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इन्दु जैन ... मेधा और सृजन का योग...

२७ अप्रैल, सुबह ६.०० बजे शुका का फोन आया है। काँपती आवाज़ में कहती है ‘रेखा, ममी चली गईं’ भीतर कहीं हम सब जानते थे कि अब उन्हें जाना ही है और जितना जल्दी होगा उतना ही कम सहना पड़ेगा। दस महीने की असहनीय पीड़ा से मुक्ति मिलेगी। फिर भी, हम तैयार न थे ... क्यों न थे, नहीं कह सकती। शायद वे हमारे वजूद का एक हिस्सा बन गईं थीं। मृत्यु से यह बोध जगा कि अपने ही अंश को अपने से बाहर तटस्थ भाव से खत्म होते देखना संभव नहीं। आँखें भीगती रहीं, मन बँधता रहा पर बार-बार कबीर की पंक्तियाँ मन के छिपे कोने से गूँजने लगीं-

जा मरने से जग डरे, मेरे मन आनंद। / कब मरहूँ कब पावहूँ, पूरन परमानंद।।

इन्दु जी ने भी बाद के दिनों में अपनी एक मित्र से कहा था “मैं मरने से नहीं डरती” बस मन में एक ही इच्छा थी कि ईश्वर ने जिस तरह भरा-पूरा जीवन दिया वैसा ही शांतिपूर्ण अंत दे! ईश्वर ने उनकी प्रार्थना सुनी। पीड़ा दी, तो पीड़ा को सहने की शक्ति भी दी। पीड़ा उनकी जीजिविषा को तोड़ नहीं पाई। उनके यहाँ व्यथा नहीं थी। बीमारी के दौरन जब-जब उनसे मिलने जाते, डॉक्टरों की राय से लगता न जाने किस हाल में मिलेंगी पर जब पहुँचते तो उसी दमकते चेहरे से ममत्व भरा स्वागत मिलता। इधर-उधर की गप्प, बीच-बीच में हँसी के हिलोर... सचेत होकर पूछते, ‘आपको दर्द तो नहीं हो रहा’ उन उमंग भरी आँखों में दर्द की छाया हमेशा निस्तेज हो जाती। जब अंत की आहट साफ सुनाई पडने लगी तब एक दिन फोन किया ‘जीवन के बचे-खुचे दिनों में अपने सब काम पूरे कर लेना चाहती हूँ।’ सिर्फ इच्छा ही नहीं की पूरे साहस के साथ अंतिम क्षण तक वे काम पूरे किए। एक नाटक लिखा था उसे पूरा किया और उसका प्रूफ़ देखा, कुछ अनुवाद किए, बीच-बीच में कविताएँ भी लिखीं। अपने जीने के साथ-साथ मरने को भी सार्थक किया। ऐसे जीवन पर नज़र डालती हूँ तो लगता है कहाँ गई हैं यहीं तो हैं मेरे आस-पास...आज मैं जिस घर में रहती हूँ इन्दु जी उसके सामने वाले घर में रहती थीं। उस बगीचे में मैंने उन्हें हर सर्दी की दोपहर अँग्रेज़ी का क्रासवर्ड करते, पढ़ते, कॉपियाँ जाँचते और कविताएँ लिखते देखा है... जब-जब गिलहरी पेड़ पर चढ़ेगी अनार कुतरने तब-तब इन्दु जी याद आएँगी...जब-जब पत्तों के झुरमुट के बीच आँख से भी छोटी चिड़िया दिखेगी उनकी आँखें मन में कौंध जाएँगी। 

उन पर लिखे पहले एक संस्मरण में मैंने लिखा था “इन्दु जी का अहसास उनके अस्तित्व से भी बड़ा है।” आज इस पंक्ति की सार्थकता नई तहें खोल रही है। उनकी वह महक, खुले बाल और बड़ी-बड़ी गहरी आँखें ऐसे सम्मोहित करती हैं कि आज भी उस कशिश को भूल पाना असंभव है लेकिन उनकी असली खूबसूरती उन काजल भरी आँखों से कहीं गहरी है। उनका असली सौन्दर्य स्वतंत्र चेता मानस में बसा है। वे कवि की संवेदनशीलता और चिंतक की प्रखर बौद्धिकता के ताप से निखरा कुंदन हैं। मेधा और सृजन का योग... 

