अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

जब हम बच्चे थे

दादी कि कहानियों में 
परियों का मेला था, 
जब हम बच्चे थे 
माँ कि लोरियों में,
रात का अँधेरा था,
जब हम बच्चे थे 
ना कोई हवस थी,
ना कोई ग़म था
पीपल के छाँव में 
साथ तेरा-मेरा  था, 
जब हम बच्चे थे।

 

तब गग़ भी था 
लम्हों के लिए 
अब ग़म है जैसे 
सदियों के लिए 
बिन पूछे ही लोग  
स्नेह  दिखाते थे
हम एक रूठते थे
और दस मनाते थें 
अब तो रूठने से 
डर लगता है 
अकेले ख़ुद के  
बाजुओं में,
टूटने से डर लगता है।
बेफ़िक्री शाम थी 
बेझिझक सवेरा था, 
जब हम बच्चे थे।

 

मन में कोई   
सवाल न था
तब अच्छे बुरे का 
ख़याल न था
सारी उलझनें   
दूर रहती थीं,
अपना बुरा     
हाल न था।
भावनाओं के आँगन में 
ख़ुशियों का डेरा था, 
जब हम बच्चे थे।

 

तब हम थे और 
काग़ज़ कि कश्ती थी
झूठी आनबान में 
सारी दिशायें हँसती थीं 
तब कितने ख़ुश थे हम,
और कितनी मस्ती थी!
अब दिन के उजालो में, 
होठों से हँसी छलकती है 
रात कि तन्हाई  में  
नैनो  से  नदी बरसती है 
ऐ जिंदगी!
तू अब कितनी 
बदली-बदली सी लगती है 
तब शाम के बोझिल पलकों में,
नींदों का डेरा था 
जब हम बच्चे थे।

 

तब काग़ज़ की कश्ती पे,
दो जहान उठाते थे
पेड़  की शाखाओं पे,
अपना बोझ ढाते थे 
तब हम ग़ैरों के भी,
काँधों पे मुस्कुराते थे।

 

अब कोई मेरा साया नहीं 
अपना और  पराया  नहीं   
जीवन की सूनी बाँहों में,
कोई भी समाया नहीं।
कभी ग़ैरों के आँगन की 
हम ख़ुद रौनक़ बन जाते थे 
जब हम बच्चे थे।

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

किशोर हास्य व्यंग्य कविता

कविता-मुक्तक

विडियो

ऑडियो

उपलब्ध नहीं