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होनहार बिरवान के होत चीकने पात

 प्राथमिक शाला की उस कक्षा में साठ बालक थे जिनमें से तीन अपने-अपने क्षेत्रों में अग्रणी थे। पहले छात्र का लिखने-पढ़ने से कोई वास्ता नहीं था, कक्षा में न बैठकर अन्य छात्रों से चंदा वसूलना, हड़तालें आयोजित करना, प्रदर्शनों जुलूसों में अगुआ रहना उसके मुख्य कार्य कलाप थे। पारिवारिक पृष्ठभूमि का अच्छा प्रभाव था।

दूसरा छात्र चालाक था। मेधावी विद्यार्थियों की कॉपियों से नक़ल कर सबसे पहले अध्यापकों को दिखाना अच्छे अंक पाना उसका नियमित कार्यक्रम था। मध्यम वर्गीय छात्रों के प्रति नाक-भौंह सिकोड़ता था।

एक तीसरा बालक भी था। कुशाग्र बुद्धि वाला। लट्ठे का कुरता पायजामा पहिनकर आता, कक्षा में कोने में चुपचाप बैठकर अध्ययन करता था। एकाग्र रहकर पढ़ना, गुरुजनों का आदर करना उसके दैनंदिन कार्यकलाप थे। कक्षा में प्रतिवर्ष सर्वप्रथम आता था।

स्वाधीनता प्राप्ति के पचास वर्ष बाद नैतिकता का ऐसा उत्कर्ष हुआ कि पहला लड़का उस प्रदेश का शिक्षा मंत्री है, दूसरा छात्र आइ.ए.एस. होकर उस प्रदेश का शिक्षा सचिव हो गया है। और तीसरा विद्यार्थी बड़े संघर्ष के बाद दूर-दराज़ के एक गाँव में प्राथमिक शाला का अध्यापक हो सका है।

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