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घड़ी और मैं

अभी पैर बदल गये हैं
घड़ी की तेज़ चलती सुइयों में,
अभी थकावट का काला बादल
ढँक रहा है
ऊर्जा का सूरज
अभी फूल तक रूठे से दिखते हैं
और कामों की लम्बी सूची,
घोंट रही है
मेरे विचारों का गला!

पर लौटेगा बसंत,
जानती हूँ
तब यह बर्फीली हवा
ख़ुद ही बदल कर
पसर जायेगी
गुनगुनी धूप में
मेरे चारों ओर!

तब मैं घड़ी में नहीं,
बल्कि बदल जाऊँगी
समय के अनंत बहते जल में,
जिस पर बहेंगे भावों के
शतदल कमल!!

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