सोचते हुए उसने सैंडल बैग में से नहीं निकाली जो उसके कंधे से लटक रहा था। पहले पैरों में छाले हुए, फिर फोड़े और आख़िर में फोड़े फूट गए और ख़ून बहने लगा पर मनोज रुकने वाला कहाँ। सीधे घर पहुँचा जो पटना से कुल एक सौ पांच किलोमीटर दूर था।

घर पहुँचते ही मुहल्ले वालों ने उसे तुरंत अस्पताल चले जाने को कहा। रधिया भी मुहल्ले वालों की भीड़ के कारण बस एकटक निहार रही थी, शब्द तो मुँह में मानों जम-से गये थे। अपने पैरों का ज़ख़्म मनोज छुपाना चाहता था पर रधिया के नज़र से कैसे छुपता? आँचल के किनारे से रधिया ने मुँह पोंछने का स्वांग रचा और अपने आँसू पोछ लिए।

पाँचवें दिन वार्ड मेंबर पधारे, लोगों में बाँटने के लिए कई जोड़ी चप्पलें लेकर। पर वार्ड मेंबर साहब की दुविधा कि चप्पलें दें तो दें किसे। चप्पलें कम थीं और लोग ज़्यादा। समाधान उनके सहयोगी ने सुझाया कि जिसके घर से ज़्यादा वोट मिलती है उसे ही चप्पलें बाँटीं जाएँ। अब तो मनोज का नंबर आने से रहा–, चूँकि उसके घर से तो दो वोट ही हो पाते एक ख़ुद का और एक पत्नी का। हाँ, वार्ड मेम्बर साहब ने मनोज को बाकियों कि तरह दो केले ज़रूर दिये।

दो दिन बाद डी.एम, साहब की विज़िट हुई। कई क्वारंटाइन किये गए लोगों के पास नई चप्पल और कइयों को ख़ाली पैर देख उन्हें आश्चर्य हुआ। एक अधिकारी को बुला कर उन्होंने कारण पूछा। कारण जान उन्हें थोड़ा भी आश्चर्य नहीं हुआ। तुरंत ही उन्होंने बिना चप्पल वाले लोगों के लिए चप्पलों के इंतज़ाम करने का आदेश दिया। 

आख़िरी दिन ही मनोज को एक जोड़ी चप्पल मिली। मनोज ख़ुश! घर जाते हुए मनोज कभी रधिया को सैंडल पहने देखने का सपना पूरा होते सोचता तो कभी अपने पैरों में पहनी चप्पल पर उसकी नज़र जाती।

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