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हेट मैरिज बनाम लव मैरिज

कहावत है कि जोड़े ऊपर से बन  कर आते हैं। यदि यह बात सच न होती तो "विद आल माय गुड इंटेंशंस एंड विल पौवर, आय एम डिफीटेड एंड इट इज़ नौट पौसिबिल फौर मी टु मैटीरिअलाइज़ दिस रिलेशनशिप" और "मैं एक लोफर के साथ ज़िंदगी नहीं बिता सकती"– इन भावनाओं के बावजूद यदि यह लड़का और यह लड़की फ़िल्मी अंदाज़ में विवाह बंधन में बँध जायें और फिर यह ‘हेट मैरिज’, ‘लव मैरिज’ में परिवर्तित हो जाये और वे सुखी जीवन बितायें तो है न ताज्जुब की बात। मेरी बहन सुषमा जो इस कहानी की चश्मदीद गवाह है ने कहा‌‌– "तुम इतना लिखती रहती हो, यह कहानी क्यों नहीं लिखतीं?"

सुषमा की प्रेरणा पर मेरे मन में भी लिखने की भावना जागी और मैंने लेखनी उठा ली।

यह घटना जून 1963 की है जब श्री राधेश्याम शर्मा इटावा में पुलिस अधीक्षक थे। सिविल सर्विसेज़ की परीक्षा का परिणाम निकला था और उनके सम्बंधी (साढ़ू) श्री रामस्वरूप मिश्रा ने उन्हें उनकी बेटी के लिये एक आई.पी.एस में चयनित लड़के का पता बताया था जो कि इटावा ज़िले के अछल्दा के पास के गाँव का रहने वाला था। इसी बीच शर्मा जी को अपना स्थानांतरण देहरादून होने की सूचना मिली। मिश्रा जी ने समझा कर कहा– "यहाँ से जाने से पहले लड़के के घरवालों से बात कर लो।" 

शर्मा जी  ने दिबियापुर के अपने एक विश्वस्त ब्राह्मण दरोगा अग्निहोत्री जी को बुलाकर लड़के के विषय में पता लगाने को कहा।

दरोगा जी ने सोचा कि साहब ने मुझ पर इतना विश्वास किया है। यदि मैं यह सम्बंध करा दूँ तो मैं साहब का सदा के लिये कृपापात्र हो जाऊँगा। दरोगा जी लड़के के घर गये। लड़के के पिता जी भी सेवानिवृत दरोगा थे। उनका पुत्र भी उस दिन घर पर मौजूद था और मसूरी एडमिनिस्ट्रेटिव एकेडमी में ट्रेनिंग के लिये जाने वाला था। उनके घर-बार के विषय में जानकारी लेकर अग्निहोत्री जी ने लड़के के पिता श्री शम्भू दयाल दुबे के पास शर्मा जी की कन्या का विवाह प्रस्ताव रख कर कहा– "शर्मा जी का तबादला देहरादून हो गया है। वह चाहते हैं कि यदि आप लोग उनके इटावा से जाने से पहले चल कर उनकी लड़की को देख लें तो आपको भी आसानी रहेगी और उन्हें भी।" उन्होंने लड़की के बारे में भी उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा कि– "यदि सब कुछ ठीक-ठाक लगे तो लड़की की रोक भी कर दीजियेगा।" उधर शर्मा जी के पास जाकर अग्निहोत्री जी ने  लड़के और परिवार की सज्जनता के विषय में यथोचित प्रशंसा करके कहा‌– "परिवार सज्जन है। लड़के को मैंने देखा है स्मार्ट है और ट्रेनिंग में मसूरी गया है। दुबे जी आपके प्रस्ताव पर सहमत हैं। वह आपके देहरादून जाने से पहले यहीं लड़की देखने की बात कर रहे हैं। परसों शुभ दिन है अतः वे लोग परसों यहाँ आयेंगे।" 

