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ईमानदार राजनीति पर भारी बेईमान मौसम

आजकल गर्मी और आईपीएल के साथ साथ "सम-विषम" (ऑड-इवन) और पुतले लगाए जाने का भी मौसम है ताकि कलेजे से बीड़ी जला सकने वाले इस मौसम में चौके-छक्के, सुनी सड़कें और अपने पंसदीदा पुतले देखकर आपकी रूह को बिना "रूह-अफ़जा" पिए ही ठंडक पहुँचे। इसी मौसम में "गतिमान एक्सप्रेस" भी लाँच हो चुकी है लेकिन फिर भी सूखाग्रस्त इलाक़ों में ट्रेन से पानी अपनी गति से ही पहुँच रहा है। सूखाग्रस्त इलाक़ों में पानी पहुँचाने के चक्कर में सरकार इतनी ज़्यादा व्यस्त हो गयी कि सूखाग्रस्त इलाक़े में सेल्फ़ी लेती अपनी मंत्री की आँखों में ही पानी की सप्लाई करना भूल गई। अगर पानी ना पहुँचा पाई तो कम से कम एक "सेल्फ़ी स्टिक" तो ज़रूर पहुँचानी चाहिए थी क्योंकि हर कोई तो प्रधानसेवक जी जितना सेल्फ़ी लेने में कुशल नहीं हो सकता है। इतनी पहुँची हुई मंत्री तक कुछ ना पहुँच पाना इस (मन की ) बात का द्योतक है कि आजकल की सरकारें महिलाओं और उनके अधिकारों के प्रति कितनी असवेंदनशील हो चुकी हैं।

इधर अतिसंवेदशील सम-विषम वाले "फ़िल्म समीक्षक जी" सीधे ट्विटर से सूखाग्रस्त इलाक़ों में पानी पहुँचाकर "इलाक़ा तेरा-धमाका मेरा" करना चाहते थे लेकिन उनकी इस ईमानदार और अलग तरह की राजनीति में हमेशा की तरह "4 -G" या "एल. जी." किसी ने उनका साथ नहीं दिया। इसलिए अब "ईमानदारी", "हम साथ-साथ हैं" कहने के बजाये "एकला चालो रे" गाते हुए "दिल वालों की" दिल्ली से "जॉब रहित" पंजाब की तरफ़ कूच कर चुकी है। जहाँ उसको सूखे की चिंता करने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि वहाँ "बादल" पहले से ही उसका इंतज़ार कर रहे हैं। देश में चाहे कितना भी सूखा हो, ग़रीब कितना भी भूखा हो लेकिन देश की राजधानी में सम-विषम की सफलता की हरियाली से देश के सारे अख़बार और न्यूज़ चैनल्स विज्ञापन की चाँदी काट रहे हैं क्योंकि सोना तो अभी-अभी एक्साइज़ ड्यूटी कटवा कर आराम कर रहा है।

सम -विषम स्कीम इतनी सफल हो चुकी है की बस अब तो आसमान से देवताओं का इसका स्तुतिगान करके दिल्ली की सड़कों पर पुष्पवर्षा करना बाक़ी है। कई देवता तो सम-विषम स्कीम की सफलता और "एयर ट्रैफ़िक" को देखते हुए अपना विमान भी दिल्ली की सड़कों पर चलाने का मन बना चुके हैं। दिल्ली की सड़कें अब इतनी खाली होती हैं कि सरकार चाहे वो "पुस्तक मेला" और "ऑटो एक्सपो" भी अब प्रगति मैदान में करवाने की बजाय सड़कों पर ही करवा सकती हैं। दिल्ली सरकार की मानें तो सम-विषम स्कीम से दिल्ली में प्रदूषण इतना कम हो गया है कि दिल्ली का हर वाशिंदा ऑक्सीजन लेने और कार्बन-डाई-ऑक्साइड छोड़ने के बजाय ऑक्सीजन ले रहा है और ऑक्सीजन ही छोड़ रहा है। हालाँकि दिल्ली सरकार चाहे तो सम-विषम स्कीम से वायु प्रदूषण कम करने के बाद अब थोड़ा चुप रहकर ध्वनि प्रदूषण कम करने में भी अपना योगदान दे सकती है।

सम-विषम के नियम से प्रधानसेवक जी को छूट दी गयी है ताकि वो अपनी सेवा को प्रधानता देते हुए हर दिन, हर जगह अपनी "BMW" कार में पहुँच कर "मेक इन इंडिया" कैंपेन लाँच कर सकें और साथ-साथ ही उनका पुतला भी बिना किसी "विषाद" के "तुषाद" म्यूज़ियम तक पहुँच जाए। पुतले पहले देश चलाते थे और उनकी प्रोग्रामिंग इस तरह की थी कि आपत्तकालीन परिस्थितियों में भी केवल "ठीक है" बोलकर काम और सरकार दोनों चला लेते थे। उन पुतलों ने देश को कठपुतली बनाया और फिर पतली गली से निकल लिए। अब रोबोट की तरह काम करने वाले प्रधानसेवक देश को मिले हैं। उनका पुतला अब म्यूज़ियम की शोभा बढ़ाएगा और राहत की बात ये होगी कि ये मित्रो-मित्रो का जाप करते हुए मन की बात केवल अपने मन में ही रख पाएगा।

व्यक्तित्व की बलिहारी है , अभी वाले खुलकर अपने को प्रधानसेवक कहकर गुमान करते हैं लेकिन पहले वाले ने कभी अपने आप को प्रधानसेवक कहकर अपनी पीठ नहीं थपथपाई। तो क्या हुआ अगर वो केवल एक परिवार के प्रधानसेवक थे? थे तो प्रधानसेवक ही ना।

पुतलों से हमारा नाता क़ायम चूर्ण और मार्गदर्शक मंडल के नेताओं से भी पुराना है। राज्यसभा से लेकर राज्यपाल भवन और राष्ट्रपति भवन तक अपने-अपने पुतले फ़िट करने की परंपरा पुरानी और "टाइम टेस्टेड" है। पुतले शांति और सहिष्णुता का सन्देश देने के लिए लगाए जाते हैं लेकिन जब पुतले वाचाल हो जायें तो हम सड़क-चौराहे पर पुतले जलाकर अपनी असहिष्णुता का प्रदर्शन करने से भी नहीं चूकते हैं। पुतले पहले अपने मालिकों के चीयर लीडर्स होते हैं जिन्हें मालिक, पुतले बनाकर मोक्ष प्रदान करते हैं और मोक्ष मिलते ही, बिना रिवाइटल लिए ही, इनके हाथ में इतनी शक्ति आ जाती है कि रिमोट चलाकर किसी भी "रिमोट इलाक़े" में अपना शासन स्थापित कर सकते हैं।

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