इन्दु जैन के व्यक्तित्व की एक और बड़ी पहचान है वैयक्तिकता। उनका कवि-कर्म प्रयोगशील कविता एवं नई कविता के दौर में परवान चढ़ा। व्यक्ति की वैयक्तिकता और उसके सामाजिक दायित्व को लेकर लगातार बहस होती रही। इन्दु जी ने इन दोनों के बीच सामाजिक उत्तरदायित्व को वहन करते हुए व्यक्ति की वैयक्तिकता को बहुत महत्व दिया। व्यक्ति का अपना ‘स्पेस’, अपनी स्वतंत्रता - अपने लिए चुनने का अधिकार- ‘मैं ऐसा चाहती हूँ या करती हूँ’ यह कह पाने की आकांक्षा उनके जीवन और कर्मक्षेत्र में सबसे प्राथमिक रही। अपनी छात्राओं से कितनी ही बार उन्होंने कहा होगा कि सबसे पहले अपना मन टटोलो कि तुम क्या चाहती हो। बस, फिर वही करो। अपने ‘स्वत्व’ में अटूट आस्था ही उनकी असली शक्ति है उनका यह वैयक्तिक स्वर किन्हीं मायनों में औरों से अलग भी है क्योंकि यह आत्मलिप्तता का पर्याय नहीं, आत्मविस्तार का पर्याय है। इसीलिए यह वैयक्तिकता आगे बढ़कर बाँहें फैलाकर संबंध बनाना जानती है। वे एक ही पल में सबको अपना बना लेती हैं। मुझ जैसी छात्राएँ तो सदा उनकी ऋणी रहेंगी ही जिन्हें उन्होंने पूरा स्नेह और विश्वास दिया। हमारी ज़िन्दगियों में उनकी जगह वही है जो पौधे के लिए खाद की होती है। उन्होंने हमारी जड़ों को ताकत दी है। उन्होंने कभी हरे पेड़ का ऐसा घना साया बनने की कोशिश नहीं की जो सुरक्षा और आश्रय तो देता है लेकिन संघर्ष करने की ऊर्जा नहीं। वे अक्सर हमारे मन में अनचीन्हे सवालों की सुगबुगाहट जगा देतीं। उनके संसर्ग में स्वतंत्र चिंतन की प्रेरणा है। 

इन्दु जी का अपनी छात्राओं से अलग-अलग संबंध रहा है। कोई उन्हें रोशनी कहता है, कोई हवा। उनके व्यक्तित्व में ये दोनों ही तत्व है। हवा जैसा खुलापन-उन्होंने अपने लिए जो क्रिएटिव स्पेस चुना, वैसा ही स्पेस वे सामने वाले को भी हमेशा देती हैं। वे रोशनी भी हैं। नए विचारों की रोशनी। समय की तेज रफ्तार के साथ कदम मिलाए चलना बड़े-बड़ों के लिए कठिन है लेकिन इन्दुजी ने इस साधना को साध लिया है। अगली-पिछली पीढ़ियों से उनकी समान मित्रता है। वे छोटे-छोटे बच्चों को भी अपने मोह-पाश में बाँध सकती हैं। अपनी नातिनों की वे सबसे अच्छी दोस्त हैं क्योंकि वे सहज ही उनके खेल में शामिल हो जाती हैं और उनको भी अपने किस्से-कहानियों के संसार में दाखिल कर लेती हैं। उन्होंने बच्चों को कभी बच्चा नहीं समझा- बच्चा यानी अबोध उनके लिए बच्चे बोध का एक अलग क्षेत्र हैं। शायद इसीलिए वे उन्हें उतना ही सम्मान देती हैं जितना बड़ों को। यह आपसी समझदारी, दूसरों में विश्वास और व्यक्ति का सम्मान आज के इस उपभोक्तावादी बाजार में बहुत संभालकर रखने की चीज है। इन्दु जी तमाम आकर्षणों और दबावों के बीच उसे बचा पाईं यह बड़ी बात है।

संबंधों की बात हो रही हो और इन्दु जी के परिवार की बात न हो यह संभव नहीं। बहुत बरस पहले संबंधों की रिक्तता पर बनी एक फिल्म को अस्वीकार करते हुए उन्होंने कहा था कि आपसी संबंध इतने खोखले और सतही नहीं होते। ‘पति क्या होता है यह तुम्हें कुछ बरस बाद समझ आएगा...’ बीते वर्षों के परिप्रेक्ष्य में देखती हूँ तो उनकी ज़िन्दगी और अपनी ज़िन्दगी दोनों में संबंधों की गरमाहट और प्रेम भरे विश्वास को जीना बहुत सार्थक लगता है। स्त्री-विमर्श के तमाम अध्ययनों के बीच मानवीय अनुभव की सार्थकता का यह विचार संपूर्णता का विचार है। इस अर्थ में इन्दु जी का अस्तित्व संपूर्ण स्त्री का अस्तित्व है जिसने अपने आत्म सम्मान या स्वतंत्र अस्मिता से कभी समझौता नहीं किया। उनके आत्म-विश्वास के दर्प से जगमगाता उनका स्त्रीत्व उन्हें साधारण के बीच असाधारण बनाता। उनका कद कहीं ऊँचा उठ जाता लेकिन उन्होंने कभी दूसरों को अपने समक्ष बौना नहीं होने दिया। सदा सबको साथ लेकर चल सकीं। यह अकारण नहीं है कि उनके जीवन और साहित्य दोनों की प्रेरणा विविधधर्मी मानवीय अनुभव रहा। उनका कवि-मन और व्यक्ति-मन समान प्रतिबद्धताओं से बंधे हैं। इसलिए उनमें पारदर्शी खरापन है। 