शर्मा जी अभी मानसिक तौर पर कन्या के विवाह के लिये तैयार नहीं थे और यह स्थिति आ जाने से चिंतित हो उठे। उन्हें लगा कि इस तरह से लड़की दिखाना उचित नहीं है। कोई आवश्यक तो नहीं कि रिश्ता पक्का ही हो जाये। यदि रिश्ता न हुआ तो लड़की को दुख होगा, अतः उन्होंने यह बात अपने और अपनी पत्नी तक सीमित रक्खी और बेटी को इस सम्बंध में कुछ नहीं बताया। उधर दुबे जी और उनकी पत्नी भी बहुत चिंतित थे –"लला ने कहा था कि मेरी शादी कहीं भी तय करने से पहले मुझे लड़की ज़रूर दिखा देना। लला तो ट्रेनिंग में मसूरी जा चुके हैं। अब हम क्या करें?"

अग्निहोत्री जी ने समझाया कि–"मसूरी  देहरादून में ही है। आप यहाँ लड़की देख लें और लला वहाँ देख लेंगे। लड़की मेरी देखी हुई है आप निराश नहीं होंगे।" दुबे जी के पारिवारिक मित्र श्री लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी एडवोकेट ने भी दुबे जी को यही राय दी। उन्होंने भी समझाया– "मैं शर्मा जी के परिवार को भली भाँति जानता हूँ। आप निःसंकोच लड़की देख आइये। शर्मा जी की बेटी और मेरी बेटी एक कॉलेज में पढ़ती हैं। सब कुछ पसंद आये तो लड़की को कुछ पहना दीजियेगा।" दुबे जी के आग्रह पर त्रिपाठी जी भी अपनी पुत्री के साथ शर्मा जी के घर पर आये। दुबे जी, उनकी पत्नी श्रीमती पानकुंवर और छोटा बेटा रमेश मन में यह सोच कर आये थे कि लड़की देखने चलते हैं, सामान कार में रक्खा रहेगा। यदि लड़की और परिवार ठीक लगा तो बाद में सोच-समझ कर फल, मिठाई और ज़ेवर आदि अंदर ले आयेंगे। ठीक नहीं लगा तो कोई ज़बरदस्ती तो है नहीं।

शर्मा जी के यहाँ नीरजा को सिवाय इस बात के कि पापा-मम्मी किसी बात से चिंतित हैं और कुछ ज्ञात नहीं था। हाँ स्वभाव से चपल सुषमा को कुछ आभास हो गया था। आवास पर केवल यह सूचना थी कि कुछ मेहमान मिलने आ रहे हैं। शर्मा जी के यहाँ अक़्सर अतिथि आते रहते थे और जब वे अंदर घर में आते थे तो आतिथ्य उनकी दोनों बेटियों पर रहता था। शाम को चार बजे दुबे जी, उनकी पत्नी, छोटा पुत्र रमेश, त्रिपाठी जी और उनकी पुत्री शर्मा जी के आवास पर आये। शर्मा जी ने अपनी बड़ी बेटी नीरजा को, जो घर में नीले प्रिंट का सफ़ेद, साधारण सा गरारा कुर्ता पहने बैठी थी, बाहर बैठक में बुलाया। चूँकि वहाँ उसकी जानी-पहचानी सहपाठिनी अर्चना बैठी थी अतः उसे किसी प्रकार का कोई संदेह नहीं हुआ। वह स्वाभाविक तरीक़े से मेहमानों का आतिथ्य करती रही और अपनी सहपाठिनी से कॉलेज के विषय में बात करती रही। कुछ देर बाद सब अतिथिगण बैठक से बाहर निकल कर चले गये। उन्होंने परस्पर विचार-विमर्श किया और फिर अंदर आकर बैठ गये। दुबे जी का पुत्र रमेश बाहर रह गया और कुछ देर बाद फल, मिठाई और कुछ सामान लेकर अंदर आया। अब श्रीमती दुबे ने एक ज़री की साड़ी निकाल कर शर्मा जी की बेटी की गोद में रख दी और एक सोने की भारी सीतारामी गले में पहना दी। शर्मा जी ने बेटी से कहा–"इनके चरण स्पर्श करो।" शर्मा जी की पुत्री अकस्मात इस घटना से घबरा कर रोती हुई अंदर भाग गई।

