अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा वृत्तांत डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

जीवन और संघर्ष

उलझे-सुलझे 
लम्हों में 
जीवन की भागदौड़ में
न जाने कितने अतीत गुज़ारें 
हमने आज तक

फिर वही
यक्ष प्रश्न हमारे समक्ष
आ पहुँचता है
कि आदमी आख़िर टूटता क्यों है?
बिखरता क्यों है?

जीवन इतनी 
पराकाष्ठा में पहुँच जाता है
जिसकी परिकल्पना 
नहीं करना चाहता है आदमी
नहीं करना चाहता है
उससे समझौता

पर जीवन में
अचानक घेर देती 
उदासी 
तबाह करने के लिये 
विनष्ट करने के लिये

उत्तर-दक्षिण ध्रुव
सम अंधकार में 
पा लेता है अपने को 
आदमी 

खोजना चाहता है
जिजीविषाओं को 
हर पल 
हर व्यक्तित्व मे
आखिर मिलती है बुनी हुई वही 
रस्सी 
जिससे टाँगना चाहता है
अपनी संपूर्ण जिजीविषाओं को

यही है यक्ष प्रश्न
हमारे समक्ष
आज भी.......


 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

14 नवंबर बाल दिवस 
|

14 नवंबर आज के दिन। बाल दिवस की स्नेहिल…

16 का अंक
|

16 संस्कार बन्द हो कर रह गये वेद-पुराणों…

16 शृंगार
|

हम मित्रों ने मुफ़्त का ब्यूटी-पार्लर खोलने…

टिप्पणियाँ

Nãrpãt Dewãsï Pur 2019/05/16 01:00 AM

बहुत ही खूब....।।

Ashok Bishnoi 2019/04/05 06:40 PM

Nice sir

Kamlesh kumar 2019/03/03 08:33 AM

क्या गजब लिखा है ।

Vasudev 2019/03/01 05:45 PM

उत्कृष्ट

Vasudev 2019/03/01 05:44 PM

उत्कृष्ट

मनजीत बिश्नोई 2019/03/01 02:24 AM

बहुत ही सुन्दर लिखा है

Manajeet Pooniya 2019/03/01 02:16 AM

बहुत खूब लिखा है सरजी।

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

लघुकथा

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं