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एक मैं एक वो

हाँ वो वही थी, जिसे मैं पंद्रह साल से भुलाने की कोशिश करते हुए भी भुला न पाई।

काले कोयले सा बदन, कसी हुई चमकती चमड़ी, काले चेहरे पर दो बड़ी-बड़ी आँखें जो दूर से दो सफ़ेद गोलाकार रंग-मंडप सी लगती थीं, गैराज के सामने रुकी किसी खटारी गाड़ी की जलती बुझती हेडलाइट्स की तरह। बालों का जूड़ा, सर के पीछे बेतरतीब ढंग से ठूँसा हुआ, उस पर अस्त-व्यस्त धागों में पिरोए केसरी फूल गूँथे हुए लिपटे थे . . .!

बांद्रा से थाने तक साथ सफ़र करते देखा था!

मैं लेडीज़ कंपार्टमेंट में सीट के किनारे बैठी ख़ुद को गिरने से बचाने के प्रयास में, कभी अपने पीछे "रॉड" को पकड़ती, कभी उसके साड़ी के पल्लू को पकड़ती। खिंचाव लाज़मी था। यह उसके मुड़ने और मुड़कर मेरी ओर देखने से ज़ाहिर होता।

" सॉरी . . .!" मैंने उसकी ओर देखते हुए कहा।

वह मेरी ओर देखती रही। फिर धीरे-धीरे उसकी कजरारी आँखों में एक दर्द भरी मुस्कान ने जन्म लिया।

मेरी नज़र अब उसकी आँखों पर टिक न पाई, नीचे उतर आई . . . और धीरे-धीरे उसके चुस्त कसे हुए जवान बदन से होते हुए उसके पेट पर आ रुकी।

वह पेट से थी, यह बात तो तय थी। शायद सातवाँ महीना हुआ होगा। उसके हाव-भाव से लगा कि वह अपने किसी दर्द की दवा पाना चाहती थी। कभी आँखें मींच लेती, तो कभी होंठ भींच लेती, कभी दाहिना हाथ सूती साड़ी में डालकर पेट के उभार पर फेर लेती।

मुझे लगा वे शुरूवाती प्रसव पीड़ा के आसार हैं, क्योंकि वह बार-बार अपने दाएँ पैर को बाएँ पैर पर रखकर ज़ोर से दबा रही थी। मेरी नज़र जब उसके पैरों से उठ कर उसके चेहरे की ओर आई तो देखा-उसके होंठ ज़ोर से भींचे हुए थे, आँखों से अश्रु बह रहे थे। तय था कि उसे बहुत पीड़ा हो रही थी। शायद असमय ही दर्द जागा था, वह भी इस दीवानगी में भागती हुई फ़ास्ट ट्रेन में!

नारी हूँ, जानती हूँ यह पीड़ा वक़्त-बेवक़्त ही आती है। जब दर्द एक अनजानी ख़ुशी को जन्म देने को आतुर होता है तो मीठी-मीठी सी कसक के साथ तन में तरंगें पैदा करता हुआ दर्द भी उठता है।

“यहाँ बैठ जाओ,” मैंने उसकी साड़ी का पल्लू खींचते हुए उसको अपनी ओर आकर्षित किया। वह शायद अब दर्द के कारण मुड़ने की स्थिति में नहीं थी, पर उसकी गर्दन के मोड़ से उसकी झुकी आँखों में एक सवाल तैरता नज़र आया। जवाब था मेरे पास। एक अनुचित स्थिति में एक उचित प्रयास करने की कोशिश मेरे बस में थी। पढ़ा था कहीं: ”कितनी अच्छी बात है कि विश्व में सुधार लाने के लिए किसी को भी एक पल का इंतज़ार करने की आवश्यकता नहीं है!"

मुझे भी नहीं थी। उसी पल अपनी जगह से उठते मैंने उसे बाँह से पकड़कर बैठने का अनुरोध किया। वह बैठ गई एक आज्ञाकारी बालिका की तरह। यह उसकी विवशता थी। अब मैं उसके स्थान पर खड़ी, निरंतर उसकी ओर देखती रही। उसके चेहरे के हाव-भाव पढ़ती रही उसके बारे में सोचती रही, जिसे मैं किसी भी कोण से नहीं जानती थी। पर एक अनजाना लगाव सा हो गया इन कुछ पलों में। संवेदनात्मक स्थिति में शायद मौन ने बहुत कुछ बाँटा, कुछ उसने, कुछ मैंने। बिन बोले नैनों की भाषा भी बहुत कुछ कह जाती है, यह तब जाना जब उसने कठिन प्रयास के बाद, अपनी बाँहों को आगे करते हुए दोनों हाथ अपनी गोद में जोड़ दिए। सिर्फ़ आँखें मेरी ओर टकटकी बाँधे देख रही थीं। यह उसके "धन्यवाद" कहने की शैली थी।