शर्मा जी अतिथियों को विदा करने के पश्चात सीधे अपनी बेटी के पास पहुँचे और पूछा–" क्या बात है तुम रोई क्यों? लड़का मसूरी में आई.पी.एस. की ट्रेनिंग में गया हुआ है? तीन भाइयों में बीच का है। क्या तुम इन लोगों को देहाती समझ कर रो रही थीं?" लड़की ने उत्तर दिया– "पापा! ऐसी कोई बात नहीं है। मैं पढ़ना चाहती हूँ। अभी एम.ए. की शिक्षा पूरी नहीं हुई है।" शर्मा जी ने बेटी को आश्वस्त किया कि "तुम चिंता मत करो। तुम्हारी शिक्षा पूरी होने के बाद ही मैं तुम्हारी शादी करूँगा।"

शर्मा जी और श्रीमती सुशीला शर्मा बहुत चिंतित थे कि लड़के के घर वाले गाँव में रहते हैं। न हमने लड़के का घर देखा है, न लड़के को देखा है और न लड़के के विषय में कुछ जानकारी की है और लड़की की शादी भी तय हो गई। वह शीघ्रता से देहरादून जाने की तैयारी करने लगे ताकि लड़के को देख लें और उसके बारे में पता करा लें। देहरादून पहुँचने पर सर्किट हाउस में सामान रख  कर शर्मा जी ने सपरिवार मसूरी जाने का कार्यक्रम बनाया। मसूरी में पुलिस अधीक्षक के लिये एक आवास माल रोड पर बना हुआ है। मसूरी थाने के इंचार्ज उस समय श्री बंधू थे जो जनता के बीच बहुत लोकप्रिय थे। शर्मा जी ने बंधू से कहकर आई.पी.एस कैडेट श्री द्विवेदी को शाम को मसूरी के पुलिस अधीक्षक आवास पर बुलवाया। शर्मा जी, श्रीमती शर्मा, छोटी बेटी सुषमा और सबसे छोटा पुत्र राजीव द्विवेदी जी से मिल लिये। जब शर्मा जी संतुष्ट हो गये तब उन्होंने बड़ी बेटी नीरजा को बुलाया। अब नीरजा को ज्ञात था कि किससे मिलना है तो वह लज्जा के कारण एक क्षण को बैठक में जाकर नमस्ते करके भाग कर वापस चली गई। जब तक द्विवेदी अपनी दृष्टि नीरजा की ओर डाल पाते तब तक वह हवा का झोंका बन कर जा चुकी थी। इस चक्कर में हुआ यह कि न नीरजा द्विवेदी जी को देख सकी और न ही वह नीरजा को देख सके। द्विवेदी जी के चलने के समय शर्मा जी ने कहा कि चकरौता घूमना हो तो मेरे पास छुट्टियों में आना तो हम लोग साथ-साथ चलेंगे।

अब क़िस्मत का खेल शुरू हुआ। नीरजा का एम.ए. हिस्ट्री में दाख़िला होना था। श्रीमती शर्मा नीरजा व सुषमा को साथ लेकर डी.ए.वी. कॉलेज में एडमिशन कराने गईं। हिस्ट्री के हेड थे श्री भटनागर साहब। वह श्रीमती सुशीला शर्मा को देख कर बोले– "क्या आप का एडमिशन एम.ए. में और नीरजा का बी.ए. में होना है। श्रीमती शर्मा ने बताया कि– "मेरा नहीं, बड़ी बेटी का एम.ए. हिस्ट्री में और छोटी का बी.ए. में एडमिशन होना है।" भटनागर साहब श्रीमती शर्मा को आश्वस्त करके बोले– "आपकी बेटी बड़ी सीधी है। आप बेफ़िक्र होकर जाइये। मैं नीरजा का अपनी बेटी की तरह ध्यान रक्खूँगा।" 

नीरजा का कॉलेज प्रातः 9 बजे से प्रारम्भ होता था और जब वह 11 बजे वापस जाती थी तब सुषमा का कॉलेज शुरू होता था। दोनों बहिनों के पास अपनी-अपनी साइकिलें थीं जिससे वे कॉलेज जाती थीं। एक सिपाही दोनों के साथ कॉलेज लाने-ले जाने के लिये अपनी साइकिल से उनके पीछे-पीछे जाता था। 

सब दिनचर्या व्यवस्थित चल निकली थी कि एक दिन तूफ़ान आया। हुआ यह कि द्विवेदी जी को शर्मा जी का निमंत्रण चकरौता चलने के लिये मिला। द्विवेदी जी पहले से ही बहुत बेचैन थे कि मेरी शादी तय है और मैंने लड़की ठीक से देखी भी नही है। लड़की देखने की ज़िद का एक कारण और भी था। नीरजा इटावा के डिग्री कॉलेज में पढ़ती थी। द्विवेदी जी के किसी मित्र ने किसी और अधिकारी की बेटी के धोखे में उन्हें यह बता दिया था कि लड़की के आगे की दाँतों की दो पंक्तियाँ हैं। द्विवेदी जी ने सोचा कि कॉलेज में जाकर लड़की को चुपचाप देख लूँगा। कॉलेज पहुँचकर उनको अपनी शराफ़त में यह विचार आया कि चुपचाप लड़की देखना अनुचित है, नीरजा के प्रोफ़ेसर से अनुमति ले लूँ। यहीं पर गड़बड़ हो गई। उन्हें पता नहीं था कि प्रोफ़ेसर साहब ज़बरदस्ती के लोकल गार्जियन बन गये हैं। द्विवेदी जी भटनागर साहब के पास पहुँचे और कहा– "मैं आई.पी.एस. ट्रेनी महेश द्विवेदी हूँ। मैं नीरजा से मिलने की अनुमति चाहता हूँ।" भटनागर साहब ने गम्भीर स्वर में पूछा– "क्या आपने नीरजा के पैरेंट्स से परमीशन ली है?" द्विवेदी जी के मना करने पर उन्होंने मिलने की अनुमति नहीं दी और कहा कि– "पहले आप शर्मा जी से अनुमति लेकर आयें।"। द्विवेदी जी ने कक्षा के बाहर से झाँकने का असफल प्रयास किया पर श्वेत वस्त्रों के अतिरिक्त कुछ न दिखा। वह बाहर आकर उस स्थान पर खड़े हो गये जहाँ से निकलते समय वह नीरजा को देख सकते थे। 

अब होनी ने अपना रूप दिखाया। उस समय वर्षा होने लगी अतः सुषमा को कॉलेज छोड़ने के लिये जीप आई। उस दिन राजीव की छुट्टी थी तो वह भी जीप में बैठ कर आ गया। सुषमा द्विवेदी जी को पहचानती थी अतः वह उन्हें देख कर मुस्कुरा कर निकल गई। इधर द्विवेदी जी ने भी सुषमा को देख लिया। द्विवेदी जी जीप में राजीव को बैठा देखकर चकरा गये। इसी बीच नीरजा अपनी बड़ी आयु की सहपाठिनी के पीछे-पीछे छिपती हुई आई और शीघ्रता से जीप पर बैठ कर चली गई। द्विवेदी जी खिसिया कर रह गये।

