अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य ललित कला

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा वृत्तांत डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

गोपेश कुमार – 001

हे माँ वीणा वादिनी, करो नमन स्वीकार।
ज्ञान-विज्ञान से जननी, भर दो सब भंडार॥ ०१
 
नारी तू नारायणी, आदि शक्ति का रूप।
प्रेम दया बलिदान का, शुभ सजीव प्रतिरूप॥ ०२
 
मुझसे पूछे आइना, कहा गया वह रूप।
मैने कहा जला गई, चिंताओं की धूप॥ ०३
 
छोड़ा था जिस मोड़ पर, प्रियवर तुमने हाथ।
छूट गया था बस वहीं, ख़ुशियों से भी साथ॥ ०४
 
ममता, प्रेम, दुलार का, चुका रहे हैं ब्याज।
बाँट रहें हैं लाडले, मात-पिता को आज॥ ०५
 
कच्चे धागे से बहन, बाँधे पक्की प्रीत।
कहे वीर मत तोड़ना, राखी की तुम रीत॥ ०६
 
बूढ़ी माता रो रही, बेबस बैठा बाप।
लड़कर बेटे ले रहें, घर-आँगन का माप॥ ०७
 
शुद्ध व्याकरण पर कसी, भाषा है यह ख़ास।
विपुल संपदा शब्द की, है हिंदी के पास॥ ०८
 
पत्रकारिता कर रही, ख़बरों का व्यापार।
बेच रही हर बात को, बना मसालेदार॥ ०९
 
महुए की मीठी महक, अरु कोयल की कूक।
यादें बिछड़े गाँव की, रख ली है संदूक ॥ १०
 
मोती-सा महुआ झरे, महके सारा बाग़।
झूमे सरसों खेत में, गाये  पुरवा राग॥ ११
 
हरी-भरी धरती रहे, सजे खेत खलिहान।
अन्न मिले हर पेट को, चाहे यही किसान। १२
 
मेरी निश्छल प्रीति को, ख़ूब मिला उपहार।
जलने को यादें मिलीं, बुझने को अश्रु धार॥ १३
 
ख़ूब निभाया साथिया, तुमने सच्चा प्यार।
तोड़ी माला प्रेम की, पहना धन का हार॥ १४
 
करें कलंकित भक्ति को, मन के काले लोग।
घर में माँ भूखी रहे, दें मूरत को भोग। १५
 
पल-पल बदले पैंतरे, खेले मानव दाँव।
काटे ख़ुद उस पेड़ को, जिससे पाए छाँव॥ १६
 
चूल्हे जैसा है जगत, लकड़ी जैसे लोग।
चिन्ता-चिता पका रहीं, अपना-अपना भोग॥ १७
 
भरे-भरे शमसान हैं, सूने हैं बाज़ार।
देख हाथ बाँधे रहा, विधि भी है लाचार॥ १८
 
रोज़ी-रोटी छिन गई, बंद हुए व्यापार।
भारी पड़ी ग़रीब को, कोरोना की मार॥ १९
 
कड़वे अनुभव दे गया,सन दो हज़ार बीस।
पाठ वही दुहरा रहा, दो हज़ार इक्कीस॥ २०

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

अर्थ छिपा ज्यूँ छन्द
|

बादल में बिजुरी छिपी, अर्थ छिपा ज्यूँ छन्द।…

अक़्सर ये है पूछता, मुझसे मेरा वोट
|

  पंचायत लगने लगी, राजनीति का मंच।…

अख़बार
|

सुबह सुबह हर रोज़ की,  आता है अख़बार।…

अफ़वाहों के पैर में
|

सावधान रहिये सदा, जब हों साधन हीन। जाने…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता-मुक्तक

दोहे

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं