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इक बेटी की भाव भीनी श्रद्धांजलि

अपने पिता श्री राम मेहर सिंह 
( 30 अक्टूबर 1945 – 07 जुलाई 2020)
को इक बेटी की भाव भीनी श्रद्धांजलि

 

पापा मिरे इस ज़िंदगी में हौसला था आपसे
मेरे सफ़र में बरक़तों का मोजिज़ा था आपसे


दुनियाँ मिरी जादू भरी थी मैं परी थी आपकी
किस्से कहानी और ग़ालिब को सुना था आपसे


माना कि दुनियाँ इल्म की ऊँचाइयों पे आज है
कोई पढ़ा सकता नहीं वो जो पढ़ा था आपसे


सुनते थे कितने प्यार से बातें मिरी बेकार सी
हर मसअले का दिल मिरा हल पूछता था आपसे


दुनियाँ मिरी ख़ाली शहर ये कितना सूना हो गया
जो कुछ भी था थोड़ा बहुत वो सौ गुना था आपसे


गहराइयाँ थी बात में ऊँचाइयाँ थी ज़ात में
पढ़ना पढ़ाना इल्म का चस्का लगा था आपसे


इक रहनुमाई आपकी राहें दिखाती थी मुझे
कितना बड़ा हो मसअला बस चुटकुला था आपसे


इतने भले ऐसे खरे जन आज भी मौज़ूद हैं
भगवान क्या हर आदमी हैरतज़दा था आपसे


पैसा ज़ियादा ज़ेब में या पानी ज़ियादा नाव में
लाज़िम है उसका डूबना मैंने सुना था आपसे


इक जोश था जज़्बात थे कुछ शौक़ था अंदाज़ थे
मेरी ज़मीं है माँ मिरी और आसमाँ था आपसे


क्या मंज़िलें क्या रास्ता क्या सूरतें क्या सीरतें
ज़द ओ ज़हद की ज़िंदगी में फ़लसफ़ा था आपसे


सारे ज़माने की शराफ़त मिल के भी इतनी न थी
इंसानियत पे नाज़ का इक सिलसिला था आपसे


दिल खोल के तारीफ़ करना आपकी आदत रही
बारीकियों को जानना मुझको अता था आपसे


ख़ुददार इतने आप थे चाहा किसी से कुछ नहीं 
हाँ और भी मुझको बहुत कुछ बोलना था आपसे

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