अब महेश चंद्र द्विवेदी की मानसिक स्थिति देखिये– उन्हें लगता था कि– मेरे पिताजी सेवानिवृत्त दरोगा थे और शर्मा जी पुलिस अधीक्षक थे, अतः मेरे माता-पिता शर्मा जी के रौब-दाब के कारण शादी न करने की बात नहीं कह सके और लड़की की रोक कर आये हैं। नीरजा को छोड़कर शर्मा जी के पूरे परिवार से मेरी मुलाक़ात हुई। कॉलेज में आया तो नीरजा से मिलने की अनुमति नहीं मिली। उन्हें लगा कि प्रोफ़ेसर साहब ने शर्मा जी को ख़बर कर दी है इसलिये उन्होंने राजीव को जीप से नीरजा को घर बुलाने के लिये भेजा है। उन्हें दृढ़ विश्वास हो गया कि लड़की में कोई न कोई कमी ज़रूर है जिसकी वज़ह से शर्मा जी लड़की से मिलने नहीं देना चाहते। उन्होंने मन में विचार किया कि बात आगे बढ़े इसके पहले ही मना कर देना उचित है। उनके बड़े भाई श्री रामचंद्र दुबे ने भी उन्हें समझाने का प्रयत्न किया पर महेश चंद्र द्विवेदी ने अपना मन बना लिया था और पत्र लिख कर शर्मा जी के पास भेज दिया जिसकी अंतिम पंक्तियाँ थीं– "विद आल माय गुड इंटेन्शंस एंड विल पौवर आय एम डिफीटेड एंड इट इज़ नौट पौसिबिल फौर मी टु मैटीरिअलाइज़ दिस रिलेशनशिप।"

अब नीरजा की मनोस्थिति देखिये। नीरजा स्वभाव से गम्भीर, शांत, लजीली और अपने काम से काम रखने वाली लड़की थी। जब भटनागर साहब कक्षा में आये तो उन्होंने उसे अपने समीप बुलाकर पूछा– "नीरजा! क्या तुम महेश द्विवेदी को जानती हो?"

"जी पापा-मम्मी जानते हैं"–नीरजा के उत्तर देने पर उन्होंने बताया कि–"वह तुमसे मिलने की अनुमति चाहते थे तो मैंने कह दिया है कि पहले पैरेंट्स की अनुमति लेकर आयें तब मिल सकते हैं।" "जी सर,"  कह कर नीरजा अपनी कुर्सी पर चुपचाप जाकर बैठ गई। लज्जा और घबराहट के कारण उसका बुरा हाल था। हिस्ट्री की कक्षा में अधिकांश लड़के थे और लड़कियों के नाम पर नीरजा के अतिरिक्त केवल उसकी मम्मी की नामाराशी एक लड़की सुशीला ओबेरौय और थी। वह अविवाहित थी परंतु उसकी आयु उस समय केवल उन्तालिस वर्ष थी। दैवयोग से वह भी सफ़ेद वस्त्र पहनती थी और नीरजा भी अधिकांशतः सफ़ेद वस्त्र ही पहनती थी। द्विवेदी जी के आने की सूचना पाकर नीरजा उस लड़की के पीछे सिकुड़ कर छिप कर बैठ गई। जब कक्षा समाप्त हुई तो नीरजा अपनी सहपाठिनी की आड़ में छिपती हुई बाहर निकली। बाहर गैलरी में भीड़ बहुत थी। नीरजा की आदत सदा निगाह नीचे कर चलने की थी। वह जैसे ही गैलरी पार कर रही थी कि अचानक उसकी दृष्टि ऊपर उठी तो एक गोरे से लड़के पर पड़ी जो नीरजा की ओर ही देख रहा था। क़िस्मत का खेल देखिये कि नीरजा भी द्विवेदी जी को पहचानती नहीं थी। वह लड़का सिगरेट के छल्ले उड़ा रहा था और उसकी ओर ही देख रहा था अतः द्विवेदी के भ्रमवश नीरजा ने घृणा से एक नज़र और उस युवक की ओर देखा– वह उस समय के लोफ़र लड़कों की तरह सारसनुमा टाँगों वाली पैंट पहने था। (उन दिनों शैतान और लड़कियों को छेड़ने वाले लड़के टाइट पैंट पहने, सिगरेट के धुएँ के छल्ले उड़ाते देखे जाते थे। नीरजा को इस तरह के लड़कों से बेहद चिढ़ थी। उस लड़के को अपनी ओर देखते देख कर नीरजा समझी कि यही महेश द्विवेदी हैं।) अब क्या था मन में सुलगते हुए नीरजा तेज़ी से जाकर जीप में बैठ गई। मन में विचारों का गुबार भर गया। इन्होंने मुझे क्या ऐसी-वैसी लड़की समझा है जो कॉलेज में मिलने आ गये। ऐसे लोफ़र लड़के के साथ तो मैं ज़िंदगी नहीं निभा सकती। मसूरी में माल रोड पर नेशनल एकेडमी के लड़के स्थानीय लड़कियों को घुमाते दिखते हैं। यह साहब भी लगता है ऐसे ही हैं।. . .आदि आदि। घर पहुँचने तक किसी तरह नीरजा अपने आँसुओं और क्रोध को रोके रही पर घर के अंदर घुसते ही विस्फोट हुआ। सदा शांत रहने वाली नीरजा चिल्ला कर बोली– "मम्मी! मुझे ऐसे लोफ़र लड़के से शादी नहीं करना है। कॉलेज में मिलने पहुँच गये . . ." और ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। दैवयोग से शर्मा जी जो घर के दफ़्तर में काम कर रहे थे, शोर सुनकर अंदर आ गये। नीरजा क्रोध के भावावेश में पापा के सामने अपने मन का गुबार निकाल कर सिसकने लगी। "पापा! मैं ऐसे लोफ़र से शादी नहीं करूँगी।" शर्मा जी अपने बच्चों को बहुत प्यार करते थे और उनके आँसू तो देख ही नहीं सकते थे। क्रोध में भर कर बोले– "उसकी इतनी हिम्मत कि कॉलेज पहुँच गया। घर पर आ सकता था। मैं उसको बेंत से इतना पिटवाऊँगा कि अक़ल ठिकाने आ जायेगी।"