“सब ठीक है न?” मैंने उसके कंधे पर अपने दाएँ हाथ से मखमली दबाव डालते हुए पूछ लिया।

वह चुप रही।

बस उसने सिर्फ़ मेरी ओर देखा, हल्के से अपना सर हिलाया और फिर से जुड़े हुए हाथों में हरकत आई।

मैं समझ गई, वह फिर से आभार प्रकट कर रही है मूक भाषा में। मैंने अपना ध्यान उसकी ओर से हटाकर खिड़की के बाहर भागती-दौड़ती उन इमारतों पर धर दिया जो ट्रेन की रफ़्तार के बावजूद विपरीत दिशा में भाग रही थीं। जीवन में आगे भागते-भागते, कभी शायद खड़े होकर हम यह नहीं सोचते कि ज़िंदगी हमसे क्या छीन रही है?

अचानक ट्रेन रुक गई, और जाना कि वही मेरा पड़ाव था। मैं हड़बड़ा कर धक्के देती हुई अपना रास्ता बनाकर आगे बढ़ी और मुझे एहसास हुआ कि कोई मुझे धक्के देकर आगे बढ़ने में मदद कर रहा है। जैसे ही पाँव प्लेटफ़ॉर्म पर टिके तो देखा, वह गर्भिणी औरत भी लगभग मेरे साथ सटकर खड़ी थी। उसकी अनुनय-विनय करती आँखें मेरे भीतर तक उतर रही थीं। हम दोनों ने एक दूसरे की आँखों में झाँका, कहा कुछ नहीं। शायद हमारे पास शब्द ही नहीं थे जो हम एक-दूसरे को समझा सकें। यह मैं भली-भाँति जान गई थी, कि भाषा विज्ञान भाव मुद्रा से भी लिखा-पढ़ा जा सकता है। मैंने देखा, वह हाथ जोड़ने में असमर्थ थी, क्योंकि उसने दोनों हाथों के गोलाकार में अपना पेट थाम रखा था।

नारी मन भाँप गया। मैं जल्दी-जल्दी आगे बाहर की ओर बढ़ी और वह सुस्त रफ़्तार से मेरे पीछे-पीछे। मैंने एक टैक्सी वाले से बात की और उसे भीतर बैठने के लिए जब निमंत्रण दिया, तो वह दो क़दम पीछे की ओर हटी। मैं दंग रह गई, उसकी प्रतिक्रिया देख कर। वह हाथ के इशारे से मुझसे आग्रह कर रही थी, "तुम जाओ . . . मैं यहाँ रुकती हूँ। कोई आने वाला है मुझे लेने . . . जाओ जाओ . . .” बार-बार हाथ हिलाकर संकेत दे रही थी।

मैं टैक्सी में बैठी और टैक्सी मेरे दिए हुए नियमित पते पर मुझे पहुँचाने में पहल कर रही थी। अब उसके और मेरे बीच का फ़ासला बढ़ रहा था। कुछ पल पहले कितने पास थे हम, और अब कितने दूर हुए जा रहे हैं। मैं सोचती रही उसके बारे में, जो उसे लेने आने वाला था। वह समय पर नहीं आया, क्यों? शायद कोई आने वाला ही न था? कौन जाने वह किस दुविधाजनक स्थिति में थी, या अपनी जान बचाकर किसी से पीछा छुड़ाने के लिए उस गर्दी से लदी ट्रेन में चढ़ गई थी। उलझन भरी मनोस्थिति से मैं तब भी घिरी हुई थी और आज भी।

 

◊◘◊

 

सोच की कड़ी जो बरसों पहले टूटी थी, अचानक आज फिर जुड़ गई। वह सामने खड़ी थी। वही रंग, वही रूप, वही आँखें। भीड़ में भीड़ का हिस्सा थी, पर फिर भी सबसे अलग। उसने मुझे देखा, मैंने उसे। वह रुकी, और मैं भी रुकी। उसने अपने क़दम बढ़ाकर ख़ुद को मेरे सामने लाकर खड़ा किया . . . और देखते ही देखते वह ज़मीन की ओर झुकी, मेरे पैरों को छुआ और दंडवत प्रणाम करते हुए दायें हाथ से ज़मीन को कई बार छूकर वही हाथ अपने माथे पर फिराती रही।

मैंने झुक कर उसे आशीर्वाद देते हुए पूछा, “कैसी हो तुम?"

