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हे धर्मराज, मेरी गुहार सुनो

जीवन की गोधूलि बेला में,
अब जीने को चंद साँसे हैं,
बंद होते असहज पलकों पर,
सजीव आँसुओं के चंद बूँदें हैं।

 

बचपन सुहाना, पथरीली जवानी,
वो बीते लम्हें याद आते हैं।
मजबूत हाथों की वो मजबूरियाँ,
अंतर्मन में आग लगाते हैं।

 

गाँव की हरी-भरी वादियों में,
फिर से चिल्लाने को जी करता है।
बूढ़े बरगद के छाँव तले,
पल भर सोने को जी करता है।

 

पत्थरों के रोशन इस मरूस्थल में,
जहाँ एक बूँद जीवन भी नसीब नहीं।
हर तरफ मची है रेलम-पेल,
सुकून का एक क्षण भी नसीब नहीं।

 

मुक्त करो इस कृत्रिमता से
हे यमराज, मेरी गुहार सुनो।
नहीं जीना है अब और शेष यहाँ,
हे धर्मराज, अब तो मेरी पुकार सुनो।

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