होना क्या था इधर नीरजा की ज़िद और उधर महेश द्विवेदी के पत्र ने आग में घी का काम किया। दोनों परिवारों में किसी ने एक–दूसरे से कोई पूछताछ नहीं की और एक-दूसरे का सामान वापस कर दिया गया। फ़िलहाल मामला ठंडे बस्ते में पड़ गया।

क़िस्मत को अभी नये रंग दिखाने थे। नेशनल एकेडमी मसूरी की ट्रेनिंग ख़त्म करके महेश द्विवेदी बस से मसूरी से देहरादून होकर इटावा अपने घर जा रहे थे। देहरादून का पुलिस अधीक्षक आवास मसूरी से देहरादून आने वाली राजपुर रोड पर ही स्थित है। सड़क के किनारे बने लॉन में माली ने बहुत सुंदर स्वीटपी, डेहलिया और गुलाब के फूल लगाये थे। नीरजा को शौक़ था कि वह बैठक के गुलदस्तों को फूलों से स्वयं सजाती थी। अब भाग्य का नाटकीय खेल देखिये कि द्विवेदी जी की सीट बस में उस तरफ़ थी जिधर से पुलिस अधीक्षक के निवास का लॉन सामने पड़ता था। द्विवेदी जी की बस उसी समय राजपुर रोड से आवास के सामने से गुज़री जिस समय नीरजा बेफ़िक्र होकर सड़क के किनारे के लॉन के फूल गुलदस्ते बनाने के लिये तोड़ रही थी। द्विवेदी जी सुषमा से तो परिचित थे, नीरजा को नहीं देखा था। इस समय उन्होंने बहुत अच्छी तरह से नीरजा को देख लिया। 
 
द्विवेदी जी घर पहुँचे। रात को भोजन के पश्चात माँ ने कहा– "लला! तुम्हारे पिताजी बहुत ग़ुस्सा हो रहे थे। कह रहे थे कि अब हम लला के ब्याह के लिये लड़की नहीं देखेंगे। वह अपने आप ब्याह तय कर लें। हम पैसा दे देंगे। अगर कहेंगे तो शादी में चले चलेंगे। हमें तो वह लड़की पसंद थी, तुमने हमारे कहे पर मना कर दिया।" 

द्विवेदी झट से बोल पड़े– "मैंने कब मना किया है?" 