“अच्छी हूँ, आपकी आशीर्वाद से . . .”

“मेरा आशीर्वाद . . . सदा ख़ुश रहो,” मैं जैसे बेहोशी से होश में आई।

मुद्राओं का स्थान भाषा ने ले लिया। भाषा विज्ञान के बारे में मेरी समझ अब शून्य होने लगी।

“हाँ आपका आशीर्वाद . . .!”

“वो कैसे . . .?” मैं ख़ुद को सँभालने में प्रयासरत थी। अब अवस्था कुछ ऐसी थी कि गूँगा कह रहा था और बहरा सुन रहा था।

“हाँ, अम्मा उस दिन आपने मुझे बचा लिया। मेरा बेवड़ा पति मुझे मार-काटने पर उतारू हो गया था। उसे शक था कि मेरे पेट में बच्चा उसका नहीं, किसी और का था,” कहते हुए उसने एक लंबी साँस ली।

मेरी साँस रुकने सी लगी। इतनी साफ़-सुथरी प्रवाहमान भाषा, बेबाकी से कही उसकी आपबीती सुनते मेरा सर चकराने लगा।

“हे राम . . .” मेरे मुँह से अनायास ही निकला।

“अम्मा, उस दिन आपकी टैक्सी जैसे ही आगे बढ़ीं, वह भी उसी ट्रेन से उतर कर, मेरा पीछा करते हुए आ पहुँचा। मुझे बालों से खींचता हुआ, धक्के देता हुआ मारते-मारते हताश हो रहा था। मैं गिरती-पड़ती रही, हाथ जोड़कर उसे विश्वास दिलाती रही कि वह बच्चा उसका ही है। पर उसके सर पर खून सवार था और उसने सच में उस बच्चे का खून कर दिया . . .! अब मैं बे-औलाद हूँ, क्योंकि कोख में पनपते अपने बच्चे की रक्षा नहीं कर सकी। ख़ुद को गुनहगार समझकर कर मैंने अपने लिए सज़ा चुनी। सब कुछ छोड़ दिया, घर-पति, पड़ोसी, वह लाँछन भरी बदबूदार बस्ती! और आज अनाथ आश्रम में बच्चों के पालन-पोषण में अपना जीवन व्यतीत करती हूँ। न कोई मेरा अपना है, न मैं किसी की। बस वह आश्रम ही मेरा घर है, और वहाँ रहने वाले बंधु मेरा परिवार . . .!”

“इतना लम्बा सफ़र तय कर आई हो . . .?” मैं यह तय न कर पाई कि मुझे आगे क्या कहना चाहिए?

“अम्मा आपको बहुत याद किया, भगवान को प्रसाद चढ़ाया कि एक बार आपका दर्शन फिर से मिल जाये। वह इच्छा भी आज पूरी हुई। नमस्कारम अम्मा,” कहकर वह जाने के लिए मुड़ी।

“अरी रुक तो। अपना नाम तो बता,” मैं उससे जुड़ने के लिए तत्पर थी।

“नाम, अब मेरा कुछ भी अपना नहीं अम्मा। न घर, न घरवाला, न नाम . . .! बस अब मैं सिर्फ़ ’अक्का’ हूँ, उन अनाथ बच्चों की ’अक्का’, जिन की सेवा के लिए नियुक्त की गई हूँ। उनकी ज़बान से ’अक्का, अक्का . . .’ की पुकार मेरे कानों तक जब पहुँचती है तो मैं जी उठती हूँ अम्मा।”

“पर तुम तो . . .” सवाल मेरे गले में ही धँस गया।

“आप यही पूछना चाहती है ना कि मैं बोल रही हूँ . . .”