साहित्य के उद्देश्य को लेकर हमने सदा ही रचना और रचनाकारों को जनवादी और कलावादी खेमों में बाँटकर देखा है। ऐसे समय में इन्दु जी के व्यक्त्वि और लेखन की सार्थकता इस बात में है कि वे इन सीमांतों के बीच फल बनती हैं। उनकी बानगी अभिजातवादी है और सरोकार जनवादी। उनकी कविता में भी विविध स्वर हैं- भाव, भाषा और बिम्बों की ऐसी छटा जो कहीं रूढ़ नहीं होती। लीक की तरह चली आती परंपराओं पर चलने का आसान रास्ता उन्होंने कभी नहीं चुना। उनकी कविता सही मायनों में प्रयोगधर्मी है। समय के लंबे अंतराल में उन्होंने अपने लिए साहित्य के मानदंड स्थिर किए और निरंतर आगे बढ़ते हुए उनमें परिवर्तन करते हुए उन्हें गतिशील बनाए रखा। उनकी कविता अरूप से रूप की ओर बढ़ी है। उनकी कविताएँ  ठोस संदर्भों से जुड़ते हुए अपने समय का खुरदरा चेहरा पूरे खरेपन के साथ अभिव्यक्त करती हैं। संघर्ष का तेवर उनके यहाँ केवल मुद्रा के स्तर पर नही है बल्कि व्यक्ति की जुझारू संकल्पशक्ति में अटल विश्वास के रूप में है। 

इस गुरू-गंभीर रूप के साथ-साथ उनके व्यक्तित्व का एक हिस्सा मौज-मस्ती भरा और काफी रंगीन भी है। जिसने उनका गद्य ‘झुरमुट’ पढ़ा है वह कुछ-कुछ उनके इस पक्ष से परिचित होगा। कोई भी खूबसूरत चीज उन्हें ‘बावला’ कर सकती है। इस शब्द का चुनाव बहुत सोचकर कर रही हूँ। मैंने देखा है- देश-विदेश में पर्यटन के सुंदर स्थल हों, पर्वतों की चोटियाँ, टेढ़े-मेढ़े रास्ते, इठलाती नदियाँ, गहरे समुद्र, चहकती चिड़ियाँ या अनार कुतरने पेड़ पर चढ़ती गिलहरी- ये सब देखते ही उनकी आँखों में अजब चमक आ जाती है और प्रकृति के रंगों के साथ जैसे उनका मन झूम उठता है। ये क्षण उनकी मुक्ति के क्षण होते हैं जब रोम-रोम से दीवानगी-भरा उन्माद फूट पड़ता है। यही हालत तब होती है जब वे कोई अच्छा नाटक देखें या संगीत के जादू में सराबोर हो जाएँ। ऐसे क्षणों में उनके संभ्रांत व्यक्तित्व में एक देसी ठसक जाग उठती है। वैसे मस्ती के क्षणों में वे खुद भी बहुत अच्छा गाती हैं और कभी देखा तो नहीं लेकिन लगता है कभी नाच उठें तो पैर ही नहीं थमेंगे और कभी मंच पर आ जाएँ तो नाटक और अभिनय के प्रतिमान स्वयं उनके कदमों में पड़े मिलेंगे।

इन्दु जी का घर हमारे लिए बिल्कुल अलग दुनिया की तरह था। वहाँ की एक-एक चीज हमें विस्मित करती। घर के बाहर अर्ध-चन्द्र के आकार का शीशा... जैसे चाँद उनके घर में उतर आया हो। कुछ पत्थर के टुकड़े लकड़ी के छोटे-छोटे खाँचों में रोशनी के खास एंगल पर रखे हुए ऐसे लगते थे कि अभी बोल उठेंगे। घर के अलग-अलग कोने उन निर्जीव पत्थरों से जीवंत हो उठे थे।

वे कलाप्रेमी ही नही, स्वयं कलाकार भी हैं। उनकी कलात्मक बिंदियों के बारे में तो बहुत-से लोग जानते होंगे क्योंकि इन पर अक्सर उनसे सवाल पूछे जाते थे लेकिन यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि वे बाँधनी की साड़ियाँ रँग सकती हैं, सिलाई मशीन चलाकर अपनी तरह के डिजाइनर कपड़े तैयार कर सकती हैं, बगीचे में डंडी गाड़कर उस पर हुक्के की चिलम टिका उसमें फूल खिला सकती हैं... सच, यह सब भी उनके लिए कविता करने जैसा ही है।

आज वे हमारे बीच नहीं हैं लेकिन मन ने यही सोचकर संतोष कर लिया है कि हमसें अभिन्न हैं। एक अहसास की ही तरह वे हमारे प्राणों का स्पंदन हैं। रूप, रस, गंध बनकर पूरी प्रकृति में खिल गईं है... मुक्त हो गई हैं...।
 

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