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इंतज़ार (राजेन्द्र कुमार शास्त्री)

"माँ हमें भूख लगी है," गौरेया के दोनों छोटे चूजे गौरेया से मासूमियत से बोले।

"अरे! बस अभी लेकर आई। तुम दोनों आपस में मत झगड़ना। मैं दाना लेकर अभी आती हूँ।"

गौरेया इतना कहकर अपने घोंसले से दाना चुगने की तलाश में उड़ चली। मकर संक्रांति का पर्व था तो नीला आकाश सतरंगी बन चुका था। युवक-युवतियाँ घरों की छत पर खड़े होकर पतंग उड़ा रहे थे। कुछ पतंग उड़ाने के साथ-साथ गाने भी गा रहे थे। पतंगोत्सव अपनी चरमसीमा पर था। एक युवक की अचानक किसी दूसरे युवक ने पतंग काट दी। वह क्रोधित होकर बुदबुदाया- अब देखता हूँ। मेरे इस चायनीज़ माँझे की डोर को तुम कैसे काट पाते हो? उसने झट से अपनी दूसरी पतंग को उठाया और चायनीज़ माँझे से पतंग को बाँध दिया और पुन: उस युवक की पतंग को काटने के लिए अपनी पतंग को उड़ाने लगा।

"अरे! ढील दे... ढील," उस युवक के साथ खड़े दूसरे युवक ने ज़ोर से उसे कहा। उसने उसके कहे अनुसार किया और पतंग की डोर को ढीला छोड़ दिया।

इधर वह गौरेया दाना चुगने के बाद जैसे ही अपने घोंसले  की ओर बढ़ रही थी इसी दौरान बीच रास्ते में ही चायनीज़ माँझा दिखाई न देने के कारण उसका पंजा उस डोर में उलझ गया।

"आह!" वह दर्द के मारे कराहने लगी। वह पंजा छुड़ाने के लिए छटपटाई लेकिन उसकी सारी कोशिशें नाकाम रहीं। उसके एक पंजे में डोर अंदर तक धँस गई।

"अरे! देखो एक चिड़िया फँस गई है। ज़ोर से झटका मारो वरना हमारी पतंग नीचे गिर जाएगी," उस युवक ने अपने दोस्त को हाथ से इशारा करते हुए कहा।

उसने उसके कहे अनुसार जैसे ही झटका मारा, उस गौरेया का एक पाँव कट गया। उसके मुँह से दर्दनाक चीख़ निकल गई। वह शीघ्र ही ज़मीन पर औंधे मुँह गिर गई। उसकी आँखों से ख़ून बहने लगा और शीघ्र ही वह छटपटाते हुए मर गई। एक बार फिर चायनीज़ माँझे ने एक निर्दोष परिंदे की जान ले ली।

इधर शाम हो चुकी थी। उस गौरेया के बच्चे भूख से चीं-चीं कर रहे थे। वे उसका इंतज़ार कर रहे थे कि अभी कुछ ही देर में उनकी माँ आएगी, लेकिन उन्हें क्या पता था कि अब उनकी माँ कभी लौटकर नहीं आएगी।

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