“हाँ तुम्हारी बातें सुनकर हैरान भी हूँ और ख़ुश भी।”

"अम्माँ, उस दिन बोल न पाई, सकते में आ गई थी उसकी बातें सुन=सुन कर। कहता था: ’ज़बान काट लूँगा अगर ज़बान खोली तो’। मैं डर गई, वह दरिंदा ऐसा भी कर सकता है, पीने के बाद कहाँ किसको होश रहता है।”

“क्या तुम्हारा पति इतना बेदर्द है जो अपनी पत्नी पर हाथ . . .!” मैं अभी पूरी बात कह भी न कर पाई तो वह बोल पड़ी।

“अम्मा, उस नामर्द की याद आते ही मैं आज भी गूँगी हो जाती हूँ। उस माठीमिले के सवाल का गलत जवाब दे दिया था उस दिन। बहुत गुस्से में भर गई थी उसके आरोप सुन-सुनकर। जब उसने फिर वही लाँछन दोहराया, ’यह बच्चा मेरा नहीं है’ तो मन की उगलती आग ने कह दिया: ’हाँ, हाँ यह बच्चा मेरे यार का है’।”

"बस फिर क्या था, उसने आगे बढ़ कर मुझे दबोच लिया अपनी टाँगों और बाँहों की जकड़न में और अपने हाथों में पकड़ी हुई जलती हुई बीड़ी ज़बरदस्ती मेरा मुँह खोलकर, मेरी जीभ पर न जाने कितनी बार रखी, मैं बेज़बान हो गई। बस अपनी आँखों से अश्रु बहाती रही। उसका ग़ुस्सा अपनी मनमानी करके जब ठंडा हुआ तो वह कुछ देर के लिए बाहर निकला। जाने क्या सोच कर मैं भी विपरीत दिशा में घर से गिरती-पड़ती भाग निकली। खोली से कुछ दूरी पर स्टेशन है। अपने बचाव के लिए भीड़ का सहारा लेकर मैं उस ट्रेन में चढ़ गई, बिना सोचे कि वह किस दिशा में और कहाँ जा रही है।” कहते हुए उसने अपनी जीभ बाहर की ओर निकाली और फिर तुरंत मुंह बंद कर लिया . . .!

मैंने देखा उस लाल-काली जीभ को, जिसपर जलने के गोलाकार धब्बे मौजूद थे। मैं सोच रही थी "क्या अमानुषता इस हद तक भी जा सकती है"? संभव की सीमा का पता लगाने के लिए आगे बढ़कर असंभव के दायरे में जाना होता है, इस सच को स्वीकार करने के लिए। मैंने तो सिर्फ़ देखा, उसने भोगा है, जिया है। हक़ीक़त भ्रम नहीं हो सकती . . .! 

इसी हक़ीक़त और भ्रम के चक्रव्यूह से उसकी आवाज़ मुझे बाहर ले आई।

“अम्मा, तब भी मैं आपके सामने थी और आप मेरे सामने। पंद्रह साल के बाद आज भी हम एक-दूसरे के आमने-सामने, मैं आपके हर सवाल का प्रत्यक्ष जवाब हूँ अम्मा!”

मैं निशब्द होकर रह गई। क्या मानवता अपनी पहचान इतनी खो बैठी है कि उसे अपनेपन की परिभाषा भी याद नहीं। उसकी कही बात ज़ेहन में बार-बार गूँजती रही: ’न कोई मेरा अपना है, न मैं किसी की हूँ। बस वह आश्रम ही मेरा घर है, और वहाँ रहने वाले बंधु मेरा परिवार . . .’!”

यह वही थी, जिसका नाम है "अक्का" और वही "अक्का" आज अपने परिश्रम से पाई हुई पहचान, और ओहदे की परिधि में बहुत ख़ुश है।

उससे मिलकर मैं बेहद ख़ुश हूँ। अब परायेपन की सभी दीवारें गिर चुकी हैं। मेरा उससे अक़्सर मिलना होता रहता है। आश्रम में, आश्रम की अन्य गतिविधियों व् कार्यक्रमों में। जहाँ कहीं भी वह आने का बुलावा भेजती है, मैं चली जाती हूँ। स्नेह का यह नाज़ुक बंधन है जिसका कोई रंग नहीं, कोई नाम नहीं!

यह वही प्रेम है जिसके लिए रूमी ने लिखा है–

“प्रेम ने मेरे हृदय को गिरफ़्तार किया
मेरे रुदन ने पड़ोसियों को रात भर जगाए रखा
अब, जब मेरा प्रेम गहरा हुआ है
मेरे क्रंदन में ठहराव आया है।
शायद
जब आग भड़क उठती है, तो
धुँआ ग़ायब हो जाता है!”

परिधियों से परे, प्रकृति व् मानव के अटूट बंधन का आकार साफ़-साफ़ दिखाई दे रहा है।

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