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जहुआ पेड़

कभी अनाज ओसाते वक़्त
किसान के हाथ से छिटक
धरती की गोद जा समाया
तो कभी परिंदों के बीट से
झोपड़ी और दरख़्तों पर
जन्मस्थल बनाया
तो कभी नदी, समन्दर में
बिन हारे, लहरों के सहारे
घास-फूस पर जा लगा
 
माटी में समाने से लेकर
खपरैल और झोंपड़ी
दरख़्त और घास-फूस
यही है उद्गम की कहानी
अंकुरण के जिज्ञासु नयन
अनन्त नभ को निहार रहे
उड़ान के लिए...
सपनों में जान के लिए
अनगिनत बार सँभाला
झंझावत से, बवंडर से
पर अंकुरण के बाद,
वीरान भी हुई कई बार
आबो हवा से मुहब्बत
जिजीविषा की ताकत
हर बार नई सुबह दी
 
हवा के झोंको से
कब बेखौफ़ हो गया
नन्हे, कोमल पौधे से
कब फलदार हुआ
पता ही नही चला
फल लदने पर झुककर
विनम्रता का दूत बना
दरख्तों का विस्तार कर
मुसाफ़िर को राहत पहुँचाया
 
दुःखी हूँ, आहत हूँ...
दोहरे बर्ताव से मूर्छित भी हूँ
"जहुआ पेड़" कहकर
बुलाता जो है।
 
1.जहुआ=नाजायज़

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