अब चौंकने की बारी महेश की माता जी की थी– "क्या कह रहे हो तुम? क्या सच में तुम तैयार हो?" 

"रहने दो माँ क्या पता उसकी कहीं और शादी तय हो गई हो?"–महेश ने सोचते हुए कहा। 

माँ बोलीं– "यदि तुम तैयार हो तो पता लगाने में कोई हर्ज़ नहीं है।"

माँ प्रसन्न होकर उतावली से अपने पति के पास पहुँची और सब बात बताई। दुबे जी को भी यह रिश्ता इतना पसंद था कि उन्हें इसके टूटने पर अफ़सोस था और बेटे पर क्रोध भी था। वह भी उत्साहित होकर अपने मित्र एडवोकेट लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी के पास पहुँचे। त्रिपाठी जी दोनों परिवारों से भली भाँति परिचित थे और दिल से चाहते थे कि यह रिश्ता हो जाये। उन्होंने एक भावपूर्ण पत्र शर्मा जी को लिखा। जब वह पत्र शर्मा जी को मिला तो वह अपनी बेटी नीरजा के गाल पर प्यार से चपत लगाकर बोल पड़े– "हमारे साहबू बड़े वाहबू हैं।"

अब नीरजा के यहाँ का हाल सुनिये। क्रोध में आकर नीरजा ने रिश्ता तो ख़त्म करा दिया पर वह एक मानसिक उलझन में फँस गई। बचपन में सती स्त्रियों की कहानियाँ पढ़ कर उसके मन में यह संस्कार उत्पन्न हो गये थे कि एक के साथ नाम जुड़ गया तो अब दूसरे से शादी नहीं करना है। यानि किसी से शादी नहीं करना है। इधर रिश्ता टूटने के बाद से अजब तमाशा शुरू हो गया था। जो लोग शर्मा जी के परिवार को जानते थे वह यह मानने को तैयार नहीं थे कि रिश्ता लड़के वालों की ओर से भी टूट सकता है। वे उनके पास आकर यह पूछते थे कि आपने यह रिश्ता क्यों तोड़ दिया है? शर्मा जी उन्हें कुछ न कुछ कह कर टाल देते थे। नीरजा इस परिस्थिति से परेशान हो उठती थी कि अनजाने ही उसका नाम किसी के साथ जुड़ गया है। उसने देहरादून के टपकेश्वर महादेव की बहुत मान्यता सुनी थी। वह वैसे भी सोमवार का व्रत रखती थी और शिव भक्त थी। एक दिन जब शर्मा जी सपरिवार टपकेश्वर महादेव के मंदिर में दर्शन करने गये तो उसने ईश्वर से प्रार्थना की – "हे ईश्वर मेरा नाम किसी के साथ क्यों जोड़ दिया है? इस स्थिति से मुझे मुक्ति दिलाओ।"

नीरजा नहीं जानती कि यह ईश्वर का चमत्कार है या कि विधि का विधान है कि इस रिश्ते का पुनर्सूत्रपात नाटकीय रूप से हुआ। महेश द्विवेदी के चरित्र के बारे में त्रिपाठी जी के पत्र एवं पुलिस ट्रेनिंग कॉलेज के तत्कालीन प्रिंसिपल श्री एस.एस.मिश्रा के सत्यापित करने के बाद नीरजा ने भी हाँ कर दी। उधर महेश द्विवेदी भी हाँ कर चुके थे। दोनों का तिलक समारोह 10 मई सन्‌ 1964 को और पाणिग्रहण संस्कार 14 जून 1965 को सम्पन्न हुआ।

 इस प्रकार यह अनोखी हेट मैरिज लव मैरिज में परिवर्तित हो गई।

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